Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 10 पांडवों की रक्षा

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 10 पांडवों की रक्षा

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 10

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुरोचन पांडवों को कहाँ ले गए?
उत्तर:
पुरोचन पांडवों को लाख से बने भवन में ले गए।

प्रश्न 2.
वारणावत को जाते समय विदुर ने युधिष्ठिर को किस प्रकार सावधान किया?
उत्तर:
वारणावत जाते समय विदुर ने युधिष्ठिर को दुर्योधन के षड्यंत्र तथा उससे बचने का उपाय गूढ भाषा में अवगत करवाकर सचेत कर दिया था।

प्रश्न 3.
विदुर द्वारा भेजे गए व्यक्ति ने भवन के अंदर क्या किया?
उत्तर:
विदुर द्वारा भेजे गए व्यक्ति ने भवन के अंदर एक सुरंग बना दी जिससे पांडव बाहर निकल सकें।

प्रश्न 4.
रात्रि को भवन में आग किसने लगाई ?
उत्तर:
रात्रि को लाख भवन में आग भीम ने लगाई।

प्रश्न 5.
माता कुंती ने किस चीज़ का आयोजन किया?
उत्तर:
माता कुंती ने रात्रि में बड़े भोज का आयोजन किया।

प्रश्न 6.
सुरंग बनाने वाले कारीगर ने पांडवों को अपना परिचय कैसे दिया?
उत्तर:
सुरंग बनाने वाले कारीगर ने पांडवों को अपना परिचय देते हुए कहा-“आप लोगों की भलाई के लिए हस्तिनापुर से रवाना होते वक्त विदुर ने सांकेतिक भाषा में जो कुछ कहा था। वह बात मैं जानता हूँ। यही मेरे सच्चे मित्र होने का प्रमाण है। मैं आप लोगों की रक्षा का उपाय करने आया हूँ।

प्रश्न 7.
लाख के भवन से बचकर पांडव कहाँ चले गए? वे लोग कहाँ किस प्रकार अपना गुजारा करते थे?
उत्तर:
लाख के भवन से सुरंग के रास्ते से बच निकलकर पांडव जंगल की ओर निकल गए। वहाँ से गंगा नदी के किनारे एक नाव पर बैठकर एकचक्रा नगर पहुँच गए। वहाँ उन्होंने एक ब्राह्मण के घर आश्रय बनाया। वहाँ वे भीख माँगकर अपना गुज़ारा करने लगे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वारणावत के लाख के घर में पहुँचकर युधिष्ठिर ने भीम से क्या कहा?
उत्तर:
वारणावत के लाख घर में पहुँचकर युधिष्ठिर ने भीम से कहा कि यह स्थान हम लोगों के लिए खतरनाक है। फिर भी हमें ऐसा व्यवहार करना चाहिए कि पुरोचन के षड्यंत्र का हमें मालूम नहीं है। शत्रु के मन में शक पैदा न हो। मौका मिलते ही हम लोग यहाँ से भाग निकलेंगे।

प्रश्न 2.
लाख घर में सुरंग कैसे बनाई गई ? युधिष्ठिर ने पुरोचन की योजना को किस प्रकार असफल कर दिया?
उत्तर:
कारीगर ने सुरंग इस ढंग से बनाया कि लाख के महल के अंदर से नीचे-नीचे चहारदीवारी और गहरी खाई को लांघकर बाहर निकला जा सकता था। सुरंग बनाने के बाद उत्सव मनाकर सब लोग खा-पीकर सो गए। पुरोचन भी सो गया। भीम ने स्वयं लाख के भवन में जगह-जगह आग लगा दी। पुरोचन का घर भी जलकर भस्म हो गया और जलकर मर गया। पांडव सुरक्षित बचकर निकल गए। पुरोचन उस महल में आगजनी करता उससे पहले पांडवों ने ही आग लगाकर पुरोचन के षड्यंत्र को असफल कर दिया।

