NCERT Solutions for Class 9 Hindi Sanchayan Chapter 3

NCERT Solutions for Class 9 Hindi Sanchayan Chapter 3 कल्लू कुम्हार की उनाकोटी

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पाठ्य-पुस्तक के बोध-प्रश्न

प्रश्न 1.
‘उनाकोटी’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए बतलाएँ कि यह स्थान इस नाम से क्यों प्रसिद्ध है? [CBSE]
उत्तर:
उन’ का अर्थ है-एक कम और कोटि का अर्थ है-करोड़। इस प्रकार उनाकोटी का शाब्दिक अर्थ है-एक करोड़ से एक कम। इस नाम के संबंध में एक पौराणिक कथा यह है कि पहले यहाँ कल्लू नामक कुम्हार रहता था। वह पार्वती का भक्त था। एक बार जब शिव और पार्वती आए तो कल्लू भी उनके निवास कैलाश पर्वत पर जाना चाहता था। पार्वती के कहने पर शिव उसे ले जाने को तैयार हो गए परंतु एक रात में एक लाख मूर्तियाँ बनाने की शर्त रख दी। कल्लू ने रात भर परिश्रम से मूर्तियाँ बनाई परंतु वे एक करोड़ से एक कम निकली। इसी बात से शिव कल्लू को वहीं छोड़कर चले गए। तब से इसका नाम उनाकोटी पड़ गया।

प्रश्न 2.
पाठ के संदर्भ में उनाकोटी में स्थित गंगावतरण की कथा को अपने शब्दों में लिखिए। [CBSE]
उत्तर:
पहाड़ों को अंदर से काटकर यहाँ विशाल आधार मूर्तियाँ बनी हैं। एक विशाल चट्टान ऋषि भागीरथ की प्रार्थना पर स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगा अवतरण की पौराणिकता को चित्रित करती है। गंगा अवतरण के धक्के से कहीं पृथ्वी धंसकर पाताल लोक में न चली जाए। शिव को इसके लिए तैयार किया गया कि वे गंगा को अपनी जटाओं में उलझा लें और इसके बाद उसे धीरे-धीरे पृथ्वी पर बहने दें। शिव का चेहरा एक चट्टान पर बना हुआ है और उनकी जटाएँ तो पहाड़ों की चोटियों पर फैली हैं। भारत में यह शिव की सबसे बड़ी आधार मूर्ति है। पूरे साल बहनेवाला एक जल प्रपात पहाड़ों से उतरता है जिसे गंगा जितना ही पवित्र माना जाता है।

प्रश्न 3.
कल्लू कुम्हार का नाम उनाकोटी से किस प्रकार जुड़ गया? [CBSE]
उत्तर:
उनाकोटी में पार्वती भक्त कल्लू नामक कुम्हार रहता था। एक बार शिव पार्वती सहित वहाँ पधारे। कल्लू ने शिव के साथ उनके आवास स्थान कैलाश पर्वत पर जाने की जिद की। तब पार्वती ने शिव से कहा कि उसे साथ ले चलें। इस पर शिव तैयार हो गए परंतु एक शर्त रख दी कि वह रात भर में उनकी एक कोटि मूर्ति तैयार करे। कल्लू ने रातभर मूर्तियाँ तैयार की परंतु वे संख्या में एक कम निकली। शिव को उसे साथ न ले जाने का बहाना मिल गया। वे कल्लू और मूर्तियों को छोड़कर चले गए। इस प्रकार कल्लू कुम्हार का नाम उनाकोटी के साथ जुड़ गया।

प्रश्न 4.
‘मेरी रीढ़ में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई’-लेखक के इस कथन के पीछे कौन-सी घटना जुड़ी है? [CBSE 2012]
उत्तर:
त्रिपुरा के हिंसाग्रस्त मुख्य भाग में प्रवेश करने से पहले अंतिम पड़ाव टीलियामुरा ही है। राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर अगले 83 किलोमीटर यानी मनु तक की यात्रा के दौरान ट्रैफिक सी०आर०पी०एफ० की सुरक्षा में काफिले की शक्ल में चलता है। मुख्य सचिव और आईजी० सी०आर०पी०एफ० से मैंने निवेदन किया था कि वे हमें घेरेबंदी में लेकर चलनेवाले काफिले के आगे-आगे चलें। काफिला दिन में 11 बजे के आसपास चलना शुरू हुआ। सभी काम में मस्त थे उस समय तक डर की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। पहाड़ियों पर इरादतन रखे दो पत्थरों की तरफ मेरा ध्यान आकृष्ट नहीं हुआ। दो दिन पहले हमारा एक जवान यहीं विद्रोहियों द्वारा मारा गया था’ मेरी रीढ़ में एक झुरझुरी सी दौड़ गई। मनु तक की अपनी शेष यात्रा में, मैं यह ख्याल अपने दिल से निकाल नहीं पाया कि हमें घेरे हुए सी०आर०पी०एफ० के जवान हैं अन्यथा शांतिपूर्ण प्रतीत होनेवाले जंगलों में किसी जगह बंदूकें लिए विद्रोही भी छिपे हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
त्रिपुरा ‘बहुधार्मिक समाज’ का उदाहरण कैसे बना? [CBSE]
उत्तर:
त्रिपुरा तीन ओर बाँग्लादेश से तथा एक ओर भारत से घिरा है। यहाँ बाँग्लादेश से पश्चिम बंगाल से लोग घुसपैठ करके आए और यहाँ बस गए। ये लोग विभिन्न धर्मों को मानने वाले थे। त्रिपुरा में विश्व के चार बड़े धर्मों का प्रतिनिधित्व मौजूद है। इस तरह त्रिपुरा बहुधर्मी समाज का उदाहरण बनता गया।

प्रश्न 6.
टीलियामुरा कस्बे में लेखक का परिचय किन दो प्रमुख हस्तियों से हुआ? समाज-कल्याण के कार्यों में उनका क्या योगदान था?
उत्तर:
टीलियामुरा कुछ ज्यादा बड़ा गाँव है। यहाँ लेखक की मुलाकात हेमंत कुमार जमातिया से हुई, जो यहाँ के एक प्रसिद्ध लोक गायक हैं और जो 1996 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत भी हो चुके हैं। हेमंत कोकबारोक बोली में गाते हैं। टीलियामुरा शहर के वार्ड नं 3 में लेखक की मुलाकात एक और गायक मंजु ऋषिदास से हुई। ऋषिदास मोचियों के एक समुदाय का नाम है। लेकिन जूते बनाने के अलावा इस समुदाय के कुछ लोगों की । विशेषता थाप वाले वाद्यों जैसे तबला और ढोल के निर्माण और उनकी मरम्मत के काम में भी है।

मंजु ऋषिदास आकर्षण महिला थीं और रेडियो कलाकार होने के अलावा नगर पंचायत में अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व भी करती थीं। वे निरक्षर थीं लेकिन अपने वार्ड की सबसे बड़ी आवश्यकता यानी पेयजल के बारे में उन्हें पूरी जानकारी थी। नगर पंचायत को वे अपने वार्ड में नल का पानी पहुँचाने और इसकी मुख्य गलियों में ईंटें बिछाने के लिए राजी कर चुकी थीं।

