Mode of Action of Chemical Agents

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Mode of Action of Chemical Agents

Chemical agents act on microorganisms by:

  • They may damage the lipids and proteins of the cytoplasmic membrane of microorganisms.
  • They may denature microbial enzymes and other proteins usually by disrupting the hydrogen and disulfide bonds that give the protein its 3-D shape. This blocks metabolism function.

Modes Of Action

Mechanisms Of Resistance:-

  • Most antimicrobials fall into one of four main categories, based on their site of activity.
  • These include inhibition of cell wall synthesis, protein synthesis, nucleic acid synthesis, or disruption of cell membrane integrity.

There are a number of factors which influence the antimicrobial action of disinfectants and antiseptics, including:-

  • The concentration of the chemical agent.
  • The temperature at which the agent is being used.
  • The number of microorganisms present.
  • The nature of the material bearing the microorganisms.
  • The chemical agent that kills bacteria is Bactericide.

Class 12 Hindi Vitan Chapter 3 Summary अतीत में दबे पाँव

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अतीत में दबे पाँव Summary Notes Class 12 Hindi Vitan Chapter 3

अतीत में दबे पाँव पाठ का सारांश

“अतीत में दबे पाँव’ साहित्यकार ओम थानवी’ द्वारा विरचित एक यात्रा-वृतांत है। वे पाकिस्तान स्थित सिंधु घाटी सभ्यता के दो महानगरों। मोहनजोदड़ो (मुअनजोदड़ो) और हड़प्पा के अवशेषों को देखकर अतीत के सभ्यता और संस्कृति की कल्पना करते हैं। अभी तक जितने भी पुरातात्विक प्रमाण मिले उनको देखकर साहित्यकार अपनी कल्पना को साकार करने की चेष्टा करते हैं।

लेखक का मानना है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा प्राचीन भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के दो सबसे पुराने और योजनाबद्ध तरीके से बसे शहर माने जाते हैं। वे मोहनजोदड़ो को ताम्रकाल का सबसे बड़ा शहर मानते हैं। लेखक के अनुसार मोहनजोदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का केंद्र है और शायद अपने जमाने की राजधानी जैसा। आज भी इस आदिम शहर की सड़कों और गलियों में सैर की जा सकती है। यह शहर अब भी वहीं है, जहाँ कभी था। आज भी वहाँ के टूटे घरों की रसोइयों में गंध महसूस की जा सकती है।

आज भी शहर के किसी सुनसान रास्ते पर खड़े होकर बैलगाड़ी की रुन-झुन की आवाजें सुनी जा सकती हैं। खंडहर बने घरों की टूटी सीढ़ियाँ अब चाहे कहीं न ले जाती हों, चाहे वे आकाश की ओर अधूरी रह गई हों, लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर यह अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर चढ़ गए हैं। वहाँ चढ़कर आप इतिहास को नहीं बल्कि उससे कहीं आगे देख रहे हैं।

मोहनजोदड़ो में सबसे ऊंचा चबूतरा बौद्ध स्तूप है। अब यह केवल मात्र एक टीला बनकर रह गया है। इस चबूतरे पर बौद्ध भिक्षुओं के कमर भी हैं। लेखक इसे नागर भारत का सबसे पुराना लैंडस्केप मानते हैं। इसे देखकर रोमांचित होना स्वाभाविक है। यह स्तूपवाला चबूतरा शहर के एक खास हिस्से में स्थित है। इस हिस्से को पुरातत्व के विद्वान ‘गढ़’ कहते हैं। ये ‘गढ़’ कभी-न-कभी राजसत्ता या धर्मसत्ता के केंद्र रहे होंगे ऐसा भी माना जा सकता है। इन शहरों की खुदाई से यह स्पष्ट हो जाता है कि बाकी बड़ी इमारतें, सभा-भवन, ज्ञानशाला सभी अतीत की चीजें कही जा सकती है परंतु यह ‘गढ़ उस द्वितीय वास्तुकला कौशल के बाकी बचे नमूने हैं।

मोहनजोदड़ो शहर की संरचना नगर नियोजन का अनूठा प्रमाण है, उदाहरण है। यहाँ की सड़कें अधिकतर सीधी हैं या फिर आडी हैं। आज के वास्तुकार इसे ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं। आज के नगरों के सेक्टर कुछ इसी नियोजन से मेल खाते हैं। आधुनिक परिवेश के इन सेक्टरवादी नागरिकों में रहन-सहन को लेकर नीरसता आ गई है। प्रत्येक व्यक्ति अपने-आप में खोया हुआ है, दुनियादारी के अपनत्व में उसे विश्वास नहीं रहा है।

