Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 20 यक्ष प्रश्न

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 20 यक्ष प्रश्न

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 20

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
युधिष्ठिर कहाँ जा पहुँचे?
उत्तर:
युधिष्ठिर उसी विषैले सरोवर के समीप जा पहुँचे जहाँ उनके चारों भाई मृत अवस्था में पड़े थे।

प्रश्न 2.
यक्ष की बात मानकर युधिष्ठिर ने क्या कहा?
उत्तर:
यक्ष की बात मानकर युधिष्ठिर बोले- आप प्रश्न पूछ सकते हैं।

प्रश्न 3.
यक्ष के प्रश्न कि मनुष्य का साथ कौन देता है? का उत्तर युधिष्ठिर ने क्या दिया?
उत्तर:
धैर्य

प्रश्न 4.
विदेश जाने वाले का साथी कौन होता है? का उत्तर युधिष्ठिर ने क्या दिया?
उत्तर:
विदया।

प्रश्न 5.
यक्ष ने युधिष्ठिर से कितने प्रश्न किए।
उत्तर:
यक्ष ने युधिष्ठिर से पंद्रह प्रश्न किए।

प्रश्न 6.
घास से भी छोटी वस्तु किसे बताया गया है?
उत्तर:
चिंता को।

प्रश्न 7.
संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है?
उत्तर:
संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि हर रोज़ कितने लोग काल के मुँह में समा जाते हैं, फिर भी हर प्राणी चाहता है कि वह अमर रहे।

प्रश्न 8.
युधिष्ठिर ने नकुल को ही जिलाना क्यों ठीक समझा?
उत्तर:
युधिष्ठिर ने यक्ष को बताया कि मेरे पिता की दो पत्नियाँ हैं। एक पत्नी कुंती से मैं जीवित हूँ। माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहना चाहिए। अतः मैंने उसके पुत्र नकुल को जीवित करना चाहा है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
युधिष्ठिर को आशीर्वाद देते हुए यक्ष ने क्या कहा?
उत्तर:
युधिष्ठिर का उत्तर सुनकर यक्ष प्रसन्न हो गया और युधिष्ठिर को छाती से लगा लिया। उसके चारों भाइयों को जीवित कर दिया।

प्रश्न 2.
वनवास की 12 वर्ष की अवधि पूरी होने पर पांडवों ने क्या-क्या किया?
उत्तर:
बारह वर्ष की अवधि पूरी होने पर पांडवों ने निम्नलिखित काम किए-
अर्जुन ने इंद्रदेव से दिव्यास्त्र प्राप्त किए। भीम हनुमान का आलिंगन प्राप्त कर दस गुना शक्तिशाली हो गए। युधिष्ठिर को धर्मदेव के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पांडव आधी रात को चले गए। पांडवों ने मत्स्य देश के राजा विराट के यहाँ तेरहवाँ वर्ष बिताने का निश्चय किया।

प्रश्न 3.
युधिष्ठिर को अपने मृत पड़े भाइयों को देखकर किस चीज़ का भय हुआ?
उत्तर:
जब युधिष्ठिर ने चारों भाइयों को सरोवर के तट पर मृत पड़े देखा तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्हें भय होने लगा कि यह किसी का माया जाल है। वहाँ पर किसी शत्रु के पाँव के निशान भी नज़र नहीं आ रहे थे। उन्हें लगा कि वह भी शायद दुर्योधन का ही षड्यंत्र है या संभव है पानी में विष मिला दिया हो।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 20

चारों भाइयों के लापता होते ही युधिष्ठिर अपने भाइयों को खोजते-खोजते उसी तलाब पर पहुँच गए। अपने भाइयों को मृतावस्था में देखकर युधिष्ठिर रोने लगे। उन्होंने सोचा या तो माया जाल है या दुर्योधन का षड्यंत्र। उन्होनें अपने भाइयों के शरीर को ध्यान से देखा। आसपास किसी शत्रु या पाँव के निशान भी नहीं था। सोचते-सोचते युधिष्ठिर प्यास से प्रेरित पानी की ओर चले तो वही आवाज़ आई। युधिष्ठिर समझ गए कि कोई यक्ष बोल रहा है। वे रुक गए और बोले आप प्रश्न कर सकते हैं। यक्ष ने कई प्रश्न किए और युधिष्ठिर उसके प्रश्न का उत्तर देते चला गया।

प्रश्न
मनुष्य का साथ कौन देता है?
उत्तर:
धैर्य ही मनुष्य का साथी होता है।

प्रश्न
कौन-सा शास्त्र है जिसका अध्ययन करके मनुष्य बुद्धिमान बनता है?
उत्तर:
कोई शास्त्र ऐसा नहीं है। महान लोगों की संगति से ही मनुष्य बुद्धिमान बनता है।

प्रश्न
भूमि से भारी चीज़ क्या है ?
उत्तर:
संतान को कोख में धारण करने वाली माता भूमि से भी भारी होती है।

प्रश्न
आकाश से भी ऊँचा कौन है?
उत्तर:
पिता।

प्रश्न
हवा से भी तेज़ कौन चलता है ?
उत्तर:
मन।

प्रश्न
घास से भी तुच्छ चीज़ कौन-सी होती है?
उत्तर:
चिंता।

प्रश्न
विदेश जानेवाले का साथी कौन होता है ?
उत्तर:
विद्या।

प्रश्न
मरणासन्न वृद्ध का मित्र कौन होता है?
उत्तर:
दान।

प्रश्न
बरतनों में सबसे बड़ा बरतन कौन है?
उत्तर:
भूमि सबसे बड़ा बरतन है, जिसमें सब कुछ समा सकता है।