प्रश्न 7.
कैलासशहर के जिलाधिकारी ने आलू की खेती के विषय में लेखक को क्या जानकारी दी? [CBSE]
उत्तर:
कैलाश नगर के जिलाधिकारी केरल से आए तेज़-तर्रार जवान थे। उन्होंने चाय के दौरान लेखक को टी.पी.एस. (तरू पोटैटो सीड) की खेती की सफलता के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि आलू की परंपरागत खेती में जहाँ दो मीट्रिक टन बीज कल्लू कुम्हार की उनाकोटी की प्रतिहेक्टेयर जरूरत पड़ती है, वहीं टी.पी.एस. की मत्र 100 ग्राम बीज की ज़रूरत होती है। त्रिपुरा से टी.पी.एस. का निर्यात असम, मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के अलावा वियतनाम, बांग्लादेश और मलेशिया को भी किया जा रहा है।

प्रश्न 8.
त्रिपुरा के घरेलू उद्योगों पर प्रकाश डालते हुए अपनी जानकारी के कुछ अन्य घरेलु उद्योगों के विषय में बताइए?
उत्तर:
त्रिपुरा में आलू की खेती के साथ-साथ अगरबत्तियों के लिए बाँस की पतली सींकें तैयार की जाती हैं। अगरबत्तियाँ बनाने के लिए इन्हें कर्नाटक और गुजरात भेजा जाता है। अन्य घरेलू उद्योगों में माचिस, साबुन, प्लास्टिक, स्टील, लकड़ी आदि के घरेलू उद्योग सर्वप्रसिद्ध हैं। घरेलू आवश्यकता प्रतिदिन बढ़ती चली जा रही है। उद्योगों में भी बहुसंख्यक दौड़ में प्रतियोगी भावनाएँ बढ़ती जा रही हैं। जूते, सीमेंट, कपड़ा उद्योग जैसे घरेलू उद्योग लघु व विशाल रूपों में फैले हुए दिखाई देते हैं।

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NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kritika Chapter 1

NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kritika Chapter 1 इस जल प्रलय में

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पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न 1.
बाढ़ की खबर सुनकर लोग किस तरह की तैयारी करने लगे? [Imp.] [CBSE]
उत्तर:
बाढ़ की खबर सुनकर लोग परेशान हो उठे। वे नीचे का सामान ऊपरी मंजिलों में पहुँचाने लगे। रिक्शा, टमटम, ट्रक टैंपो आदि में सामान लादकर अन्यत्र जाने की तैयारी करने लगे। इसके अलावा कुछ लोग घर में ईंधन, मोमबत्ती दियासलाई, पीने का पानी जैसी आवश्यक चीजें एकत्र करने लगे।

प्रश्न 2.
बाढ़ की सही जानकारी लेने और बाढ़ का रूप देखने के लिए लेखक क्यों उत्सुक था? [CBSE]
उत्तर:
लेखक उस क्षेत्र का रहने वाला था, जिसके आसपास अकसर बाढ़ आया करती थी। उसने बाढ़ देख रखा था, फिर भी 1967 में पटना में जो बाढ़ आई वह लेखक को असल जीवन में बाढ़ का अनुभव करा गई। उस साल पटना में लगातार अठारह घंटे वर्षा होती रही। उस बाढ़ की सही जानकारी लेने और बाढ़ का रूप देखने की उत्सुकता के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-

  1. यूँ तो लेखक ने दस वर्ष की आयु से बाढ़-पीड़ित क्षेत्रों में कार्य किया था, किंतु बाढ़ को भोगने का उसका अनुभव नहीं था। वह स्वयं देखना चाहता था कि बाढ़ आने पर क्या-क्या परेशानियाँ झेलनी पड़ सकती हैं।
  2. तेज गति से निचले स्थानों को आप्लावित करके आगे बढ़ता पानी देख लोगों के चेहरे पर कैसे-कैसे भाव आते हैं, उन्हें किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है? इन्हें लेखक प्रत्यक्ष रूप से देखना चाहता था।
  3. लेखक के मन में यह इच्छा भी रही होगी कि बाढ़ में फंसे लोगों के प्रति स्वयं-सेवकों, राहतकर्मियों द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वहन किस प्रकार किया जाती है तथा दूसरों को विपत्ति में देख कुछ लोगों का व्यवहार कैसा रहता है? यह भी देखा जाए।

प्रश्न 3.
सबकी जुबान पर एक ही जिज्ञासा-‘पानी कहाँ तक आ गया है?’-इस कथन से जनसमूह की कौन-सी भावनाएँ व्यक्त होती हैं?
उत्तर:
‘पानी कहाँ तक आ गया है?’ इस कथन से जनसमूह की जिज्ञासा, उत्सुकता, भय, निडरता आदि की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। इन्हीं भावनाओं के कारण वे बाढ़ के पानी की स्थिति को जानने के लिए अधीर थे।

प्रश्न 4.
‘मृत्यु का तरल दूत’ किसे कहा गया है और क्यों? [Imp.] [CBSE]
उत्तर:
‘इस जल प्रलय में” नामक पाठ के अंतर्गत ‘मृत्यु का तरल दूत’ बाढ़ के उस पानी को कहा गया है, जो ऊँचे-नीचे स्थानों को डुबोता हुआ, लोगों को भयभीत करता हुआ मृत्यु का संदेश लेकर आता है। इसे ‘मृत्यु का तरल दूत’ कहने का कारण यह है कि बाढ़ के कारण निचले स्थानों की फसलें, जानवर आदि सभी कुछ जलमग्न हो जाते हैं। कच्चे मकान धराशायी हो जाते हैं। न जाने कितने लोग बाढ़ में फंसकर अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। बाढ़ के कारण कई बार बिजली के खंभे गिर जाते हैं। इनमें प्रवाहित होने वाला करंट पानी में भी प्रवाहित होने से जल-जीव मृत्यु के शिकार बन जाते हैं।

प्रश्न 5.
आपदाओं से निपटने के लिए अपनी तरफ़ से कुछ सुझाव दीजिए।
अथवा
बाढ़ की खबर सुनकर आपदा के समय हमें क्या करना चाहिए? [CBSE]
उत्तर:
बाढ़ जैसी आपदाओं से बचने के लिए मैं कुछ सुझाव देना चाहूँगा-

  • नाले-नालियों की प्रतिवर्ष समुचित सफ़ाई की जानी चाहिए।
  • नालों में पॉलीथीन की थैलियाँ आदि बहकर नहीं जाने देना चाहिए।
  • नदी-नालों के किनारों पर तटबंध बनाना चाहिए ताकि उनकी जलधारण क्षमता बढ़ जाए और पानी बाहर न आने पाए।
  • शहरी क्षेत्रों में जलसंचयन का प्रबंधन करना चाहिए।
  • लोगों को आपदा प्रबंधन की जानकारी दी जानी चाहिए।

प्रश्न 6.
‘ईह! जब दानापुर डूब रहा था तो पटनियाँ बाबू लोग उलटकर देखने भी नहीं गए अब बूझो!’-इस कथन द्वारा लोगों की किसे मानसिकता पर चोट की गई है?
उत्तर:
पटना में बाढ़ का पानी भरता जा रहा था तभी बाढ़ देखने की उत्सुक भीड़ में से एक युवक ने कहा कि यहाँ तो सब तमाशा देखने आ गए हैं किंतु जब दानापुर डूब रहा था पटनिया बाबू लोग उसे देखने भी नहीं आए थे। इस कथन के माध्यम से पटना के लोगों की स्वार्थपरता, संकुचित मानसिकता, संवेदनहीनता, आत्म-केंद्रियता पर चोट की गई है। दानापुर जब डूब रहा था तब पटना के लोगों ने वहाँ के लोगों की सहायता नहीं की थी।