मोहनजोदड़ो शहर में जो स्तूप मिला है उसके चबूतरे के गढ़ के पीछे ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती है। इस बस्ती के पीछे पाँच किलोमीटर दूर सिंध नदी बहती है। अगर इन उच्च वर्गीय बस्ती से दक्षिण की तरफ़ नजर दौड़ाएँ तो दूर तक खंडहर, टूटे-फूटे घर दिखाई पड़ते हैं। ये टूटे-फूटे घर शायद कारीगरों के रहे होंगे। चूकिनिम्न वर्ग के घर इतनी मजबूत सामग्री के नहीं बने होंगे शायद इसीलिए उनके अवशेष भी. उनकी गवाही नहीं देते अर्थात इस पूरे शहर में गरीब बस्ती कहाँ है उसके अवशेष भी नहीं मिलते। टीले की दाई तरफ़ एक लॉबी दिखती है। इसके आगे एक महाकुंड है। इस गली को इस धरोहर के प्रबंधकों ने ‘देव मार्ग’ कहा है।

यह महाकुंड चालीस फुट लंबा और पच्चीस फुट चौड़ा है। यह उस सभ्यता में सामूहिक स्नान के किसी अनुष्ठान का प्रतीक माना जा सकता है। इसकी गहराई रगत फुट है तथा उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियाँ उतरती हैं। इस महाकुंड के तीन तरफ़ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं उत्तर में एक पंक्ति में आठ स्नानघर हैं। यह वास्तुकला का एक नमूना ही कहा जाएगा क्योंकि इन सभी स्नानघरों के मुँह एक-दूसरे के सामने नहीं खुलते। कुंड के तल में पक्की ईंटों का जमाव है ताकि कुंड का पानी रिस न सके और अशुद्ध पानी कुंड में न आ सके। कुंड में पानी भरने के लिए पास ही एक कुआँ है। कुंड से पानी बाहर निकालने के लिए नालियाँ बनी हुई हैं। ये नालियाँ पक्की ईंटों से बनी हैं तथा ईंटों से ढकी हुई भी हैं। पुरातात्विक वैज्ञानिकों का मानना है कि पानी निकासी का ऐसा सुव्यवस्थित बंदोबस्त इससे पहले इतिहास में दूसरा नहीं है।

महाकुंड के उत्तर-पूर्व में एक बहुत लंबी इमारत के खंडहर बिखरे पड़े हैं। इस इमारत के बीचोंबीच एक खुला आँगन है। इसके तीन तरफ बरामदे हैं। ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि इसके साथ कभी छोटे-छोटे कमरे भी होंगे। ये कमरे और बरामदे धार्मिक अनुष्ठानों में ज्ञानशालाओं का काम देते थे। इस दृष्टि से देखें तो इस इमारत को एक ‘धार्मिक महाविद्यालय’ कहा जा सकता है। गढ़ से थोड़ा आगे । कुछ छोटे टीलों पर बस्तियाँ हैं। इन बस्तियों को ‘नीचा नगर’ कहकर पुकारा जाता है।

– पूर्व में बसी बस्ती ‘अमीरों की बस्ती’ है। आधुनिक युग में अमीरों की बस्ती पश्चिम में मानी जाती है। यानि कि बड़े-बड़े घर, चौड़ी सड़कें, ज्यादा कुएँ। मोहनजोदड़ो में यह उलटा था। शहर के बीचोंबीच एक तैंतीस फुट चौड़ी लंबी सड़क है। मोहनजोदड़ो में बैलगाड़ी होने के प्रमाण मिले हैं शायद इस सड़क पर दो बैलगाड़ियाँ एक साथ आसानी से आ-जा सकती हैं। यह सड़क बाजार तक जाती है। इस सड़क के दोनों ओर घर बसे हुए हैं। परंतु इन घरों की पीठ सड़कों से सटी हुई हैं। कोई भी घर सड़क पर नहीं खुलता। लेखक के अनुसार,
“दिलचस्प संयोग है कि चंडीगढ़ में ठीक यही शैली पचास साल पहने लू काबूजिए ने इस्तेमाल की।” चंडीगढ़ का कोई घर सड़क की ।