प्रश्न 3.
ब्राह्मण परिवार के दुख का कारण क्या था?
उत्तर:
एकचक्रा नगरी के समीप एक गुफा में बकासुर नामक राक्षस रहता था। वह लोगों पर अत्याचार करता था। वहाँ का राजा काफ़ी निकम्मा एवं कमज़ोर था। वह अपनी प्रजा की रक्षा नहीं कर सकता था। अतः वहाँ की प्रजा ने उस राक्षस के आतंक से बचने के लिए एक समझौता किया। समझौते के अनुसार लोग बारी-बारी से उसके लिए सामग्री लेकर एक आदमी अपने घरों से जाएँगे। आज उस ब्राह्मण परिवार की बारी थी। अतः वे दुखी थे।

प्रश्न 4.
भीम ने बकासुर का वध कैसे किया?
उत्तर:
भीम और बकासुर में भयानक संघर्ष हुआ। राक्षस ने एक बड़ा पेड़ उखाडकर भीम को दे मारा। किंत भीम ने उसे बाएँ हाथ से रोक लिया। दोनों में खूब मुठभेड़ हुई। भीम ने उसे मुँह के बल गिराकर पीठ पर घुटनों से उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी। राक्षस पीड़ा से कराहकर वहीं मर गया। इस तरह से भीम ने बकासुर का वध किया।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 10

पाँचों पांडव कुंती के साथ वारणावत के लिए रवाना हो गए। इधर विदुर को दुर्योधन के षड्यंत्र का पता चल चुका था। अतः उन्होंने यह बातें युधिष्ठिर को चुपचाप बता दिया। लाख-भवन तैयार हो जाने पर पुरोचन पांडवों को उसमें ले गए। युधिष्ठिर को विदुर की बात याद थी। अब युधिष्ठिर को पता चल गया था कि भवन आग पकड़ने वाली वस्तुओं से बना है। उन्होंने साथियों को सावधान कर दिया और पुरोचन को पता न चलने की हिदायत भी दे दी। पांडव उसी लाख भवन में रहने लगे। इतने में विदुर द्वारा भेजा गया सुरंग वाला कारीगर वहाँ पहुँच गया। उसने वहाँ कुछ ही दिनों में महल में ज़मीन के नीचे ही नीचे एक सुरंग बना दी। यह काम अत्यंत गोपनीय था। इस सुरंग से पांडव आग लगने पर बाहर निकल सकते थे।

पुरोचन ने लाक्षागृह के द्वार पर ही अपना आवास बनाया था फिर भी उसे सुरंग के विषय में कुछ भी मालूम न हुआ। पुरोचन अभी योजना बना रहा था कि उसे समझकर माता कुंती ने रात्रि-भोज का आयोजन किया जिसमें नगर के सभी लोगों को भोजन कराया। खूब खा-पीकर पुरोचन सहित सब कर्मचारी गहरी नींद में सो गए। आधी रात पांडव सुरंग मार्ग से बाहर निकल गए। भीम ने जगह-जगह आग लगा दी। महल व पुरोचन के रहने का स्थान आग की लपटों से घिर गया। नगर निवासी पांडवों के जल मरने की आशंका से कौरवों की निंदा करते हुए दुख प्रकट करने लगे। पुरोचन भी इस आग में स्वाहा हो गया।

जब यह सूचना हस्तिनापुर पहुंची तो नगर में हाहाकार मच गया। कौरवों ने भी शोक मनाया और कुंती को श्रद्धांजलि दी। इधर विदुर पूर्णतः आश्वस्त थे कि पांडव लाख के भवन से निकल गए होंगे।