प्रश्न 7.
खरीद-बिक्री बंद हो चुकने पर भी पान की बिक्री अचानक क्यों बढ़ गई थी? [CBSE]
उत्तर:
खरीद-बिक्री बंद होने पर भी पान की बिक्री अचानक इसलिए बढ़ गई क्योंकि बाढ़ की खबर सुनकर लोगों में बेचैनी और हलचल बढ़ गई थी। यद्यपि उन्होंने सामान खरीदना बंद कर दिया था पर बाढ़ के बारे जानने के लिए अत्यंत उत्सुक थे। वे पान की दुकान के पास खड़े होकर बाढ़ के बारे में तरह-तरह की बातें कर रहे थे और पान खाए जा रहे थे। इस तरह पान वाले की बिक्री बढ़ गई थी।

प्रश्न 8.
जब लेखक को यह अहसास हुआ कि उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है तो उसने क्या-क्या प्रबंध किए? [Imp.] [CBSE]
उत्तर:
लेखक को जब अहसास हुआ कि बाढ़ का बढ़ता पानी उसके इलाके में भी घुस सकता है तो वह चिंतित हो उठा। उसने मोमबत्ती, दियासलाई, सिगरेट, पीने का पानी और कॉपोज की गोलियाँ आदि की व्यवस्था की। उसने राजेंद्र नगर चौराहे पर ‘मैगज़ीन कॉर्नर’ की सीढ़ियों पर बिछी पत्र-पत्रिकाओं में से कई हिंदी-बाँग्ला और अंग्रेजी की सिने पत्रिकाएँ खरीद लिया। उसका सोचना था कि इन पत्रिकाओं को पढ़ते हुए हफ्ते भर का समय आराम से बिताया जा सकता है।

प्रश्न 9.
बाढ़ पीड़ित क्षेत्र में कौन-कौन सी बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है?
उत्तर:
बाढ़ पीड़ित क्षेत्र में जिन बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है उनमें पकाही घाव, हैजा, आंत्रशोथ, मलेरिया जैसी बीमारियाँ प्रमुख हैं।

प्रश्न 10.
नौजवान के पानी में उतरते ही कुत्ता भी पानी में कूद गया। दोनों ने किन भावनाओं के वशीभूत होकर ऐसा किया? [Imp.]
उत्तर:
बाढ़ पीड़ित क्षेत्र में बीमार व्यक्तियों को कैंप में ले जाया जा रहा था। एक बीमार नौजवान के साथ उसका कुत्ता भी नाव पर चढ़ आया। डॉक्टर साहब भयभीत हो चिल्लाने लगे। बीमार नौजवान पानी में उतर गया। उसके उतरते ही कुत्ता भी पानी में उतर गया। युवक के पानी में उतरने का कारण यह था कि वह नौजवान कुत्ते से अपनापन तथा भावनात्मक लगाव रखता था। वह कुत्ते को अपने परिवार के सदस्य की तरह मानता था। वह अपने परिवार के इस सदस्य को कैसे छोड़कर जा सकता था? यही स्थिति कुत्ते की भी थी। उसने देखा कि जब उसका मालिक नाव से उतर गया है तो वह कैसे नाव में बैठा रहे। अपने मालिक को बाढ़ में छोड़कर वह अकेले कैंप में कैसे जाए, इसी भावना के अधीन हो कुत्ता भी नाव से उतर गया।

प्रश्न 11.
‘अच्छा है, कुछ भी नहीं। कलम थी, वह भी चोरी चली गई। अच्छा है, कुछ भी नहीं-मेरे पास।’-मूवी कैमरा, टेप रिकॉर्डर आदि की तीव्र उत्कंठा होते हुए भी लेखक ने अंत में उपर्युक्त कथन क्यों कहा?
अथवा
लेखक के पास कलम, मूवी कैमरा और टेपरिकार्डर आदि का न होना सुखद एहसास भी था-क्यों? [CBSE]
उत्तर:
लेखक के मन में मूवी कैमरा, टेपरिकार्डर आदि की तीव्र उत्कंठी थी कि ये सब उसके पास होता तो वह बाढ़ग्रस्त लोगों की तसवीरें खींचता और पानी के कल-कल के अलावा लोगों की चीख-पुकार को टेप कर लेता, पर ऐसा करने के लिए पानी के अत्यंत निकट जाना पड़ता जिसके लिए लेखक में इतना साहस न था। इसके अलावा इस तरह के दृश्य और आवाजें किसी सैलानी या संवेदनहीन व्यक्ति को आनंदित कर सकते थे, किसी संवेदनशील को नहीं। लेखक संवेदनशील व्यक्ति था, इसलिए लेखक ने अंत में उक्त कथन कहा।

प्रश्न 12.
आपने भी देखा होगा कि मीडिया द्वारा प्रस्तुत की गई घटनाएँ कई बार समस्याएँ बन जाती हैं, ऐसी किसी घटना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मीडिया द्वारा प्रस्तुत की गई घटनाएँ समस्याएँ बन जाती हैं। इसका ताजा उदाहरण-सन् 2010 के सितंबर महीने में जब दिल्ली में कई दिनों तक रुक-रुककर वर्षा होती रही तथा इन्हीं दिनों में हरियाणा सरकार द्वारा ताजेवाला के हथिनी कुंड बैराज से लाखों क्यूसेक पानी एक साथ छोड़ दिया तो यमुना उफान पर आ गई। दिल्ली में निचली कॉलोनियों तथा निचले स्थानों पर वर्षा का प्रानी जमा हो गया।

पानी नाले से बहकर यमुना में न जा सका। इस ठहरे हुए पानी को कई समाचार चैनल विभिन्न कोणों से बार-बार दिखा रहे थे, और उद्घोषणा कर रहे थे-देखिए ये लोग कैसे पानी में डूब रहे हैं। इसके अलावा यमुना में बढ़ते पानी को यूँ दिखा रहे थे, मानो पूरी दिल्ली ही डूब जाएगी। इससे लोगों में अनायास भय का वातावरण बन गया था। हैरान-परेशान जनमानस अफरा-तफरी में पड़ गया था।

प्रश्न 13.
अपनी देखी-सुनी किसी आपदा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कुछ साल पहले हम सबने सपरिवार उत्तराखंड भ्रमण का आनंद उठाने का निश्चय किया। जून के दिन थे। हम परिवार के सदस्य अपनी कार से दिल्ली से कार द्वारा देहरादून के लिए निकल पड़े। हमने पहले हरिद्वार, फिर देहरादून और फिर अन्य स्थलों को देखने के लिए दस दिनों का कार्यक्रम बनाया था। दुर्भाग्य से हरिद्वार देहरादून जाते ही बरसात शुरू हो गई। पता चला कि बदरीनाथ, केदारनाथ आदि तो बाढ़ में फँसे हैं।

सड़कें टूटने से आना-जाना बंद हो गया है। केदारनाथ का मंदिर तक क्षतिग्रस्त हो गया है। अखबारों में गाँव के गाँव बहने और लोगों के मरने की खबर पढ़कर मनभर आया। बाढ़ के दृश्य संबंधी चित्र इन स्थानों की दुर्दशा की कहानी कह रहे थे। कई स्थानों पर यातायात सुचारू होने में महीनों लग गए। अब हम आगे जाने का विचार छोड़ चुके थे और मौसम ठीक होने के दो दिन बाद दिल्ली वापस आ गए।

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NCERT Solutions for Class 9 Hindi Sparsh Chapter 4