प्रश्न
सुख क्या है ?
उत्तर:
सुख वह चीज़ है जो शील और सच्चरित्रता पर स्थित है।

प्रश्न
किसके छूट जाने पर मनुष्य सर्वप्रिय बन जाता है?
उत्तर:
अहंभाव छूट जाने पर।

प्रश्न
किस चीज़ को खो जाने से दुख नहीं होता?
उत्तर:
क्रोध।

प्रश्न
किस चीज को गवाँ कर मनुष्य धनी बनता है?
उत्तर:
लालच को।

प्रश्न
संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है ?
उत्तर:
हर रोज़ कितने प्राणियों को मरते हुए देखकर भी बचे हुए प्राणी, जो यह चाहते हैं कि हम अमर रहें। यही महान आश्चर्य की बात है।

युधिष्ठिर के प्रश्नों से प्रसन्न होकर यक्ष ने कहा- “राजन् मैं तुम्हारे मृत भाइयों में से एक भाई को जीवित कर सकता हूँ। तुम जिस किसी को भी चाहो, वह हो जाएगा।”

युधिष्ठिर ने कहा- मेरा छोटा भाई जी उठे। यक्ष ने सामने प्रकट होकर पूछा- दस हज़ार हाथियों के बल वाले भीम को छोड़कर तुमने नकुल को जीवित करवाना क्यों ठीक समझा?

युधिष्ठिर ने कहा यक्षराज! मैंने जो नकुल को जीवित करवाना चाहा, वह सिर्फ इसी कारण कि मेरे पिता जी की दो पत्नियों में से माता कुंती का बचा हुआ पुत्र एक मैं हूँ। मैं चाहता हूँ कि माता माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहे। जिससे हिसाब बराबर रहेगा। अब आप कृपा करके नकुल को जीवित कर दें।

यक्ष युधिष्ठिर की बातों को सुनकर प्रसन्न हुए और चारों भाइयों को जीवित कर दिए।

युधिष्ठिर को यक्ष ने गले लगा लिया और आशीर्वाद दिया कि बारह वर्ष की अवधि समाप्त होने को है। आज्ञातवास में तुमको कोई पहचान नहीं पाएगा। ऐसा कहकर धर्मदेव गायब हो गए।

इस बारह वर्ष के दौरान अर्जुन ने इंद्रदेव से दिव्यास्त्र प्राप्त किए, भीम हनुमान से आलिंगन कर दस-गुनी शक्ति प्राप्त कर चुके थे। धर्मदेव का आशीर्वाद मिल गया था। बारह वर्ष बीत जाने पर युधिष्ठिर ने पारिवारिक लोगों को ब्राह्मणों के साथ नगर लौटा दिए। पाँचों भाइयों ने आपस में सलाह करके राजा विराट के यहाँ अज्ञातवास का समय बिताने का निर्णय लिया।

शब्दार्थ:
पृष्ठ संख्या-50- षड्यंत्र – कुचक्र, विष – जहर, धैर्य – धीरज, सब्र, निशान – चिह्न
पृष्ठ संख्या-51- मरणासन्न – मरने जैसा, सर्वप्रिय – सबका प्यारा, अहंभाव – अहंकार, घमंड, जीवित – जिंदा।
पृष्ठ संख्या-52- अंतर्धान – लुप्त हो जाना, दिव्याशास्त्र – अलौकिक हथियार, अधीश – राजा।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 19 मायावी सरोवर

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 19 मायावी सरोवर

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 19

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
युधिष्ठिर ने नकुल से पेड़ पर चढ़कर क्या देखने को कहा?
उत्तर:
नकुल ने पेड़ पर चढ़कर कोई जलाशय या नदी देखने को कहा।

प्रश्न 2.
युधिष्ठिर ने सबसे पहले पानी लाने किसे भेजा?
उत्तर:
युधिष्ठिर ने सबसे पहले पानी लाने के लिए नकुल को भेजा।

प्रश्न 3.
सरोवर पर नकुल को क्या आवाज़ सुनाई पड़ी?
उत्तर:
सरोवर पर नकुल को आवाज़ सुनाई पड़ी- माद्री के पुत्र! दुःसाहस न करो। यह जलाशय मेरे अधीन है। पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो फिर पानी पियों।

प्रश्न 4.
पानी पीने के बाद चारों भाइयों के साथ क्या घटना घटी?
उत्तर:
पानी पीने के बाद चारों भाई मूर्च्छित होकर गिए गए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भाइयों के नहीं लौटने पर युधिष्ठिर के मन में क्या-क्या शंकाएँ उत्पन्न हुईं?
उत्तर:
चारों भाइयों के नहीं लौटने पर युधिष्ठिर घबराने लगा। उनके मन में तरह-तरह की आशंकाएँ उत्पन्न होने लगीं। मन में सोचने लगे आश्चर्य की बात है कि कोई अभी तक नहीं लौटा कहीं जल की खोज में वे जंगल में इधर-उधर भटक नहीं गए। मैं ही चलकर देखें कि क्या बात है।

प्रश्न 2.
नकुल को पानी होने का पता किस प्रकार चला?
उत्तर:
जब नकुल ने पेड़ पर चढ़कर देखा कि कुछ दूरी पर ऐसे पौधे दिखाई दे रहे हैं जो पानी के नजदीक ही उगते हैं। उसके आस-पास कुछ बगुले भी बैठे हैं। इन संकेतों से उन्हें पता चला कि आस-पास कही जलाशय है।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 19