लाख के घर को जलता छोड़ पांडव माता कुंती के साथ एक जंगल में पहुँच गए। माता कुंती रास्ते में काफ़ी थक गई थी तब माता कुंती को भीम ने अपने कंधे पर बैठा लिया तथा नकुल-सहदेव को कमर पर लेकर, चल पड़े। युधिष्ठिर और अर्जुन का हाथ पकड़कर भी जंगली रास्ते में उन्मत हाथी की तरह तेजी से जंगल पार कर गए और वे लोग गंगा नदी के किनारे मिल गए। वहाँ गंगा नदी के किनारे पांडवों को विदुर द्वारा भेजी गई एक नाव मिली। मल्लाह के संकेत पर वे समझ गए कि वे मित्र हैं। अगले दिन शाम तक वे लोग चलते रहे। एक रात व दिन चलने के बाद शाम को कुंती बहुत थक गई थी। पांडव भी बुरी तरह थके हुए थे। कुंती ने कहा- मैं तो पानी के बिना अब नहीं रह सकती हूँ। यह कहकर कुंती वहीं ज़मीन पर गिरकर बेहोश हो गई। अपने भाइयों तथा कुंती का यह हाल देखकर भीम द्रवित हो गया।

तब उसने एक जलाशय से पानी लाकर उन लोगों की प्यास बुझाई। पानी पीकर सब सो गए। केवल भीम जागता रहा। इस तरह कष्ट सहते हए पांडव चलते-चलते अंत में एकचक्रा नगरी में ब्राहमण के वेश में रहने लगे। वे लोग वहीं भिक्षा माँगकर अपना गुजारा करने लगे। भिक्षा में पाँचों जितना भोजन लाते, उसके दो हिस्से करती। एक हिस्सा भीम को दे देती और दूसरे भाग में चारों पुत्रों को और स्वयं खाती। इसके बाद भी भीम की भूख नहीं मिटती थी। भीम ने एक कुम्हार से मित्रता कर ली। कुम्हार ने उसे एक बड़ी भारी हाँडी दे दी। भीम उसी हाँड़ी को लेकर भिक्षा के लिए निकलता। उसके विशाल शरीर और बड़ी हाँड़ी के कारण उसे काफ़ी भिक्षा मिलने लगी।

एक दिन भीम भिक्षा के लिए नहीं गया था। चारों भाई भिक्षा माँगने के लिए गए हुए थे। इतने में ब्राह्मण के घर से रोने की आवाज़ आई। ब्राह्मण बड़े दुखी हृदय से अपनी पत्नी से कह रहा था, अपनी पुत्री की बलि कैसे चढ़ा दूँ, और पुत्र के काल कवलित होने दें। अगर मैं अपनी बलि देता हूँ तो बच्चों का पालन-पोषण कौन करेगा। इससे अच्छा तो हम सभी मौत को गले लगा लें। कहते हुए ब्राह्मण रोने लगा। कभी ब्राह्मण की पत्नी खुद को कहती है- राक्षस का भोजन बनू, कभी ब्राह्मण तो कभी उनके बच्चे। माता कुंती अंदर गई तो ब्राह्मण, उसकी पत्नी, उनकी पुत्री व पुत्र की बात सुनकर वे व्यथित होकर ब्राह्मण से बोली “हे ब्राह्मण क्या आप कृपा करके मुझे बता सकते हैं कि आप लोगों के इस असह्य दुख का कारण क्या है?

तब ब्राह्मण ने बताया कि इस नगरी का राजा काफ़ी शक्तिहीन है। वह प्रजा की रक्षा नहीं कर सकता। इस नगरी के समीप ही एक गुफा में बकासुर नाम का राक्षस रहता है। वह जनता पर बहुत अत्याचार करता है। अतः राजा से निराश जनता ने बकासुर से समझौता कर लिया है कि नगरवासी बारी-बारी एक आदमी और खाने की चीजें हर सप्ताह भेज दिया करेंगे। राक्षस ने यह बात मान ली। इस सप्ताह उस राक्षस के भोजन व एक आदमी की बारी हमारे परिवार की है। मैंने सोचा कि परिवार सहित ही मैं राक्षस के पास चला जाऊँ। इस समस्या को दूर करने का और कोई उपाय नहीं है।