NCERT Solutions for Class 9 Hindi Sparsh Chapter 4 तुम कब जाओगे, अतिथि

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

मौखिक

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए-

प्रश्न 1.
अतिथि कितने दिनों से लेखक के घर पर रह रहा है?
उत्तर:
अतिथि चार दिनों से लेखक के घर पर रहा है।

प्रश्न 2.
कैलेंडर की तारीखें किस तरह फड़फड़ा रही हैं?
उत्तर:
कैलेंडर की तारीखें अपनी सीमा में नम्रता से फड़फड़ा रही हैं।

प्रश्न 3.
पति-पत्नी ने मेहमान का स्वागत कैसे किया?
उत्तर:
पति ने अतिथि का स्वागत स्नेह भीगी मुस्कान से गले लगाते हुए किया, जबकि उसकी पत्नी ने सादर नमस्ते किया। पति पत्नी ने अतिथि के खान-पान का पूरा ध्यान रखा।

प्रश्न 4.
दोपहर के भोजन को कौन-सी गरिमा प्रदान की गई?
उत्तर:
दोपहर के भोजन को औपचारिक डिनर जैसा भारी भरकम बनाया गया। दो सब्जियाँ, रायता तथा एक मीठा व्यंजन तैयार किया गया।

प्रश्न 5.
तीसरे दिन सुबह अतिथि ने क्या कहा?
उत्तर-
तीसरे दिन सुबह अतिथि ने लेखक से कहा कि वह धोबी को कपड़े देना चाहता है।

प्रश्न 6.
सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर क्या हुआ?
उत्तर:
सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर लेखक ने अतिथि को डिनर की बजाय खिचड़ी खिलाई।

लिखित

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए

प्रश्न 1.
लेखक अतिथि को कैसी विदाई देना चाहता था?
उत्तर:
लेखक अतिथि को भावभीनी विदाई देना चाहता था। वह अतिथि को विदा करने के लिए स्टेशन तक जाना चाहता था, परंतु ऐसा न हो सका क्योंकि अतिथि जाना ही नहीं चाहता था।

प्रश्न 2.
पाठ में आए निम्नलिखित कथनों की व्याख्या कीजिए-

  1. अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ कॉप गया। [CBSE 2012]
  2. अतिथि सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोड़े अंशों में राक्षस भी हो सकता है।
  3. लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौड़े।
  4. मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी।
  5. एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते।

उत्तर:

  1. जब लेखक ने अपने घर आए अनचाहे अतिथि को देखा तो उसको बटुआ काँप उठा। आशय यह है कि उसे अपनी आर्थिक स्थिति डगमगाने का भय सताने लगा। उसे लगा कि इस मेहमान पर बहुत अधिक खर्च करना पड़ेगा।
  2. अतिथि हमेशा देवता नहीं रहता। यदि वह थोड़े समय के लिए रहे तो देवता प्रतीत होता है। बाद में सामान्य मनुष्य प्रतीत होने लगता है। अगर वह लंबे समय तक टिक जाए तो राक्षस जैसा बुरा लगने लगता है।
  3. घर तभी तक ‘स्वीट होम’ यानि सुमधुर और आरामदायक जान पड़ता है जब तक कि उसमें घर के सदस्य ही रहें। कोई अनचाहा अतिथि उन पर बोझ बनकर न आ टिके। अतिथि के कारण घर की सरसता समाप्त हो जाती है।
  4. लेखक मन-ही-मन अंपने अनचाहे मेहमान से कहता है-अगर तुम पाँचवें दिन भी मेरे घर से न गए तो फिर मेरी सहनशीलता समाप्त हो जाएगी। मैं अगले दिन तक तुम्हें सह नहीं पाऊँगा। तुम्हें जाने के लिए कह दूंगा।
  5. देवता तभी भाता है, जबकि वह थोड़ी देर के लिए दर्शन दे। यदि वह आकर जम जाए तो काटने दौड़ता है। मनुष्य लंबे समय तक किसी को सम्मान नहीं दे सकता। अतिथि को तो बिल्कुल नहीं। यह मानव स्वभाव के विरुद्ध है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए

प्रश्न 1.
कौन-सा आघात अप्रत्याशित था और उसका लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
तीसरे दिन सुबह अतिथि ने क्या कहा? लेखक पर उसकी क्या प्रतिक्रिया हुई? . [CBSE 2012]
उत्तर:
लेखक सोच रहा था कि अतिथि दूसरे दिन चला जाएगा पर ऐसा न हुआ। अगले दिन उसने सोचा, शायद आज अतिथि जाएगा पर जब तीसरे दिन अतिथि ने लेखक से धोबी को कपड़े देने के लिए कहा तो इसका तात्पर्य यह था कि अतिथि आज भी जाने वाला नहीं। यह लेखक के लिए अप्रत्याशित आघात था क्योंकि लेखक ने ऐसा सोचा भी न था। इससे लेखक और भी चिंताग्रस्त हो गया कि पता नहीं उसे अतिथि से कब छुटकारा मिलेगा।

प्रश्न 2.
‘संबंधों का संक्रमण के दौर से गुजरना’ इस पंक्ति से आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए। [CBSE 2012]
उत्तर:
‘संबंधों का संक्रमण के दौर से गुजरना’ का आशय है-संबंधों का बदलना। पहले जो संबंध आत्मीयतापूर्ण थे, सौहार्दपूर्ण थे, उनका अब घृणा, तिरस्कार और बोरियत में बदलना। जब अतिथि आया था तो लेखक ने उसे प्रसन्नता के साथ निभाया। उसके लिए शानदार डिनर बनवाया। अगले दिन भी उसे अच्छा लंच कराया तथा सिनेमा दिखाया। परंतु इसके बाद भी जब वह टिका रहा तो लेखक के मन में उसके प्रति तिरस्कार जागने लगा। इस प्रकार संबंध परिवर्तन के दौर से गुजरने लगे।

प्रश्न 3.
जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए? [CBSE 2012]
उत्तर:
जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो उसके व्यवहार में कई बदलाव आए, जैसे-लेखक अब गर्मजोशी से अतिथि से बातें नहीं करता था। उसने अतिथि के भोजन को डिनर से खिचड़ी पर ला दिया था। वह हर समय अतिथि के जाने की प्रतीक्षा करने लगा। उसकी सहनशीलता का अंत होने वाला था। अतिथि को गले लगाकर स्वागत करने वाला लेखक अब अतिथि को ‘गेट आउट’ कहने के लिए तैयार हो गया था।

भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्याय लिखिए-

  1. चाँद
  2. जिक्र
  3. आघात
  4. ऊष्मा
  5. अंतरंग

उत्तर:

  1. चाँद-चंद्रमा, निशाकर, मयंक
  2. जिक्र-चर्चा, संदर्भ
  3. आघात-चोट, व्याघात
  4. ऊष्मा-गर्मी, ऊर्जा, गरमाहट
  5. अंतरंग-भीतरी, अंदरूनी।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए-

  1. हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने जाएँगे। (नकारात्मक वाक्य)
    …………………………………………………………………………….
  2. किसी लॉण्ड्री पर दे देते हैं, जल्दी धुल जाएँगे। (प्रश्नवाचक वाक्य)
    …………………………………………………………………………….
  3. सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी। (भविष्यत् काल)
    …………………………………………………………………………….
  4. इनके कपड़े देने हैं। (स्थानसूचक प्रश्नवाची)
    …………………………………………………………………………….
  5. कब तक टिकेंगे ये? (नकारात्मक)
    …………………………………………………………………………….