पांडवों के वनवास की बारह वर्ष की अवधि पूरी होने वाली थी। वे लोग एक गरीब ब्राह्मण की सहायता करते हुए पाँचों भाई जंगल में काफ़ी दूर निकल गए थे। एक दिन युधिष्ठिर ने नकुल से कहा कि पेड़ पर चढ़कर देखों कि कोई नदी या जलाशय आसपास है। पेड से उतरकर नकल ने बताया कि कुछ दूरी पर ऐसे पौधे दिखाई दे रहे हैं जो पानी के नजदीक ही उगते हैं। आसपास कुछ बगुले भी बैठे हैं। युधिष्ठिर ने नकुल को पानी लेने भेज दिया। नकुल पानी लाने चल पड़े। कुछ दूरी पर उन्हें एक जलाशय मिला। उसने जलाशय को देखकर सोचा कि पहले खुद पानी पी लूँ फिर भाइयों के लिए ले जाऊँगा। नकुल ने जैसे पानी पीने के लिए अंजलि में लिया, एक आवाज़ आई-“माद्री के पुत्र। दुस्साहस न करो। यह जलाशय भी मेरे अधीन है। पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो। फिर पानी पीयो।”

नकुल को तेज़ प्यास लगी थी। इस कारण नकुल ने उस आवाज़ पर ध्यान नहीं दिया और पानी पी लिया। पानी पीते ही नकुल वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा।

नकुल के आने में देर होने पर युधिष्ठिर ने सहदेव को भेजा। सहदेव ने जलाशय के समीप ज़मीन पर गिरे नकल को देखा। प्यास ज़ोर से लगने के कारण वह भी पानी पीने लगा। पहले जैसी आवाज़ उसे सुनाई दी। उसने भी ध्यान नहीं दिया। पानी पी लिया वह भी ज़मीन पर आकर गिर पड़ा। काफ़ी देर होने के बाद जब वे दोनों भाई नहीं पहुँचे तो युधिष्ठिर ने अर्जुन को भेजा। वह भी सरोवर में पानी-पीने के लिए नीचे उतरा। आवाज़ आई अर्जुन मेरे प्रश्न के उत्तर देने के बाद ही प्यास बुझा सकते हो। यह तालाब मेरा है। अगर तुम मेरी बात नहीं मानोगे, तो, तुम्हारी भी गति वही होगी, जो तुम्हारे भाइयों की हुई है। अर्जुन उस आवाज़ को सुनकर क्रोधित हो गया। उसने बाण छोड़ने शुरू किए लेकिन इन बाणों का कोई असर नहीं होता था। अंत में अर्जुन भी अपने अन्य दो भाइयों की भाँति बिना सोचे जलाशय में उतरकर पानी पी लिया। पानी पीते ही अन्य भाइयों की तरह वह भी बेहोश हो गया।

अपने तीनों भाइयों की प्रतीक्षा करते-करते युधिष्ठिर काफ़ी चिंतित हो गए। इसके बाद युधिष्ठिर ने भीम को भेजा। भीम ने सोचा की यह यक्ष का करतूत है। फिर उसके पास भी वह आवाज़ आई। भीम बोला-मुझे रोकने वाला तू कौन है? भीम ने पानी पिया और वह भी अन्य भाइयों तरह बेहोश हो गया और ज़मीन पर गिर पड़ा।

उधर युधिष्ठिर की चिंता बहुत अधिक बड़ गई। वे सोचने लगे आखिर भाइयों को क्या हो गया। क्या कारण है कि अभी तक वे चारों लौटे नहीं। यह सोचते-सोचते स्वयं उन लोगों को खोजने निकल पड़े।

शब्दार्थ:
पृष्ठ संख्या-48- अवधि – समय, जलाशय – सरोवर, तरकश – बाण रखने वाला बर्तन, धिक्कारना – कोसना, असुविधा – कठिनाई।
पृष्ठ संख्या-49- गति – दिशा, तालाश – खोज, ज़रा – तनिक, बेधड़क – निर्भीक, अचेत – बेहोश, बाट जोहना – इंतज़ार करना, व्याकुल – बेचैन।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 18 द्वेष करने वाले का जी नहीं भरता

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 18 द्वेष करने वाले का जी नहीं भरता

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 18

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुर्योधन की चापलूसी कौन करते थे?
उत्तर:
कर्ण और शकुनी दुर्योधन की चापलूसी करते थे।

प्रश्न 2.
चौपायों की गणना का काम किसका होता था?
उत्तर:
चौपायों की गणना का काम राजकुमारों का होता था।

प्रश्न 3.
पांडवों के वनवास के समय दुर्योधन ने कर्ण से क्या कहा?
उत्तर:
पांडवों के वनवास के समय दुर्योधन ने कर्ण से कहा-“कर्ण मैं चाहता हूँ कि पांडवों को मुसीबतों में पड़े हुए अपनी आँखों से देखू। इसलिए तुम और मामा शकुनि कुछ ऐसा तरकीब निकालो ताकि वन में जाकर पांडवों को देखने की पिता से अनुमति मिल जाए।

प्रश्न 4.
दुर्योधन ने धृतराष्ट्र को क्या विश्वास दिलाया?
उत्तर:
दुर्योधन ने विश्वास दिलाया कि पांडव जहाँ होंगे वहाँ हम नहीं जाएँगे और बड़ी सावधानी से काम लेंगे। अतः विवश होकर धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को वन जाने की अनुमति दे दी।

प्रश्न 5.
दुर्योधन के डेरे का स्थान पांडवों के आश्रम से कितनी दूरी पर था?
उत्तर:
दुर्योधन के डेरे का स्थान पांडवों के आश्रम से चार कोस दूरी पर था।

प्रश्न 6.
आश्रम के समीप जलाशय के तट पर और किसने डेरा डाल रखा था?
उत्तर:
आश्रम के निकट जलाशय के तट पर गंधर्वराज चित्रसेन ने अपना डेरा डाल रखा था।