तरफ़ नहीं खुलता। मुख्य सड़क पहले सेक्टर में जाती है फिर आप किसी के घर जा सकते हैं। शायद चंडीगढ़ के वास्तुकार का—जिए ने यह सीख मोहनजोदड़ो से ही ली हों? ऐसा भी अनुमान लगाया जा सकता है। शहर के बीचोंबीच लंबी सड़कें और दोनों तरफ़ समांतर ढकी हुई नालियाँ हैं। बस्ती में ये नालियाँ इसी रूप में हैं। प्रत्येक घर में एक स्नानघर भी है। घर के अंदर से मैले पानी की नालियाँ बाहर हौदी तक आती हैं और फिर बड़ी नालियों में आकर मिल जाती हैं।

कहीं-कहीं वे खुली हो सकती हैं परंतु अधिकतर वे ऊपर से ढकी हुई हैं। इस प्रकार सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मोहनजोदड़ो के नागरिक स्वास्थ्य के प्रति कितने सचेत थे। शहर के कुएँ भी दूर से ही अपनी ओर प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान खींचते हैं। ये कुएँ पक्की-पक्की ईंटों के बने हुए हैं। पुरातत्व विद्वानों के अनुसार केवल मोहनजोदड़ो में ही सात सौ के लगभग कुएँ हैं। इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता संसार में पहली ज्ञात संस्कृति है जो कुएँ खोदकर भू-जल तक पहुँची। लेखक यह भी प्रश्न उठाते हैं कि नदी, कुएँ, : कुंड स्नानघर और बेजोड़ पानी निकासी को क्या हम सिंधु घाटी की सभ्यता को जल संस्कृति कह सकते हैं।

मोहनजोदड़ो की बड़ी बस्ती में घरों की दीवारें ऊँची और मोटी हैं। मोटी दीवार से यह अर्थ लगाया जा सकता है कि यह दो मंजिला घर होगा। इन घरों की एक खास बात यह है कि सामने की दीवार में केवल प्रवेश द्वार है कोई खिड़की नहीं है। ऊपर की मंजिल में खिड़कियाँ हैं। कुछ बहुत बड़े घर भी हैं शायद इनमें कुछ लघु उद्योगों के कारखाने होंगे। ये सभी छोटे-बड़े घर एक लाइन में हैं। अधिकतर घर लगभग तीस गुणा तीस फुट के हैं। सभी घरों की वास्तुकला लगभग एक जैसी है। एक बहुत बड़ा घर है जिसमें दो आँगन और बीस कमरे हैं। इस घर को ‘मुखिया’ का घर कहा जा सकता है। घरों की खुदाई से एक दाढ़ीवाले याजक-नरेश’ और एक प्रसिद्ध ‘नर्तकी’ की मूर्तियाँ भी मिली हैं।

‘नर्तकी’ की मूर्ति अब दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी हुई है। यहीं पर एक बड़ा घर भी है जिसे ‘उपासना केंद्र’ भी समझा जा सकता है। इसमें आमने-सामने की दो चौड़ी सीढ़ियाँ ऊपर की मंजिल की ओर जाती हैं। ऊपर की मंजिल अब बिलकुल ध्वस्त हो चुकी है। नगर के पश्चिम में एक ‘रंगरेज का कारखाना’ भी मिला है जिसे अब सैलानी बड़े चाव से देखते हैं। घरों के बाहर कुछ कुएँ सामूहिक प्रयोग के लिए हैं। शायद ये कुएँ कर्मचारियों और कारीगरों के लिए घर रहे होंगे।

बड़े घरों में कुछ छोटे कमरे हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि शहर की आबादी काफ़ी रही होगी। एक विचार यह भी हो सकता है कि ऊपर की मंजिल में मालिक और नीचे के घरों में नौकर-चाकर रहते होंगे। कुछ घरों में सीढ़ियाँ नहीं हैं शायद इन घरों में लकड़ी की सीढ़ी रही है जो बाद में नष्ट हो गई होगी। छोटे घरों की बस्ती में संकरी सीढ़ियाँ हैं। इन सीढ़ियों के पायदान भी ऊँचे हैं। शायद ऐसा जगह की कमी के कारण होता होगा।