उत्तर:

  1. हम तुम्हें स्टेशन तक नहीं छोड़ने जाएँगे।
  2. किसी लॉण्ड्री पर दे देने से क्या जल्दी धुल जाएँगे?
  3. सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो जाएगी।
  4. इनके कपड़े कहाँ देने हैं?
  5. ये नहीं टिकेंगे।

प्रश्न 3.
पाठ में आए इन वाक्यों में ‘चुकना’ क्रिया के विभिन्न प्रयोगों को ध्यान से देखिए और वाक्य संरचना को समझिए
(क) तुम अपने भारी चरण-कमलों की छाप मेरी जमीन पर अंकित कर चुके
(ख) तुम मेरी काफ़ी मिट्टी खोद चुके
(ग) आदर-सत्कार के जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हें ले जा चुके थे
(घ) शब्दों का लेन-देन मिट गया और चर्चा के विषय चुक गए
(ङ) तुम्हारे भारी भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यहीं हो।
उत्तर:
अपेक्षित नहीं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्य संरचनाओं में ‘तुम’ के प्रयोग पर ध्यान दीजिए
(क) लॉण्ड्री पर दिए कपड़े धुलकर आ गए और तुम यहीं हो।
(ख) तुम्हें देखकर फूट पड़ने वाली मुसकराहट धीरे-धीरे फीकी पड़कर अब लुप्त हो गई है।
(ग) तुम्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी।
(घ) कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूँ और तुम फिल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो।
(ङ) भावनाएँ गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही हैं, पर तुम जा नहीं रहे।
उत्तर:
अपेक्षित नहीं।

योग्यता विस्तार

प्रश्न 1.
‘अतिथि देवो भव’ उक्ति की व्याख्या करें तथा आधुनिक युग के संदर्भ में इसका आकलन करें। [CBSE 2012]
उत्तर:
‘अतिथि देवो भव’ का अर्थ है-अतिथि देवता के समान होता है। यह उक्ति कभी ठीक रही होगी। आधुनिक युग में यह उक्ति बेमानी हो गई है। आज लोगों के पास अपने लिए ही समय नहीं है। वे अतिथियों को कैसे समय दें? आज के लोग कमाने में, कैरियर बनाने में, पढ़ने-पढ़ाने में अधिक ध्यान देने लगे हैं। अतः अब अतिथि के आने पर उनकी खुशी बढ़ती नहीं, बल्कि कम होती है।

प्रश्न 2.
विद्यार्थी अपने घर आए अतिथियों के सत्कार का अनुभव कक्षा में सुनाएँ। |
उत्तर:
कल ही मेरे घर मेरे पिताजी के मित्र आए। मैंने आते ही उन्हें नमस्कार किया। उन्होंने मुझे बड़े प्यार से अपने पास बुलाया। मुझसे नाम पूछा, बातें की। तब मैं उनके लिए पानी लाया। फिर चाय-बिस्कुट लाया। वे बड़े प्यार-से मुझे निहारते रहे और बातें करते रहे। जब वे जाने लगे तो मैंने उन्हें फिर से नमस्ते की। मुझे उनका आना और बातें करना बहुत अच्छा लगा।

प्रश्न 3.
अतिथि के अपेक्षा से अधिक रुक जाने पर लेखक की क्या-क्या प्रतिक्रियाएँ हुईं, उन्हें क्रम से छाँटकर लिखिए।
उत्तर:

  • दूसरे दिन मन में आया कि बस इस अतिथि को अब और अधिक नहीं झेला जा सकता।
  • तीसरे दिन, वह राक्षस प्रतीत होने लगा।
  • चौथे दिन, मुसकान फीकी पड़ गई। ठहाके बंद हो गए। बातचीत रुक गई। डिनर की बजाय खिचड़ी बन गई। मन में आया कि उसे ‘गेट आउट’ कह दिया जाए।

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NCERT Solutions for Class 9 Hindi Sanchayan Chapter 2

NCERT Solutions for Class 9 Hindi Sanchayan Chapter 2 स्मृति

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पाठ्य-पुस्तक के बोध-प्रश्न

प्रश्न 1.
भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में किस बात का डर था?
उत्तर:
भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में पिटाई की आशंका थी। वह पिटाई और उसके संभावित कारणों के बारे में सोच रहा था कि कहीं इस कड़ी सरदी में झरबेरी के बेर खाने चले आने के कारण बड़े भाई उसे पिटाई करने के लिए तो नहीं बुला रहे हैं।

प्रश्न 2.
मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले कुएँ में ढेला क्यों फेंकती थी? [CBSE]
उत्तर:
मक्खनपुर पढ़ने जानेवाले बच्चों की टोली पूरी वानर टोली थी। उन बच्चों को पता था कि कुएँ में साँप है। वे ढेला फेंककर कुएँ में से आनेवाली उसकी क्रोधपूर्ण फुफकार सुनने में मजा लेते थे। कुएँ में ढेला फेंककर उसकी आवाज़ सुनने के बाद अपनी बोली की प्रतिध्वनि सुनने की लालसा उनके मन में रहती थी।

प्रश्न 3.
‘साँप ने फुसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं, यह बात अब तक स्मरण नहीं’-यह कथन लेखक की किस मनोदशा को स्पष्ट करता है?
उत्तर:
साँप की फुफकार होने या उसे ढेला लगने या न लगने की बात लेखक को अब तक याद नहीं, क्योंकि कुएँ में ढेला मारते समय उसकी टोपी में रखी चिट्ठियाँ चक्कर काटती हुई कुएँ में गिर रही थीं। चिठियों को यूँ गिरते देखकर लेखक अपनी भावी पिटाई को सोचकर भयभीत हो गया। उक्त कथन लेखक की भयाक्रांत, निराश और घबराहट भरी मनोदशा को स्पष्ट करता है।

प्रश्न 4.
किन कारणों से लेखक ने चिट्ठियों को कुएँ से निकालने का निर्णय लिया? [CBSE]
उत्तर:
लेखक को चिठियाँ बडे भाई ने दी थीं। यदि वे डाकखाने में नहीं डाली जातीं तो घर पर मार पडती। सच बोलकर पिटने का भय और झूठ बोलकर चिट्ठियों के न पहुँचने की जिम्मेदारी के बोझ से दबा वह बैठा सिसक रहा था। वह झूठ भी नहीं बोल सकता था। चिट्ठियाँ कुएँ में गिरी पड़ी थीं। उसका मन कहीं भाग जाने को करता था, फिर पिटने का भय और जिम्मेदारी की दुधारी तलवार कलेजे पर फिर रही थी। उसे चिट्ठियाँ बाहर निकालकर लानी थीं। अंत में उसने कुएँ से चिट्ठियाँ निकालने का निर्णय कर ही लिया।

प्रश्न 5.
साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने क्या-क्या युक्तियाँ अपनाई? [CBSE]
उत्तर:
साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने कुएँ की दीवार पर अपना पैर लगाकर कुछ मिट्टी गिराई। इससे साँप का ध्यान बँट गया और उसने मिट्टी पर जोर से मुँह मारा। लेखक ने डंडे से चिट्ठियों को सरकाया, इससे उसका ध्यान डंडे की ओर चला गया और उसने डंडे पर भरपूर वार किया। इस तरह उसने साँप का ध्यान बँटाकर चिट्ठियाँ उठाने में सफल हो गया।