प्रश्न 7.
जलाशय के समीप किस-किसमें युद्ध हुआ?
उत्तर:
जलाशय के समीप गंधर्वराज चित्रसेन और कौरवों की सेनाओं में युद्ध हुआ। इसमें कर्ण और दुर्योधन पराजित हो गए।

प्रश्न 8.
दुर्योधन को किसने बंदी बनाया? उसके बंदी बनने पर युधिष्ठिर ने भीम से क्या कहा?
उत्तर:
दुर्योधन को गंधर्वराज चित्रसेन ने बंदी बना लिया। युधिष्ठिर ने भीम से कहा-“भाई भीम ये हमारे संबंधी हैं। तुम अभी जाओ और किसी तरह अपने बंधुओं को गंधर्वो के बंधन से छुड़ा लाओ।”

प्रश्न 9.
अक्षय पात्र को किसने दिया था? सूर्य से प्राप्त अक्षयपात्र की क्या विशेषता थी?
उत्तर:
अक्षयपात्र को सूर्य देव ने युधिष्ठिर को दिया था। उस पात्र की विशेषता यह थी कि- अक्षयपात्र देते समय सूर्य ने कहा था कि इस पात्र के द्वारा तुम बारह वर्ष तक भोजन प्राप्त करोगे, भले ही कितने लोग भोजन करें। किंतु शर्त यह था कि द्रौपदी के भोजन कर लेने के बाद पात्र की शक्ति अगले दिन तक के लिए समाप्त हो जाएगी।

प्रश्न 10.
दुर्योधन ने कौन-सा यज्ञ किया।
उत्तर:
दुर्योधन ने वैष्णव नामक यज्ञ किया।

प्रश्न 11.
श्रीकृष्ण ने अन्न का कण और साग का पत्ता क्यों खाया?
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने अन्न का कण और साग का पत्ता इसलिए खाया ताकि दुर्वासा ऋषि व उनके दस हज़ार शिष्यों की भूख शांत हो सके। ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि वे जानते थे कि इतने लोगों को एक साथ भोजन करवाना पांडवों के लिए असंभव है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुर्योधन ने महर्षि दुर्वासा से क्या वर माँगा?
उत्तर:
दुर्योधन पांडवों को अपमानित करना चाहता था। अतः उसने महर्षि दुर्वासा से वर माँगा- आप अपने शिष्यों सहित पांडवों के यहाँ जाकर उनका सत्कार स्वीकार करें। पर वे ऐसे समय में युधिष्ठिर के आश्रम में जाएँ जब द्रौपदी पांडवों एवं परिवार को भोजन करा चुकी हो और वे विश्राम कर रहे हों।

प्रश्न 2.
गंधर्वराज और दुर्योधन के बीच युद्ध का क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
गंधर्वराज और दुर्योधन की सेना आपस में काफ़ी संग्राम करने लगे यहाँ तक कि कर्ण जैसे महारथी के रथ युद्ध चकनाचूर हो गए और वे वहाँ से भाग खड़े हुए। अकेला दुर्योधन युद्ध के मैदान में डटा रहा। अंत में गंधर्वराज चित्रसेन ने उसे पकड़कर बंदी बना लिया और शंख बजाकर विजय की घोषणा की।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 18

जब पांडव वन में रहते थे तब कई ब्राह्मण वन में पांडवों से मिलने जाते थे। वे लोग लौटकर फिर हस्तिनापुर पहुंचे और धृतराष्ट्र को पांडवों की हालत की जानकारी देते थे। यह सुनकर कि वन में पांडव बड़ी तकलीफ में हैं धृतराष्ट्र दुखी होते थे, लेकिन यह जानकारी पाकर दुर्योधन को बड़ी प्रसन्नता होती थी। एक दिन दुर्योधन ने कर्ण से कहा- “कर्ण, मैं तो चाहता हूँ कि पांडवों को मुसीबतों में पड़े हुए अपनी आँखों से देखें। इसके लिए तुम और शकुनि मामा कुछ ऐसा उपाय करो कि वन में जाकर पांडवों को देखने की पिता जी से अनुमति मिल जाए।

कर्ण बोला द्वैतवन में कुछ बस्तियाँ हैं जो हमारे अधीन हैं। बहुत समय पहले से यह रिवाज चली आ रही है कि हर साल राजकुमार उस बस्तियों में जाकर चौपायों की गणना करते हैं। इस बहाने हम लोग पिता जी की अनुमति ले सकते हैं। दुर्योधन ने आग्रह करके पिता जी से अनुमति ले ली और एक बड़ी सेना की टुकड़ी लेकर कौरव द्वैतवन के लिए निकले। वे लोग उस स्थान पर रुके जहाँ से पांडवों का आश्रम मात्र चार कोस की दूरी पर था।

उस वक्त गंधर्वराज चित्रसेन भी सपरिवार जलाशय के तट पर डेरा डाले हुए थे। गंधर्वराज के अनुचरों ने कौरवों के अनुचरों को यहाँ डेरा डालने से रोका और न मानने पर मारकर भगा दिया। इस खबर के बाद काफ़ी गुस्से से कौरव सेना सहित सरोवर की ओर बढ़े तो गंधर्वराज की सेना का सामना करना पड़ा। युद्ध के दौरान कौरव की सेना व कर्ण वहाँ से भाग खड़े हुए और दुर्योधन को गंधर्वराज चित्रसेन ने बंदी बना लिया।