ब्राह्मण की बातों को सुनकर कुंती ने सबसे पहले भीम से सलाह लेकर वह लौटकर ब्राह्मण से बोली- “विप्रवर, आप इस बात की चिंता छोड़ दीजिए। मेरे पाँच बेटे हैं, उनमें से एक आज राक्षस के पास भोजन लेकर चला जाएगा” ब्राह्मण बोला- “आप हमारी अतिथि हैं। आपके बेटे के मौत का मुंह में भेजना कहाँ का न्याय है। मुझसे यह नहीं हो सकता। कुंती को डर था कि यदि बात फैल गई तो दुर्योधन को पता चल जाएगा कि हम लोग एकचक्रा नगर में छिपे हुए हैं। इसलिए उसने इस बात को गुप्त रखने के लिए ब्राह्मण से कहा जब कुंती ने भीम से भोजन की सामग्री लेकर बकासुर के पास जाने को कहा तो युधिष्ठिर नाराज़ हो गया। यह देखकर कुंती बोली-ब्राह्मण के घर हम आराम से रह रहे हैं। आज जब उन पर विपत्ति पड़ी है तो हमें उसका साथ देना चाहिए। भीम को बकासुर के पास भेजना मेरा कर्तव्य है।

भीम गाड़ी में भोजन लेकर राक्षस की गुफा पर पहुँच गया। वह वहाँ बैठकर भोजन करने लगा। जब राक्षस भूख से तड़पता हुआ निकला तो वह यह देखकर क्रोध से लाल हो गया। इतने में भीम ने उसे पुकारा जिससे राक्षस और क्रोधित हो गया और राक्षस भीम पर झपटा। राक्षस ने पेड़ उखाड़ कर भीम को मारा लेकिन भीम ने उसे बाएँ हाथ से रोक लिया। दोनों में काफ़ी मुठभेड़ हुई। राक्षस बार-बार उठकर भीम से दो-दो हाथ करने तैयार हो जाता। अंत में भीम ने उसे मार डाला। भीम ने लाश को घसीटकर नगर के फाटक पर लाकर पटक दिया। फिर घर माता-कुंती के पास जाकर सारी कहानी सुनाई।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-21- आगमन – पधारना, आना, प्रबंध – इंतजाम, व्यवस्था, सबूत – प्रमाण।
पृष्ठ संख्या-23- क्षुब्ध – दुखी, निंदा – शिकायत।
पृष्ठ संख्या-24- क्षोभ – दुख, हाँडी – मिट्टी का छोटा घड़ा, विलक्षण – अद्भुत।
पृष्ठ संख्या-25- हठ – जिद, दुरात्मा – बुरे विचार रखने वाला, जुल्म – अत्याचार।
पृष्ठ संख्या-27- विश्राम – आराम, पीड़ा – कष्ट, लाश – मृत शरीर।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 9 लाख का घर

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 9 लाख का घर

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 9

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुर्योधन की ईर्ष्या क्यों बढ़ती जा रही थी?
उत्तर:
भीम की शारीरिक शक्ति और अर्जुन की युद्धकला को देखकर दुर्योधन की ईर्ष्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी।

प्रश्न 2.
दुर्योधन को कुमंत्रणा कौन-कौन दे रहे थे?
उत्तर:
पांडवों का विनाश करने के लिए मामा शकुनि तथा कर्ण दुर्योधन को कुमंत्रणा दे रहे थे।

प्रश्न 3.
धृतराष्ट्र का स्वभाव कैसा था?
उत्तर:
यद्यपि धृतराष्ट्र बुद्धिमान थे पर वे दृढ़ निश्चयी नहीं थे।

प्रश्न 4.
दुर्योधन किस बात के लिए चिंतित था?
उत्तर:
दुर्योधन की चिंता यह थी कि बचपन से अंधे होने के कारण उसके पिता को राज्य से वंचित होना पड़ा और उसके छोटे भाई के हाथ में राजसत्ता चली गई। उसके बाद उनके बेटे युधिष्ठिर को राजा बना दिया गया, तो फिर पीढ़ियों तक हम राज्य की आशा नहीं कर सकते।

प्रश्न 5.
धृतराष्ट्र दुर्योधन का साथ क्यों देते थे?
उत्तर:
धृतराष्ट्र को पुत्र मोह बहुत अधिक था। अपनी इसी कमज़ोरी के कारण दुर्योधन के गलत एवं सही सभी कामों में धृतराष्ट्र दुर्योधन का साथ देता था।