लेखक ने अपनी यात्रा के समय जब यह ध्यान दिया कि खिड़कियों और दरवाजों पर छज्जों के निशान नहीं हैं। गरम इलाकों में ऐसा होना आम बात होती है। शायद उस समय इस इलाके में इतनी कड़ी धूप न पड़ती हो। यह तथ्य भी पूरी तरह से स्थापित हो चुका है कि उस समय अच्छी खेती होती थी। यहाँ लोग खेतों की सिंचाई कुओं से करते थे। नहर के प्रमाण यहाँ नहीं मिलते शायद लोग वर्षा के पानी पर अधिक निर्भर रहते होंगे। बाद में वर्षा कम होने लगी हो और लोगों ने कुओं से अधिक पानी निकाला होगा। इस प्रकार भू-जल का स्तर काफ़ी नीचे चला गया हो। यह भी हो सकता है कि पानी के अभाव में सिंधु घाटी के वासी यहाँ से उजड़कर कहीं चले गए हों और सिंधु घाटी की समृद्ध सभ्यता इस प्रकार नष्ट हो गई हो। लेखक के इस अनुमान से इनकार नहीं किया जा सकता।

मोहनजोदड़ो के घरों और गलियों को देखकर तो अपने राजस्थान का भी खयाल हो आया। राजस्थान और सिंध-गुजरात की दृश्यावली । एक-सी है। मोहनजोदड़ो के घरों में टहलते हुए जैसलमेर के मुहाने पर बसे पीले पत्थरों के खूबसूरत गाँव की याद लेखक के जहन में ताजा हो आई। इस खूबसूरत गाँव में हरदम गरमी का माहौल व्याप्त है। गाँव में घर तो है परंतु घरों में लोग नहीं हैं। कहा जाता है कि कोई डेढ़ सौ साल पहले राजा के साथ तकरार को लेकर इस गाँव के स्वाभिमानी नागरिक रातोंरात अपना घर-बार छोड़कर चले गए थे। बाद में इन घरों के दरवाजे, खिड़कियाँ लोग उठाकर ले गए थे। अब ये घर खंडहर में परिवर्तित हो गए हैं।

परंतु ये घर ढहे नहीं। इन घरों की खिड़कियों, दरवाजों और दीवारों को देखकर ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। लोग चले गए लेकिन वक्त वहीं रह गया। खंडहरों ने उसे वहाँ रोक लिया हो। जैसे सुबह गए लोग शाम को शायद वापस लौट आएँ।। मोहनजोदड़ो में मिली ठोस पहियोंवाली बैलगाड़ी को देखकर लेखक को अपने गाँव की बैलगाड़ी की याद आ गई जिसमें पहले दुल्हन । बैठकर ससुराल आया करती थी। बाद में इन गाड़ियों में आरेवाले पहिए और अब हवाई जहाज से उतरे हुए पहियों का प्रयोग होने लगा।

Factors Influencing the Antimicrobial

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Factors Influencing the Antimicrobial

The following factors will affects the activity of a disinfectant or antiseptic and these should be borne in mind during use.

a. The Concentration and kind of a chemical agent used:-

The higher the concentration of the germicide the greater will be the rate of killing. This is particularly important with the phenolic group of compounds, whose activity falls off very rapidly with dilution.

b. Time of exposure to the agent:-

In general germicidal activity is increased with time and a sufficient exposure is imperative for efficient disinfection.

c. Temperature at which the agent is used:-

An increase of temperature will also raise the rate of killing.

d. Presence of Organic matter:-

Most germicides are reduced in activity by the presence of organic matter and particularly by the presence of proteins such as those in body fluids.

e. Number of organisms present:-

The larger the number of organisms, the greater will be the time required for disinfection.

f. The kinds of microorganisms present – Presence of spores:-

Spores are exceptionally resistant to the great majority of disinfection.

Control of Microorganisms by Chemical Methods – Disinfectants, Antiseptics and Antibiotics

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Control of Microorganisms by Chemical Methods –  Disinfectants, Antiseptics and Antibiotics

Disinfection is the elimination of microorganisms from inanimate objects or surfaces. The term disinfectant is used for an agent used to disinfect inanimate objects or surfaces but is generally toxic to use on human tissues.

Antiseptic refers to an agent that kills or inhibits growth of microorganisms but is safe to use on human tissues. Antibiotics produced by microorganisms which kill or inhibit the growth of other microbes.

Following Table gives few examples of antimicrobial chemical agents that destroy unwanted microorganisms.