प्रश्न 6.
कुएँ में उतरकर चिट्ठियों को निकालने संबंधी साहसिक वर्णन को अपने शब्दों में लिखिए। [CBSE]
अथवा
चिट्ठियों को कुएँ से निकालना मौत का सामना करना था। कैसे? स्पष्ट कीजिए। [CBSE]
उत्तर:
लेखक की चिट्ठियाँ कुएँ में गिरी पड़ी थीं। कुएँ में उतरकर चिट्ठियों को निकाल लाना साहस का कार्य था। लेखक ने इस चुनौती को स्वीकार किया और उसने छह धोतियों को जोड़कर डंडा बाँधा और एक सिरे को कुएँ में डालकर उसके दूसरे सिरे को कुएँ के चारों ओर घुमाने के बाद उसमें गाँठ लगाकर छोटे भाई को पकड़ा दिया। धोती के सहारे जब वह कुएँ के धरातल से चार-पाँच गज ऊपर था, उसने साँप को फन फैलाए देखा। वह कुछ हाथ ऊपर लटक रहा था। साँप के पास पैर लटकते थे। वह आक्रमण करने की तैयारी में था।

साँप को धोती में लटककर नहीं मारा जा सकता था। डंडा चलाने के लिए काफी जगह चाहिए थी इसलिए उसने डंडा चलाने का इरादा छोड़ दिया। उसने डंडे से चिट्ठियों को खिसकाने का प्रयास किया कि साँप डंडे से चिपक गया। साँप का पिछला भाग लेखक के हाथों को छू गया। लेखक ने डंडे को एक ओर पटक दिया। देवी कृपा से साँप के आसन बदल गए और वह चिट्ठियों को उठाने में कामयाब हो गया।

प्रश्न 7.
इस पाठ को पढ़ने के बाद किन-किन बाल-सुलभ शरारतों के विषय में पता चलता है? [CBSE]
अथवा
बच्चे किस प्रकार की शरारतों में आनंद लेते हैं? [CBSE 2012]
उत्तर:
इस पाठ को पढ़ने के बाद अनेक बाल सुलभ शरारतों का पता चलता है; जैसे-

  • बच्चे सरदी आदि की परवाह किए बिना पेड़ से फल आदि तोड़कर खाते रहते हैं।
  • उन्हें पिटाई से डर लगता है।
  • वे काम को जिम्मेदारी से करते हुए भी शरारतों में शामिल हो जाते हैं।
  • जीव-जंतुओं को सताने में उन्हें मज़ा आता है।
  • वे नासमझी में साँप जैसे जहरीले जीव से भी छेड़छाड़ करते हैं।

प्रश्न 8.
‘मनुष्य का अनुमान और भावी योजनाएँ कभी-कभी कितनी मिथ्या और उलटी निकलती हैं’-का आशय स्पष्ट कीजिए। [CBSE]
उत्तर:
मनुष्य हर स्थिति से निबटने के लिए अपना अनुमान लगाता है। वह अपने अनुसार भविष्य के लिए योजनाएँ बनाता है, पर ये योजनाएँ हर बार सफल नहीं हो पातीं। ये कई बार झूठी सिद्ध होती हैं। कई बार तो स्थिति बिलकुल उल्टी होती है। जिस प्रकार लेखक के साथ बचपन में घटित हुआ। मक्खनपुर जाते समय जब लेखक की चिट्ठियाँ गिर गईं। उस समय की स्थिति का लेखक ने अनुमान नहीं लगाया था। कुएँ में उतरकर चिट्ठियों को लाना साहस का काम था। लेखक धोती के सहारे कुएँ में उतरा था। सामने साँप फन फैलाए बैठा था। धोती पर लटककर साँप को मारना बिलकुल असंभव था।

वहाँ डंडा चलाने की भी जगह नहीं थी। लेखक ने डंडे से चिट्ठियों को खिसकाने का प्रयास किया तो साँप ने डंडे से चिपककर आसन बदल लिया और लेखक चिट्ठियाँ उठाने में सफल हुआ। लेखक इन सब बातों के लिए पहले से तैयार नहीं था, लेकिन स्थिति के साथ वह अपनी योजना में परिवर्तन करता गया।
इस प्रकार मनुष्य की कल्पना और वास्तविकता में बहुत अंतर होता है। यह बात इस घटना से सिद्ध हो जाती है।

प्रश्न 9.
‘फल तो किसी दूसरी शक्ति पर निर्भर है’-पाठ के संदर्भ में इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए। [CBSE]
उत्तर:
लेखक ने अपने बड़े भाई की पिटाई से बचने एवं चिट्ठियाँ डाकखाने में पहुँचाने की जिम्मेदारी के कारण उसने कुएँ में उतरने का निर्णय किया। वह कुएँ में पड़े विषैले साँप से होने वाले भावी खतरों को भी जानता था। इस जोखिमपूर्ण कार्य में उसकी मृत्यु भी हो सकती थी। उसने परिणाम पर कम ध्यान देकर चिट्ठियाँ उठाने में अपना पूरा ध्यान लगाया। उसने अपने उद्देश्य को सामने रखकर कार्य किया, क्योंकि फल तो किसी दूसरी शक्ति पर निर्भर करता है।

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NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3

NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार जीवन में ‘सुख’ से क्या अभिप्राय है? [CBSE]
उत्तर:
लेखक के अनुसार जीवन में ‘सुख’ का अभिप्राय है-हार्दिक आनंद, मानसिक सुख-शांति, शारीरिक आराम और संतुष्टि है। लेखक सुख को उपभोग सुख तक सीमित नहीं समझता है जैसा कि आज समझा जा रहा है।

प्रश्न 2.
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? [Imp.]

                                      अथवा

उपभोक्तावादी संस्कृति के क्या दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं? [CBSE]

                                     अथवा

उपभोक्तावादी संस्कृति से हमें क्या नुकसान हुए हैं? [CBSE]
उत्तर:
आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे जीवन को पूरी तरह से प्रभावित कर रही है। उनमें से कुछ प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. आज हम अपने खाने-पीने और पहनने के लिए उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग कर रहे हैं जिनका विज्ञापन नित्य प्रति देखते हैं।
  2. हम पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण कर रहे हैं? इससे जीवन से शांति गायब हो रही है।
  3. उपभोक्तावादी संस्कृति से समाज में वर्गों के बीच दूरी बढ़ रही है।
  4.  सामाजिक सरोकार कम होते जा रहे हैं। इससे व्यक्ति केंद्रिकता बढ़ रही है।
  5.  नैतिक मापदंड तथा मर्यादाएँ कमज़ोर पड़ती जा रही हैं।
  6.  स्वार्थ की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है।
  7.  इस संस्कृति से भोग की आकांक्षाएँ आसमान को छू रही हैं। इससे हमारी सांस्कृतिक नींव हिल रही है।

प्रश्न 3.
लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है? [Imp.]
अथवा
उपभोक्तावादी संस्कृति के विषय में गाँधी जी के क्या विचार थे? [CBSE]
उत्तर:
गांधी जी ‘सादा जीवन उच्चविचार’ के सिद्धांतवादी थे। वे सामाजिकता, नैतिकता, प्रेम-सद्भाव और समानता के समर्थक थे। वे जानते थे कि उपभोक्तावादी संस्कृति भारत के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि उसका मूल आधार भोगवादी है। इस संस्कृति से सामाजिक सरोकार खतरे में पड़ गए हैं तथा हमारी सांस्कृतिक अस्मिता कमजोर पड़ती जा रही है, इस कारण गांधी जी ने इस संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती कहा है।