प्रश्न 6.
पुरवासियों के क्या विचार थे?
उत्तर:
पुरवासी प्रजा की राय थी कि गददी के उत्तराधिकारी तो युधिष्ठिर ही होना चाहिए। धृतराष्ट्र तो पांडु के आभाव में राजा बने थे। अब पितामह भीष्म का कर्तव्य है कि राज्य का भार युधिष्ठिर को दिला दें। युधिष्ठिर से समस्त प्रजा को न्याय की उम्मीद थी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुरवासियों की धारणा को जानकर दुर्योधन ने धृतराष्ट्र से क्या कहा?
उत्तर:
पुरवासियों की धारणा थी कि राज्य गद्दी के उत्तराधिकारी युधिष्ठिर ही हैं। उनकी यह धारणा जानकर दुर्योधन ने अपने पिता से कहा कि- पिता जी पुरवासी तरह-तरह की बातें करते हैं। चौराहे और सभाओं में सभी यही बातें करते हैं कि राजगद्दी पर बैठने योज्य तो युधिष्ठिर ही है। वे कहते हैं कि धृतराष्ट्र तो जन्म से अंधे थे, इस कारण उनके छोटे भाई को राजा बनाया गया था। उसकी अकाल मृत्यु हो जाने के कारण कुछ समय के लिए धृतराष्ट्र ने राजकाज सँभाला था। अब युधिष्ठिर बड़े हो गए हैं। अतः उन्हें राजा बना देना चाहिए। अब यदि युधिष्ठिर राजा बन गए तो हमारी पीढ़ियाँ इस अधिकार को सदा के लिए खो देंगी।

प्रश्न 2.
कर्णिक नाम के ब्राह्मण ने धृतराष्ट्र को क्या सलाह दी?
उत्तर:
कर्णिक नाम के ब्राह्मण ने धृतराष्ट्र को सलाह दी कि हे राजन! जो ऐश्वर्यवान है, वह संसार में श्रेष्ठ माना जाता है। यह सही है कि पांडव आपके भतीजे हैं, लेकिन वे बड़े शक्तिशाली भी हैं। अतः सावधान हो जाइए और पांडवों से अपनी रक्षा कर लीजिए वरना पीछे पछताना पड़ेगा और यदि युधिष्ठिर राजा बन गए तो आपकी पीढ़ियाँ इस अधिकार से वंचित रह जाएँगी।

प्रश्न 3.
वारणावत का महल किन-किन चीज़ों से तैयार किया गया?
उत्तर:
वारणावत में महल पांडवों को रहने के लिए तैयार किया गया था। वह सन, घी, मोम, तेल, लाख तथा चरबी एवं मिट्टी तेल आदि चीजों से मिलाकर तैयार किया गया था। इस षड्यंत्र था कि इस भवन में पांडवों को ठहराया जाएगा और किसी एक दिन रात में आग लगा दी जाएगी जिसमें पांडव समेत सभी लोग जलकर स्वाहा हो जाएंगे और दुर्योधन आसानी से राजगद्दी पर बैठ सकेगा।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 9

भीम का शरीरिक बल और अर्जुन की युद्ध कुशलता को देखकर दुर्योधन की ईर्ष्या दिन ब दिन बढ़ती गई। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए दुर्योधन तरह-तरह का उपाय सोचने लगा। इस षड्यंत्र में उसका मामा शकुनि और कर्ण भी शामिल थे। धृतराष्ट्र को पुत्र मोह बहुत अधिक था। दृढ़ निश्चयी वे नहीं थे। उनमें अंकुश रखने की शक्ति नहीं थी। वे जानते थे कि दुर्योधन गलत रास्ते पर चल रहा है, फिर भी उन्होंने अपने पुत्र का साथ दिया।