Disinfectants

Antiseptics

Antibiotics

Chlorine, CopperPhenol, Tincture IodinePencillin, Streptomycin

Basic terms used in chemical control of microorganism are mentioned in Table 3.1 and Table 3.2 Describes the difference between Bactericidal and Bacteriostatic agents.

Basic terms used in Chemical sterilization.

Term

Meaning

DisinfectionThe selective elimination of certain undesirable microorganisms to prevent their transmission directed against their metabolism or structure; applies to the use directly on inanimate objects.
AntisepsisPrevention of the growth or activity of microorganisms by inhibition or killing; applies to the use of chemicals on living tissue
– cideSuffix used to denote agents, usually chemical, that kill. Commonly used terms are bactericide, fungicide, virucide, and algicide. The term germicide is used if the agents kill pathogens but not necessarily spores. An agent that kills bacterial spores is a sporicide.
– StaticSuffix used to denote agents, usually chemical, that prevents growth but do not necessarily kill the organism or bacterial spores. Commonly used terms include bacteriostatic and fungistatic.

Difference between Bactericidal and Bacteriostatic

Bactericidal

Bacteriostatic

Bactericidal refers to agents that kill bacteriaBacteriostatic refers to agents that prevent the growth of bacteria
Action is irreversibleAction is reversible
Inhibit the cell wall formation of bacteriaInhibit DNA replication and protein synthesis of bacteria
Do not work with the immune system of the hostWork with the immune system of the host to prevent the growth and reproduction of bacteria
Minimal Bactericidal Concentration (MBC) refers to the concentration of the drug required to kill 99.99% of the bacterial population.Minimal Inhibitory Concentration (MIC) is the minimum drug concentration which inhibits the bacterial growth.
Examples include betalactam antibiot­ics, cephalosporins, and vancomycin.Examples include tetracyclines, spectinomycin, chloramphenicol, sulfonamides, etc.

Class 12 Hindi Vitan Chapter 2 Summary जूझ

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जूझ Summary Notes Class 12 Hindi Vitan Chapter 2

जूझ पाठ का सारांश

‘जूझ’ मराठी के सुविख्यात कथाकार डॉ. आनंद यादव का बहुचर्चित एवं उल्लेखनीय आत्मकथात्मक उपन्यास है। इस पाठ में उपन्यास के कुछ अंश मात्र ही उद्धृत किए गए हैं। यह उपन्यास साहित्य अकादमी पुरस्कार (1990) से सम्मानित किया जा चुका है। ‘जूझ’ एक किशोर द्वारा भोगे हुए गवई (ग्रामीण) जीवन के खुरदरे यथार्थ और आंचलिक परिवेश की जीवंत गाथा है। अपने बचपन को याद करते हुए लेखक कहता है कि मेरा मन पाठशाला जाने के लिए बेचैन रहता था। परंतु मेरे पिता मुझे पाठशाला नहीं भेजना चाहते थे। वे स्वयं कोई काम न करके खेत का सारा काम मुझसे करवाते थे। इसलिए उन्हें मेरा पाठशाला जाना बिलकुल भी पसंद नहीं था।

एक दिन जब लेखक साथ कंडे थापने में अपनी माँ की सहायता कर रहा था तो वह अपनी माँ से पाठशाला जाने की इच्छा व्यक्त करता है। परंतु माँ भी आनंदा (लेखक) के पिता से बहुत डरती थी इसलिए वह अपने बेटे का खुला समर्थन नहीं कर सकी। लेखक स्वयं अपनी माँ से कहता है कि खेत के लगभग वे सभी काम खत्म हो गए जो मैं कर सकता था इसलिए तू मेरे पढ़ने की बात दत्ता जी राव सरकार से क्यों नहीं करती। चूंकि लेखक के पिता दत्ता जी राव के सामने नतमस्तक हो जाते थे और उनकी कोई भी बात मानने के लिए। बाध्य थे इसलिए लेखक को लगता है कि दत्ता जी राव ही मेरे पाठशाला का रास्ता खोल सकते हैं।

रात के समय माँ-बेटा दोनों दत्ता जी राव के घर अपनी फ़रियाद लेकर जाते हैं। माँ दत्ता जी राव को सब कुछ बता देती है कि वह (पिता) सारा दिन बाजार में रखमाबाई के पास गुजार देता है, और खेतों में काम आनंदा को करना पड़ता है। यह बात सुनकर दत्ता जी राव चिढ़ गए और उन्होंने लेखक के पिता को समझाने का आश्वासन देकर दोनों को घर भेज दिया।