जब यह सूचना युधिष्ठिर को मिली तो उन्होंने भीम से कहा- “भाई भीम ये हमारे संबंधी हैं। तुम अभी जाओ और किसी तरह से अपने बंधुओं को गंधर्वो के बंधन से छुड़ा लाओ। भीम और अर्जुन कौरवों की बिखरी हुई सेना को इकट्ठा कर गंधर्व पर चढ़ाई किया और दुर्योधन को बंधन से मुक्त कराया। इस तरह दुर्योधन अपमानित होकर हस्तिनापुर लौट आया।

पंडितों से राजसूय यज्ञ की अनुमति न मिलने पर दुर्योधन ने वैष्णव नामक यज्ञ किया। इस यज्ञ में मुनि दुर्वासा दस हजार शिष्यों के साथ पधारे थे। दुर्योधन द्वारा किए गए सत्कार से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उसे वर माँगने को कहा। ईर्ष्यालु दुर्योधन ने वर माँगा- दुर्योधन बोला – मुनिवर। प्रार्थना यही है कि जैसे आप शिष्य समेत अतिथि बनकर मुझे अनुगृहीत किया है, वैसे ही वन में मेरे भाई पांडवों के यहाँ जाकर भी सत्कार स्वीकार करें और फिर एक छोटी-सी बात मेरे लिए करने की कृपा करें। वह यह कि आप अपने शिष्यों समेत ठीक ऐसे समय युधिष्ठिर के आश्रम में जाएँ, जब द्रौपदी पांडवों को भोजन करा चुकी हो और सभी लोग आराम कर रहे हों। दुर्योधन की प्रार्थना मानकर दुर्वासा मुनि युधिष्ठिर के आश्रम पहुँचे। पांडवों ने उनकी आव-भगत की। कुछ देर बाद मुनि ने कहा हम सब स्नान करके आते हैं, तब तक तुम भोजन तैयार करके रखना।

वनवास के दौरान युधिष्ठिर से खुश होकर सूर्य ने उन्हें एक अक्षयपात्र दिया और कहा था कि बारह साल तक इसमें भोजन दिया करूँगा लेकन एक शर्त है कि द्रौपदी हर रोज चाहे जितने लोगों को इस पात्र में से भोजन खिला सकेगी किंतु जब स्वयं भोजन कर लेगी तो अगले दिन तक के लिए भोजन समाप्त हो जाएगा।

जिस समय दुर्वासा आए थे, तब द्रौपदी भोजन कर चुकी थी और पात्र धोया जा चुका था। इसी वक्त श्रीकृष्ण वहाँ पधारे और बोले बहन द्रौपदी मुझे भूख लगी है कुछ खाने को दे दो। वे अक्षयपात्र को माँगकर देखने लगे। द्रौपदी उस बरतन को ले आई। बरतन के एक छोर पर अनाज का एक कण और साग की पत्ती लगी हुई थी। श्रीकृष्ण उसे अपने मुँह में डालते हुए बोले- “इससे उनकी भूख मिट जाए।”

यह कहकर श्रीकृष्ण बाहर भीम से बोले- भीम जल्दी जाकर ऋषि और उनके शिष्यों को भोजन के लिए बुलाओ।

जब भीम उन लोगों को बुलाने पहुंचे तो देखा कि दुर्वासा मुनि और उनके सभी शिष्य भोजन कर चुके हैं। ये लोग आपस में कह रहे थे कि “गुरुदेव! युधिष्ठिर से हम व्यर्थ में कह आए कि भोजन तैयार करके रखो। हमारा पेट तो भरा हुआ है। हमसे उठा नहीं जाता। इस समय हमारी खाने की बिलकुल इच्छा नहीं है।

यह सुनकर दुर्वासा ने भीम से कहा- हम सब भोजन कर चुके हैं। युधिष्ठिर से कहना असुविधा के लिए हमें क्षमा करें। यह कहकर दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों समेत वहाँ से रवाना हो गए।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-46
तकलीफ़ – कष्ट, दुख, चौपायों – पशुओं, विवश – मज़बूर, लाचार, अनुचर – सेवक, चापलूसी – किसी के मन मुताबिक बात करना, बस्ती – गाँव, गणना – गिनती, संग्राम – युद्ध, विजयघोष – जीत की घोषणा, आग्रह – अनुरोध।

पृष्ठ संख्या-47
अनुगृहीत – आभारी होना, आवभगत – स्वागत, सत्कार, अक्षयपात्र – जो कभी खाली न हो, शक्ति – ताकत, धिक्कारना – कोसना, व्यर्थ – बेकार, असुविधा – कठिनाई।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 17 भीम और हनुमान

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 17 भीम और हनुमान

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 17

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फूल देखकर द्रौपदी ने भीम से क्या कहा?
उत्तर:
जब फूल हवा में उड़ता हुआ द्रौपदी के पास आकर गिरा तब द्रौपदी ने उस फूल को उठाकर भीमसेन से बोली कि क्या आप ऐसे ही कुछ और फूल लाकर दे सकते हैं।

प्रश्न 2.
भीम को बगीचे के बीच कौन लेटा मिला?
उत्तर:
भीम को बगीचे के बीच एक विशालकाय बंदर रास्ता रोककर लेटा हुआ मिला।

प्रश्न 3.
बंदर ने अपनी क्या असमर्थता जताई?
उत्तर:
बंदर ने असमर्थता जताते हुए कहा-“मैं बूढ़ा हूँ मुश्किल से उठ-बैठ सकता हूँ।”

प्रश्न 4.
क्रोधित भीम ने बंदर को अपना परिचय कैसे दिया?
उत्तर:
एक बंदर को इस प्रकार की बातें करते देखकर भीम को गुस्सा आ गया। वे बोले, मैं कुरुवंश का वीर कुंती पुत्र हूँ। हट जाओ मेरे रास्ते से और हमें आगे जाने दो।