प्रश्न 4.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं। [CBSE]
(ख) प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हो। [CBSE]
उत्तर:
(क) आज उपभोक्तावादी संस्कृति को अपनाने के फलस्वरूप मनुष्य उपभोग को ही चरम सुख मान बैठा है। वह उत्पाद एवं भोग के पीछे अंधाधुंध भागा जा रहा है। यह सब वह अनजाने में कर रहा है, इससे उसका चरित्र बदल रहा है। | उपभोग को ही वह जीवन का लक्ष्य मानने लगा है।

(ख) उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाववश हम अंधानुकरण में कई ऐसी चीजें अपना लेते हैं, जो अत्यंत हास्यास्पद हैं; जैसे अमेरिका में लोग मृत्युपूर्व ही अंतिम क्रियाओं का प्रबंध कर लेते हैं। वे ज्यादा धन देकर हरी घास तथा संगीतमय फव्वारे की चाहत प्रकट कर देते हैं। भारतीय संस्कृति में ऐसे अंधानुकरण की हँसी उड़ना ही है।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 5.
कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी.वी. पर विज्ञापन देखकर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं? क्यों? [CBSE]
उत्तर:
टी.वी. पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों की भाषा अत्यंत आकर्षक और प्रभावशाली होती हैं। टी.वी. पर चलते-फिरते, हँसते गाते और मन वाले विज्ञापन हमें इस तरह सम्मोहित कर देते हैं कि हम कुछ और सोचे-समझे बिना उन्हें खरीदने के लिए लालायित हो उठते हैं।

प्रश्न 6.
आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए या उसका विज्ञापन? तर्क देकर स्पष्ट करें।
उत्तर:
मेरे अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार विज्ञापन नहीं उनका गुणवत्ता होना चाहिए, क्योंकि

  1. विज्ञापनों में वस्तुओं के गुणों का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया जाता है, जिसकी वास्तविकता से कुछ लेना-देना नहीं होता है।
  2. विज्ञापनों का उद्देश्य उत्पादकों के हित में सोचना होता है, इसलिए वे उपभोक्ताओं के हित को सोचना तो दूर उनकी ब पर डाका डालते हैं।
  3. विज्ञापनों की भाषा भ्रामक तथा सम्मोहक शैली में होती है जिसमें हम हँसते जाते हैं।
  4.  विज्ञापनों के माध्यम से हम किसी वस्तु के गुण-दोष की सच्चाई नहीं जान सकते हैं।

प्रश्न 7.
पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही ‘दिखावे की संस्कृति’ पर विचार व्यक्त कीजिए। [Imp.]
अथवा
दिखावे की संस्कृति का हमारे समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए। [CBSE]
उत्तर:
उपभोक्तावादी संस्कृति अधिकाधिक उपभोग के लिए प्रेरित करती है। यह संस्कृति उपयोग को ही सुख मान लेती है। इसके प्रभाव के कारण लोग अधिक से अधिक वस्तुएँ खरीदकर अपनी हैसियत का प्रदर्शन करने लगते हैं। इतना ही नहीं वे महँगी से महँगी वस्तुएँ खरीदकर दूसरों को नीचा दिखाना चाहते हैं। नि:संदेह उपभोक्तावादी संस्कृति दिखावे की संस्कृति है।

प्रश्न 8.
आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? अपने अनुभव के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए। [CBSE]
उत्तर:
आज उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को अत्यंत गहराई से प्रभावित कर रही है। इससे रीति-रिवाजों और त्योहारों के स्वरूप में काफी बदलाव आ गया है, जैसेरीति-रिवाज-उपभोक्ता संस्कृति ने हमारे रीति-रिवाजों का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है। पहले लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में वहाँ पहुँचकर शामिल हुआ करते थे, पर आज वे धन्यवाद, शुभकामना संदेश, जन्मदिन की बधाई आदि फोन या एस. एम. एस. के माध्यम से दे देते हैं।
किसी के पास आने-जाने का समय ही नहीं रह गया। वृह दिन गया जब लड़की की शादी में गली-मोहल्ले वाले तथा रिश्तेदार हर काम अपने हाथ से करते थे तथा बारात की सेवा, खान-पान के बाद ही कन्यापक्ष के लोग खाते थे, पर आज बैंक्वेटहाल यो होटल के कर्मचारी यह सब कर देते हैं। कन्यापक्ष के रिश्तेदार तथा निकट संबंधी बारातवालों का इंतजार किए बिना खा-पीकर चलते बनते हैं।
त्योहार-उपभोक्ता संस्कृति से त्योहार भी प्रभावित हुए हैं। आज होली, दीपावली, दशहरा, रक्षाबंधन, ईद मनाने के रिवाज में बदलाव आया है। दीवाली पर सरसों के तेल में जलाए जाने वाले दीपों का स्थान बिजली के बल्बों, लड़ियों, इलेक्ट्रिकल दीपों और मोमबत्तियों ने ले लिया है। इन अवसर पर बनने वाले पारंपरिक पकवानों की जगह फास्टफूड लेते जा रहे हैं।

भाषा-अध्ययन

प्रश्न 9.
धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है।
इस वाक्य में बदल रहा है’ क्रिया है। यह क्रिया कैसे हो रही है-धीरे-धीरे। अतः यहाँ धीरे-धीरे क्रिया-विशेषण है। जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, क्रिया-विशेषण कहलाते हैं। जहाँ वाक्य में हमें पता चलता है क्रिया कैसे, कब, कितनी और कहाँ हो रही है, वहाँ वह शब्द क्रिया-विशेषण कहलाता है।

(क) ऊपर दिए गए उदाहरण को ध्यान में रखते हुए क्रिया-विशेषण से युक्त पाँच वाक्य पाठ में से छाँटकर लिखिए।
(ख) धीरे-धीरे, ज़ोर से, लगातार, हमेशा, आजकल, कम, ज्यादा, यहाँ, उधर, बाहर-इन क्रियाविशेषण शब्दों का प्रयोग करते हुए वाक्य बनाइए।
(ग) नीचे दिए गए वाक्यों में से क्रिया-विशेषण और विशेषण शब्द छाँटकर अलग लिखिए।
                  वाक्य                                                                   क्रिया-विशेषण             विशेषण

  1. कल रात से निरंतर बारिश हो रही है।
  2. पेड़ पर लगे पके आम देखकर बच्चों के मुँह में पानी आ गया।
  3. रसोईघर से आती पुलाव की हलकी
    खुशबू से मुझे ज़ोरों की भूख लग आई।
  4. उतना ही खाओ जितनी भूख है।
  5. विलासिता की वस्तुओं से आजकल बाजार भरा पड़ा है।

उत्तर:
(क) (i) उत्पादन बढ़ाने पर जोर है चारों ओर।
(ii) वहाँ मंद ध्वनि में निरंतर संगीत भी।
(iii) सामंती संस्कृति के तत्व भारत में पहले भी रहे हैं।
(iv) विकास के विराट उद्देश्य पीछे छूट रहे हैं।
(v) नैतिक मानदंड ढीले पड़ रहे हैं।