दत्ता जी राव के बाड़े का बुलावा दादा (पिता जी) के लिए सम्मान की बात थी इसलिए बड़ी खुशी से दादा दत्ता जी राव के बाड़े में जाते हैं। आधे घंटे बाद बुलाने के बहाने लेखक भी वहीं चला जाता है। दत्ता जी राव लेखक को भी वहीं बैठा लेते हैं। बातचीत में दत्ता -जी राव लेखक से पूछते हैं, “कौन सी कक्षा में पढ़ता है रे तू?” लेखक कहता है, “जी पाँचवीं में पढ़ता था किंतु अब नहीं जाता हूँ। वार्तालाप में लेखक दत्ता जी राव को यह बता देता है कि मुझे पाठशाला दादा नहीं जाने देते। दत्ता जी ने दादा पर खूब गुस्सा किया। “तू लुगाई (पत्नी) और बच्चों को काम में जोत कर किस तरह खुद गाँवभर में खुले साँड की तरह घूमता है।”

अंत में दत्ता जी आनंदा (लेखक) को सुबह पाठशाला.जाने को कहते हैं। दादा मेरे (आनंद) के पाठशाला जाने पर मान तो गए परंतु पाठशाला ग्यारह बजे होती। है इसलिए दिन निकलते ही खेत पर हाजिर होने के बाद खेत से सीधे पाठशाला जाना, सवेरे पाठशाला जाने के लिए बस्ता खेत में ही ले आना, छुट्टी होते ही सीधा खेत में आना और जब खेत में काम अधिक हो तो पाठशाला से गैर-हाजिर भी हो जाना आदि आदेश भी देते. हैं। आनंदा दादा की सारी बातें मंजूर कर लेता है। उसका मन आनंद से उमड़ रहा था। परंतु दादा का मन आनंदा को पाठशाला भेजने के लिए अभी भी तैयार नहीं था। वे फिर कहते हैं, “हाँ। अगर किसी दिन खेत में नहीं आया तो गाँव में जहाँ मिलेगा। वहीं कुचलता हूँ कि नहीं-तुझे। तेरे ऊपर पढ़ने का भूत सवार हुआ है। मुझे मालूम है, बलिस्टर नहीं होनेवाला है तू? आनंदा गरदन नीची करके खाना खाने ।

लगा था। अगले दिन आनंदा का पाठशाला में जाना फिर शुरू हो गया। वह गरमी-सरदी, हवा-पानी, भूख-प्यास आदि की बिलकुल भी परवाह नहीं करता था। खेतों के काम की चक्की में पिसते रहने से अब उसे छुटकारा मिल गया था। खेतों के काम की चक्की की अपेक्षा पाठशाला में मास्टर की छड़ी की मार आनंदा को अधिक अच्छी लगती थी। वह इस मार को भी मजे में सहन कर रहा था। गरमी की कड़क दोपहरी का समय पाठशाला की छाया में व्यतीत हो गया। आनंदा (लेखक) की पांचवीं कक्षा में उसके पहचान के दो ही लड़के थे। उसकी पहचान के सभी लड़के अगली कक्षा में चले गए थे। अपनी उम्र से कम उम्र के बच्चों के साथ कक्षा में बैठना आनंदा को बुरा लग रहा था। पुरानी पुस्तकों को वह लट्ठे के बने बस्ते में ले गया था। लेकिन वे अब पुरानी हो चुकी थीं।

आनंदा (लेखक) की कक्षा में एक शरारती लडका ‘चहवाण’ भी था। वह सदा आनंदा की खिल्ली उडाया करता था। वह उसके मैले गमछे को कक्षा में इधर-उधर फेंकने लगता है इतने में मास्टर जी आ गए और गमछा टेबल पर ही रह गया। आनंदा की धड़कन बढ़ गई और उसका दिल धक-धक करने लगा। पूछता से मास्टर को जब यह पता चला कि यह शरारत चहवाण ने की है तो वे उसे खूब लताड़ते हैं। लेखक के बारे में पूछने के बाद उन्होंने वामन पंडित की एक कविता पढ़ाई छुट्टी के बाद भी कई शरारती लड़कों ने उसकी धोती कई बार खींची थी। आनंदा का मन उदास हो गया क्योंकि कक्षा में कोई भी अपना नहीं था परंतु आनंदा ने पाठशाला जाना बंद नहीं किया।