प्रश्न 5.
भीम ने लाँघने से क्यों मना कर दिया?
उत्तर:
भीम ने लाँघने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि उसका मानना था कि किसी जानवर को लाँघना अनुचित है। इसी कारण मैं रुक गया नहीं तो मैं तुम्हें एक ही छलाँग में लाँघकर चला गया होता।

प्रश्न 6.
भीम की धमकी पर बंदर की क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर:
भीम की धमकी पर बंदर बड़े विनम्र भाव से बोला- हे वीर! शांत हो जाओ। इतना क्रोध न करो। यदि मुझे लाँघना तुम्हें अनुचित लगता है तो मेरी इस पूँछ को हटाकर एक ओर कर दो और चले जाओ।

प्रश्न 7.
हनुमान ने भीम को क्या आशीर्वाद दिया?
उत्तर:
हनुमान ने आशीर्वाद देते हुए कहा-“भीम! युद्ध के समय तुम्हारे भाई अर्जुन के रथ पर उड़ने वाली ध्वाजा पर मैं विद्यमान रहूँगा। विजय तुम्हारी ही होगी।”

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
द्रौपदी ने जिस फूल की लालसा प्रकट की थी, उसे लाने के लिए भीम को रास्ते में क्या-क्या कठिनाइयाँ आईं?
उत्तर:
एक दिन द्रौपदी आश्रम के बाहर खड़ी थी। हवा में उड़ता हुआ एक सुंदर फूल उसके सामने आ गिरा। द्रौपदी ने उस फूल को उठाकर भीम को दिया और कहा कि क्या तुम ऐसे कुछ फूल और मुझे लाकर दे सकते हो? भीम ने इसे अत्यंत सरल काम समझा। वे फूलों की तलाश में अनजान रास्ते पर चले जा रहे थे। इसके लिए उन्हें पहाड़ की घाटी में जाना पड़ा। जहाँ केले के पेड़ों का विशाल उद्यान लगा था। इस रास्ते पर एक विशाल बंदर अपने पूँछ फैलाए लेटा था। भीम के लिए बंदर की पूँछ उठाकर आगे बढ़ना टेढ़ी खीर साबित हुआ। यहीं उद्यान के समीप झराने में भीम को द्रौपदी का इच्छित फूल मिला।

प्रश्न 2.
फूल लाने जाते समय ऐसी कौन-सी घटना घटी, जिसके कारण उन्हें लज्जित होना पड़ा।
उत्तर:
फूल लाने जाते समय जब केले के विशाल उद्यान में पहुँचे तो रास्ते में हनुमान के रूप में भारी भरकम बंदर रास्ते में लेटा मिला। जिसकी पूँछ को लाँघना या उठाकर पार करते हुए आगे बढ़ना था। भीम चाहते थे कि बंदर अपनी पूँछ स्वयं हटा ले पर बंदर इसके लिए तैयार नहीं था और भीम से बंदर ने कहा कि वे स्वयं पूँछ हटाकर चले जाएँ। भीम ने इसे अत्यंत साधारण काम समझकर पूँछ को हटाने चले पर काफ़ी प्रयास करने के बावजूद वे इसे हिला भी न सके। इस घटना के बाद भीम बहुत लज्जित हुआ।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 17

एक दिन द्रौपदी अपने आश्रम में खड़ी थी। हवा में उड़ता हुआ एक सुंदर फूल उनके पास आ गिरा। फूल उठाकर द्रौपदी ने अपने पति भीम से बोली-“क्या आप ऐसे कुछ और फूल मुझे लाकर दे सकते हो। यही बात उन्होंने युधिष्ठिर को भी कहीं।”

द्रौपदी की इच्छा पूरी करने के लिए भीम उस फूल की तालाश में निकल पड़े। चलते-चलते वे एक विशाल बगीचे में पहुँचे। उस बगीचे में केले के पेड लगे थे। वहाँ रास्ता रोके एक विशाल बंदर लेटा पड़ा था। बंदर ने भीम को देखकर कहा-“मैं अस्वस्थ हूँ। तुमने जगाकर नींद क्यों खराब कर दी।” भीम ने गर्व से कहा- “मैं कुंती पुत्र भीम हूँ। मेरे रास्ते से हट जाओ।” बंदर ने कहा कि मैं बूढ़ा हूँ, उठ-बैठ नहीं सकता। तुम मुझे लाँघकर चले जाओ। भीम ने कहा- किसी जानवर को लाँघना उचित नहीं हैं। बंदर ने कहा कि मुझे बताना कि हनुमान कौन था जो समुद्र को लाँघ गया था।

इस पर भीम ने कहा, क्या तुम हनुमान को नहीं जानते ? उठकर हमें रास्ता दे दो। नाहक तुम मृत्यु को निमंत्रण दे रहे हो।

तब बंदर बड़े करुण स्वर में बोला- “हे वीर! शांत हो जाओ। इतना क्रोध मत करो। यदि तुम्हें मुझे लांघना अनुचित लगता है तो मेरी पूँछ को हटराकर एक तरफ़ कर दो और चले जाओ।”

अब भीम ने बंदर की पूँछ एक हाथ से उठाने का प्रयास किया पर हिला भी न सका। फिर भीम ने दोनों हाथों से पूँछ पकड़कर उठाने का प्रयास किया फिर पूँछ हिला न सका। भीम का अहंकार चकना चूर हो गया। लज्जित होकर भीम ने बड़ी विनम्रता से बंदर से बोला-‘मुझे क्षमा करें। अपना परिचय दें। आप कौन हैं ? फिर हनुमान ने कहा-हे पांडुवीर! हनुमान मैं ही हूँ।”