(ख) धीरे-धीरे – सुमन धीरे-धीरे मेरे पास आ गई।
ज़ोर से – ज़ोर से आँधी आई और कपड़े उड़ गए।
लगातार – कल से लगातार बूंदाबाँदी हो रही है।
हमेशा – हरिश्चंद्र हमेशा सच बोलते थे।
आजकल – हज़ार और पाँच के नोट बंद होने से आजकल बड़ी परेशानी हो रही है।
कम – अधिक सुनकर भी कम बोलो।
ज्यादा – रचना ज्यादा बोल रही थी।
यहाँ – रंजना नहीं आई थी।
उधर – उधर बहुत शोर शराबा है।
बाहर – अध्यापक से डाँट खाकर छात्र बाहर चला गया।

(ग) 1. निरंतर – रीतिवाचक क्रिया-विशेषण
कल रात – कालवाचक क्रिया-विशेषण
2. पके मुँह में – गुणवाचक विशेषण, स्थानवाचक क्रिया-विशेषण
3. हल्की जोरो की – गुणवाचक विशेषण, रीतिवाचक क्रिया-विशेषण
4. उतना, जितना – परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण
5. आजकल – कालवाचक क्रिया-विशेषण

पाठेतर सक्रियता

• ‘दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों का बच्चों पर बढ़ता प्रभाव’ विषय पर अध्यापक और विद्यार्थी के बीच हुए वार्तालाप को संवाद शैली में लिखिए।
उत्तर:

  • अध्यापक- बच्चो! आप विज्ञापन देखना पसंद करते हैं या नहीं?
  • विद्यार्थी- करते हैं सर! कई विज्ञापन तो बहुत सुंदर होते हैं।
  • अध्यापक- जैसे? विद्यार्थी-कोका-कोला का विज्ञापन।अध्यापक-इसमें क्या अच्छा है?
  • विद्यार्थी- सर आमिर खान की एक्टिंग? क्या एक्टिंग है।
  • अध्यापक- क्या तुम इस विज्ञापन को अच्छा विज्ञापन कहोगे?
  • विद्यार्थी- क्यों नहीं सर! इससे तो अच्छा विज्ञापन हो नहीं सकता।
  • अध्यापक- परंतु इससे यह कैसे पता चला कि तुम्हें कोका-कोला पीनी चाहिए या नहीं।
  • विद्यार्थी- सर! मैं तो एक्टिंग की बात कर रहा था।
  • अध्यापक- परंतु मैंने विज्ञापन की बात पूछी थी। जिस काम के लिए विज्ञापन बना था, क्या वह काम हो गया।
  • विद्यार्थी- (सोचते हुए) सर! वो तो हो गया। कोका-कोला कंपनी को अपना माल बेचना था, उसमें वह सफल रही।
  • अध्यापक- परंतु क्या कोका-कोला का कोई गुण पता चला, जिस कारण हमें कोका-कोला पीनी चाहिए।
  • विद्यार्थी- नहीं सर! वो तो नहीं पता चला।
  • अध्यापक- इसका मतलब यह भ्रामक विज्ञापन है। भटकाऊ, ललचाऊ या दिशाभ्रष्ट विज्ञापन है।
  • विद्यार्थी- परंतु आजकल तो सारे विज्ञापन ऐसे होते हैं।
  • अध्यापक- तभी तो मैं कहता हूँ। ये विज्ञापन लक्ष्य से भटके हुए हैं। ये उपभोक्ता को शिक्षित नहीं करते, केवल  अपने मायाजाल में अंधे करके उन्हें बाँधते हैं।

• इस पाठ के माध्यम से आपने उपभोक्ता संस्कृति के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की। अब आप अपने अध्यापक की सहायता से सामंती संस्कृति के बारे में जानकारी प्राप्त करें और नीचे दिए गए विषय के पक्ष अथवा विपक्ष में कक्षा में अपने विचार व्यक्त करें।
क्या उपभोक्ता संस्कृति सामंती संस्कृति का ही विकसित रूप है?
उत्तर:
पक्ष में विचार-जी हाँ! उपभोक्तावादी संस्कृति सामंती संस्कृति का ही विकसित रूप है। पहले सामंत भोगवाद में जीवन बसर करते थे। उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य संसार का भोग करना होता था। उन्होंने ही अपनी आन-बान-शान के लिए ताजमहले, किले और बाग-बगीचे बनवाए। आम लोग कीड़े-मकौड़ों की भाँति गरीबी में पलते रहे और सामंत उनके खून पर पलकर भोगविलास करते रहे। आज यही काम उपभोक्तावादी संस्कृति के संचालक कर रहे हैं। वे सारी दुनिया को अपने उत्पादों के जाल में फंसा रहे हैं। इसके माध्यम से वे अपना साम्राज्य बढ़ा रहे हैं। आज अरबों-खरबों कमाने वाले पूँजीपति बढ़ते जा रहे हैं। उनके भोग के साधन भी बढ़ रहे हैं। ।

विपक्ष में विचार- उपभोक्तावादी संस्कृति सामंती संस्कृति का रूप नहीं है, बल्कि यह उपभोग के साधनों की प्रचुरता का प्रमाण है। पहले जो साधन बड़े-बड़े पूँजीपतियों को उपलब्ध होते थे, वे आज आम आदमी को भी मिलने लगे हैं। पहले राजा-महाराजा ही मोटरकार और हवाई जहाज की यात्रा का सुख ले पाते थे, अब मध्यमवर्गीय व्यक्ति भी इनका सुख ले रहा है। अतः यह सामंती संस्कृति का विकसित रूप नहीं है, बल्कि जन-जन की समृद्धि का प्रतीक है।

• आप प्रतिदिन टी.वी. पर ढेरों विज्ञापन देखते-सुनते हैं और इनमें से कुछ आपकी ज़बान पर चढ़ जाते हैं।
आप अपनी पसंद की किन्हीं दो वस्तुओं पर विज्ञापन तैयार कीजिए।
उत्तर:
नमकीन का विज्ञापन

  • श्रीमती – लीजिए आप भी खाइए! कुरकुरी नमकीन!!
  • श्रीमान – बस कुरकुरी?
  • श्रीमती – कुरकुरी नहीं, करारी भी!
  • श्रीमान – बस कुरकुरी और करारी?
  • श्रीमती – अजी खाइए तो! यह स्वादिष्ट भी है।
  • श्रीमान – अरे! तुम क्या खिलाओगी! मैं तुम्हें खिलाता हूँ ऐसी नमकीन-जो कुरकुरी भी है, करारी भी है, स्वादिष्ट भी है और चटपटी भी! और नाम भी है उसका खटमिठी।
  • श्रीमती – खटमिठी! यही तो मैं खिला रही थी-खटमिठी नमकीन।
  • दोनों – आप भी खाइए खटमिठी नमकीन!!

जूते का विज्ञापन
(पाँव देखकर) – अरे! यह पाँव को क्या हुआ?
घिस गए
और जूते!
वो तो लोहा हैं। वे टस-से-मस भी नहीं हुए!
वाह, बाऊ जी! इधर मेरे पैर देखो!
तुम्हारे पैर तो बिल्कुल ऐसे हैं, जैसे कभी धरती पर रखे ही नहीं।
और क्या! यह मेरे जूतों का कमाल है!
जूतों का कमाल!
जी हाँ! ये खुद घिस गए, किंतु पैर को सुरक्षित रखा!  बिल्कुल फूल से हैं जूते!
क्यों लौहपुरुष जी!
सच भई! जूते पैरों के लिए हैं; पैर जूतों के लिए नहीं। मैं भी अब खरीदा करूंगा रक्षक जूते। सुंदर! आरामदायक! रक्षक जूते!

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