पाठशाला में मंत्री नामक मास्टर जी गणित पढ़ाया करते थे। वे प्रायः छड़ी का प्रयोग नहीं करते थे बल्कि कमर में घुसा लगाते थे। शरारती बच्चे उनके सामने उधम नहीं मचा सकते थे। वसंत पाटिल नाम का एक लड़का शरीर से दुबला-पतला, किंतु बहुत होशियार था। उसके सवाल अकसर ठीक हुआ करते थे। कक्षा में उसका खूब सम्मान था। यह वसंत पाटिल आनंदा से उम्र में छोटा था। क्योंकि आनंदा ने पाठशाला छोड़कर ग़लती की थी परंतु फिर भी मास्टर जी को कक्षा की मॉनीटरी आनंदा को ही सौंपनी पड़ी। आनंदा अब पहले से ज्यादा पढ़ाई करने लगा था। हमेशा कुछ न कुछ पढ़ता रहता था।

अब गणित के सवाल उसकी समझ में आने लगे थे। वह वसंत पाटिल के साथ दूसरी तरफ़ से बच्चों के सवाल जाँचने लगा। फलस्वरूप आनंदा और वसंत पाटिल की दोस्ती जमने लगी थी। मास्टर जी अब लेखक को ‘आनंदा’ कहकर पुकारने लगे थे। आनंदा की मास्टरों के साथ आत्मीयता बढ़ गई और पाठशाला में उसका विश्वास भी बढ़ गया। पी पाठशाला में न० वा० सौंदलगेकर मराठी के मास्टर थे। जब वे मराठी में कोई कविता पढ़ाते तो स्वयं भी उसमें खूब रम जाते थे।

उनके पास सुरीला गला, छंद की बढ़िया चाल और रसिकता सब कुछ था। उन्हें मराठी की कविताओं के साथ अंग्रेजी की कविताएँ भी कंठस्थ थीं। वे कविता को सुनाते-सुनाते अभिनय भी किया करते थे। वे स्वयं भी कविता लिखा करते थे। जब मास्टर जी अपनी लिखी कोई कविता सुनाते थे तो आनंदा उन्हें तल्लीनता के साथ सुना करता था। वह अपनी आँखों और प्राणों की सारी शक्ति लगाकर दम रोककर मास्टर जी के हाव-भाव, चाल, गति और रस का आनंद लेता था।

जब आनंदा खेत में काम करता था तो भी मास्टर जी के हाव-भाव, यति-गति और आरोह-अवरोह के अनुसार ही गाया करता था। वह कविता गाने के साथ-साथ अभिनय भी करने लगा था। पानी से क्यारियाँ कब भर जाती थीं उसे पता ही नहीं चलता था। पहले आनंदा को अकेलापन कचोटता था परंतु अब वह कविता गाकर अपने अकेलेपन को खत्म कर सकता था। अब वह अपने आप से ही खेलने लगा था बल्कि अब उसे अकेलापन अच्छा लगने लगा था क्योंकि अकेलेपन में वह कविताएँ गाकर नाचता भी था और अभिनय भी करता था।

अब वह कुछ अपनी भी कविताएँ बनाने लगा। एक बार तो मास्टर जी के कहने पर उसने बड़ी कक्षा के बच्चों के सामने कविता सुनाई थी। इस तरह आनंदा के अब कुछ नए पंख निकल आए थे। वह अपने मराठी-मास्टर के घर से काव्य-संग्रह लाकर पढ़ता था। अब आनंदा को भी लगने लगा था कि वह खेतों और गाँव के दृश्यों को देखकर कविता लिख सकता है। वह भैंस चराते धराते फ़सलों और जंगली फूलों पर तुकबंदी कर कविता लिखने लगा था। जब किसी रविवार को कोई कविता बन जाती तो सोमवार को मास्टर जी को दिखाता था। मास्टर जी आनंदा को शाबाशी दिया करते थे। मास्टर जी यह भी बताते थे कि भाषा, छंद, लय, अलंकार और शुद्ध लेखन कविता को सुंदर बना देते हैं। मास्टर जी की ये सभी बातें उसे मास्टर जी के और नजदीक ले आई। । अब वह शब्दों के नशे में डूबने लगा था।