भीम ने हनुमान को दंडवत प्रणाम किया। भीम ने कहा- हे वानर श्रेष्ठ! मुझसे बढ़कर भाग्यवान और कौन होगा, जो मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए। हनुमान ने भीम को आशीर्वाद देते हुए कहा, “भीम युद्ध के समय तुम्हारे भाई अर्जुन के रथ पर उड़ने वाली ध्वजा पर मैं विद्यमान रहूँगा। विजय तुम्हारी होगी।” इसके बाद हनुमान ने भीम को पास के झरने में खिले हुए सुगंधित फूल दिखाए। फूलों को देखते ही भीम को द्रौपदी की बात याद आई। उसने जल्दी से फूल तोड़े और आश्रम की ओर लौट गए।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-45- ताज्जुब – आश्चर्य, विस्मय – आश्चर्य, बलिष्ठ – शक्तिशाली, मारुति – हनुमान, ध्वजा – पताका, वेग – तेज़ी से।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 16 धृतराष्ट्र की चिंता

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 16 धृतराष्ट्र की चिंता

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 16

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जब पांडव वन की ओर जाने लगे तब धृतराष्ट्र ने विदुर को बुलाकर क्या पूछा?
उत्तर:
धृतराष्ट्र ने विदुर से पूछा पांडु के बेटे और द्रौपदी कैसे वन की ओर जा रहे हैं।

प्रश्न 2.
विदुर ने द्रौपदी की दशा के बारे में क्या बताया?
उत्तर:
विदुर ने बताया कि द्रौपदी ने बालों को बिखेरकर मुँह ढक रखा है और रोती हुई जा रही है।

प्रश्न 3.
वन को जाते हुए पांडवों का वर्णन विदुर ने किस प्रकार किया?
उत्तर:
विदुर ने वन को जाते हुए पांडवों का वर्णन करते हुए कहा कि-“कुंती पुत्र युधिष्ठिर कपड़े से चेहरा ढककर जा रहे हैं। भीम अपनी दोनों भुजाओं को निहारता, अर्जुन हाथ में कुछ बालू लिए उसे बिखेरता, नकुल और सहदेव सारे शरीर पर धूल रमाए हुए क्रमशः युधिष्ठिर के पीछे-पीछे जा रहे हैं। द्रौपदी ने बिखरे हुए केशों में सारा मुँह ढक लिया है और आँसू बहाती हुई युधिष्ठिर का अनुसरण कर रही हैं।

प्रश्न 4.
विदुर के चले जाने पर धृष्टराष्ट्र को कैसा लगा? उन्होंने विदुर को बुलाने के लिए किसे भेजा?
उत्तर:
विदुर के पांडवों के पास चले जाने के बाद धृतराष्ट्र को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्हें लगने लगा कि मैंने विदुर को भगाकर अच्छा नहीं किया। अतः उन्होंने विदुर को बुलाने के लिए संजय को भेजा।

प्रश्न 5.
महर्षि मैत्रेय की युधिष्ठिर से भेंट कहाँ हुई?
उत्तर:
महर्षि मैत्रेय की युधिष्ठिर से भेंट काम्यक वन में हुई।

प्रश्न 6.
धृतराष्ट्र द्वारा पांडवों का कुशल पूछने पर महर्षि मैत्रेय ने क्या बताया?
उत्तर:
धृतराष्ट्र द्वारा पांडवों की कुशलक्षेम पूछने पर मैत्रेय ने बताया- “राजन काम्यक वन में संयोग से युधिष्ठिर से मेरी भेंट हो गई थी। वन के दूसरे ऋषि-मुनि भी मिलने उसके आश्रम में आए थे। हस्तिनापुर में जो कुछ हुआ था, उसका सारा हाल उन्होंने मुझे बताया था। यही कारण है कि मैं आपके यहाँ आया हूँ। आपके और भीष्म के रहते ऐसा नहीं होना चाहिए था।

प्रश्न 7.
पांडवों से मिलने श्रीकृष्ण के साथ वन में कौन-कौन आए थे?
उत्तर:
पांडवों से मिलने श्रीकृष्ण के साथ कैकेय भोज और वृष्टि जाति के लोग, चेदिराज धृष्टकेतु आदि वन गए थे।

प्रश्न 8.
द्रौपदी को सांत्वना देते हुए श्रीकृष्ण ने क्या भरोसा दिलाया?
उत्तर:
द्रौपदी की दुख भरी गाथा सुनकर श्रीकृष्ण बोले-“बहन द्रौपदी! जिन्होंने तुम्हारा अपमान किया है, उन सबकी लाशें युद्ध के मैदान में खून से लथपथ होकर मिलेंगी। आप शोक न करो! मैं वचन देता हूँ कि पांडवों की हर प्रकार से सहायता करूँगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पांडव द्रौपदी के साथ वन में किस प्रकार जा रहे थे?
उत्तर:
वन जाते समय युधिष्ठिर अपने चेहरे को कपड़े से ढककर जा रहे थे। भीम अपनी दोनों भुजाओं को निहारता, अर्जुन हाथ में कुछ बालू लिए उसे बिखेरता, नकुल और सहदेव सारे शरीर पर धूल रमाए हुए क्रमशः युधिष्ठिर के पीछे-पीछे जा रहे थे। द्रौपदी ने बिखरे हुए केशों से सारा मुँह ढक लिया है और आँसू बहाती हुई युधिष्ठिर का अनुसरण कर रही है।

प्रश्न 2.
महर्षि मैत्रेय ने दुर्योधन को क्या सलाह दी।
उत्तर:
महर्षि मैत्रेय ने दुर्योधन को सलाह देते हुए कहा कि-“दुर्योधन तुम्हारी भलाई के लिए कहता हूँ कि पांडवों को धोखा देने का विचार त्याग दो, उनसे ईर्ष्या न करो। उनके साथ संधि कर लो। इसी में तुम्हारी भलाई है।”

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 16

जब द्रौपदी को साथ लेकर पांडव वन को जाने लगे तो चिंतित धृतराष्ट्र ने विदुर से पूछा कि पांडु के बेटे और द्रौपदी कैसे जा रहे हैं, मुझे बताओ। विदुर ने धृतराष्ट्र को बताते हुए कहा कि युधिष्ठिर अपने चेहरे ढककर जा रहे हैं। भीम अपनी दोनों भुजाओं को निहारते हुए जा रहे हैं, जबकि अर्जुन हाथ में बालू लेकर बिखेरते हुए और नकुल और सहदेव सारे शरीर में मिट्टी लगाते हुए युधिष्ठिर के. पीछे-पीछे जा रहे हैं। द्रौपदी के बिखरे हुए बाल से उनका मुँह ढंका हुआ है और आँसू बहाती हुई जा रही हैं।

यह सुनकर धृतराष्ट्र की चिंता काफ़ी बढ़ गई। इधर विदुर बार-बार धृतराष्ट्र को आग्रह कर रहे थे कि आप पांडवों से समझौता कर लें। इनकी बार-बार एक ही बात को सुनकर धृतराष्ट्र झुंझलाकर बोले, मुझे तुम्हारे मशविरा की ज़रूरत नहीं है। अगर तुम चाहो तो पांडवों के साथ जा सकते हो। विदुर भी अपने रथ में बैठकर जंगल में पांडवों के साथ चल पड़े।

अब धृतराष्ट्र को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने संजय को बुलाया और कहा- तुम विदुर को समझा बुझाकर वापिस लाओ। संजय फटाफट पांडवों के पास पहुँचे और विदुर से कहा- धृतराष्ट्र अपनी गलती पर काफ़ी दुखी हैं। आप अगर वापस नहीं लौटेंगे तो वे अपना प्राण त्याग देंगे। कृपया आप अभी लौट चलिए।

यह सुनकर विदुर पांडवों से विदा लेकर हस्तिनापुर लौट आए। जब विदुर लौटकर हस्तिनापुर गए तो धृतराष्ट्र ने उन्हें गले लगा लिया और खुशी से बोले-“निर्दोष विदुर! मैं उतावलापन में जो भला-बुरा कह बैठा, बुरा मत मानना और मुझे क्षमा कर देना।”

एक दिन महर्षि मैत्रेय धृतराष्ट्र के दरबार में आए। धृतराष्ट्र ने उनका समुचित आदर सत्कार किया।

फिर महर्षि से कुरु जंगल में रहने वाले पांडवों की कुशलक्षेम पूछा। महर्षि मैत्रेय ने बताया कि पांडवों से काम्यक वन में भेंट हुई थी। उनसे हस्तिनापुर में घटित चौसर प्रसंग को सुनकर ही मैं आपके पास आया हूँ। आपके और भीष्म के रहते यह अच्छा नहीं हुआ। सभा में उपस्थित दुर्योधन से महर्षि ने कहा-“राजकुमार तुम्हारी भलाई के लिए कहता हूँ सुनो! पांडवों को धोखा देने का विचार छोड़ दो। उनसे वैर मोल मत लो। उनके साथ संधि कर लो! इसी में तुम्हारी भलाई है।”

किंतु दुर्योधन पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ। दुर्योधन के व्यवहार में ढिठाई देखकर महर्षि ने क्रोधित होकर कहा दुर्योधन ध्यान रखो अपने घमंड का फल तुम्हें अवश्य मिलेगा।

इस बीच हस्तिनापुर में घटी घटनाओं की खबर मिलते ही श्रीकृष्ण पांडवों से मिलने वन में ही पहुँचे। उनके साथ कैकेय, राजा भोज, वृष्टि जाति के नेता, चेदिराज धृष्टकेतु भी उनके साथ आए।

सब बड़े प्रेम से आपस में मिले। द्रौपदी जब श्रीकृष्ण से मिली तो उसके आँखों में अविरल अश्रुधारा बह चली। वह बोली, इस तरह अपमानित होने के बाद मेरा जीवन ही बेकार है। अब मेरा कोई नहीं रहा, आप भी मेरे नहीं रहे। करुण स्वर में विलाप करती हुई द्रौपदी को श्रीकृष्ण ने समझाया और बोले बहन द्रौपदी, जिसने आपका अपमान किया है उन सबकी मौत युद्ध के मैदान में निश्चित है। आप शोक मत कीजिए। मैं वचन देता हूँ कि पांडवों की हर प्रकार से सहायता करूँगा। यह भी निश्चय मानो कि तुम साम्राज्ञी के पद को फिर सुशोभित करोगी।

इसके बाद श्रीकृष्ण सुभद्रा और अभिमन्यु को लेकर द्वारका को लौट गए। धृष्टद्युम्न द्रौपदी के पुत्रों को लेकर पांचाल देश लौट गया।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-43- आग्रह – अनुरोध, अकसर – प्रायः, बराबर, व्यतीत – बिताना, उतावली – शीघ्रता के भाव, समुचित – उचित तरीके से, बुद्धिमता – बुद्धिमान।
पृष्ठ संख्या-44- नासमझ – मूर्ख, ढिठाई, धृष्टता, अशिष्टता, समेत – सहित, श्रद्धा – मन से सम्मान देना, अविरल – सतत्, लगातार।