राज्य की प्रजा राज्य का उत्तराधिकारी युधिष्ठिर को मानती थी। वे चाहते थे कि पितामह भीष्म को धृतराष्ट्र से राज्य का भार युधिष्ठिर को दिला देना चाहिए। प्रजा को विश्वास था कि युधिष्ठिर ही सारी प्रजा के साथ न्याय कर सकते हैं। इन सब बातों से दुर्योधन में और ईर्ष्या और जलन की भावना का विकास हुआ।

एक दिन धृतराष्ट को अकेले में पाकर दुर्योधन बोला- पिता जी जन्म से अँधे होने के कारण आप राज्य से वंचित रह गए। आपके छोटे भाई के हाथ साम्राज्य चला गया। अब यदि युधिष्ठिर को राजा बनाया गया तो कई पीढ़ियों तक राज्य की आशा नहीं कर सकेंगे, यह अपमान हमसे सहा नहीं जाएगा। बाद में हमें पछताना पड़ेगा।

कर्णिक की बातों पर धृतराष्ट्र विचार कर ही रहे थे कि इतने में दुर्योधन ने आकर कहा-“पिता जी, आप अगर किसी तरह पांडवों को समझाकर वारणावत भेज दें तो नगर-राज्य का हमारा शासन पक्का हो जाएगा। फिर पांडव वहाँ से खुशी से लौट सकते हैं और उनसे कोई खतरा नहीं रहेगा।

दुर्योधन के आदमियों ने पांडवों को वारणावत की सुंदरता और खूबियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया। धृतराष्ट्र पहले से ही कमज़ोर पड़ गए थे। स्वयं युधिष्ठिर ने वारणावत जाने की अनुमति माँगी। धृतराष्ट्र की अनुमति लेकर कुंती व पाँचों भाई वारणावत के लिए चल दिए। धृतराष्ट्र की अनुमति पाकर पांडव माता कुंती के साथ वारणावत चले गए। पांडवों के चले जाने पर दुर्योधन तथा उसके मित्रों ने पांडवों तथा कुंती को मारने की योजना बनाने लगे। दुर्योधन ने अपने मंत्री पुरोचन को बुलाकर गुप्त रूप से सलाह दी और एक योजना बनाई। उस योजना के अनुसार, रथ पर बैठकर पुरोचन बहुत पहले शीघ्र ही वारणावत जा पहुँचा। वही जाकर पांडवों को ठहरने के लिए सन, घी, तेल, मोम, लाख, चर्बी आदि चीजों को मिट्टी में मिलाकर सुंदर भवन बनवाया।

दुर्योधन की योजना थी कि कुछ दिनों तक पांडवों के लाख के भवन में रहने के बाद किसी एक रात में उस भवन में आग लगा दी जाएगी जिससे पांडव जलकर राख हो जाएंगे और कौरवों पर कोई आरोप नहीं लगेगा।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-19
कुमंत्रणा – षड्यंत्र, पूरी योजना बनाना, कुराह – गलत रास्तों से चलना, अकाल – असमय, वंचितरहित, स्नेह – प्यार, प्रेम।

पृष्ठ संख्या-20
दलीलों – तर्कों, चौकन्ने – होशियार, पृष्ठ पोषक – पक्षधर, काम तमाम करना – मारना, निश्शंक – शंका रहित, सलाह – राय।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 8 द्रोणाचार्य

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 8 द्रोणाचार्य

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 8

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आचार्य द्रोण कौन थे?
उत्तर:
आचार्य द्रोण महर्षि भारद्वाज के पुत्र थे।

प्रश्न 2.
उनकी किसके साथ गहरी मित्रता थी?
उत्तर:
द्रुपद और द्रोण में गहरी मित्रता थी।

प्रश्न 3.
द्रोणाचार्य का किसके साथ विवाह हुआ था?
उत्तर:
द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन के साथ हुआ था।

प्रश्न 4.
परशुराम अपनी संपत्ति गरीब ब्राह्मणों को दान में क्यों दे रहे थे?
उत्तर:
वन-गमन के उद्देश्य से परशुराम अपनी सारी संपत्ति गरीबों में बाँट रहे थे।

प्रश्न 5.
शिक्षा पूरी होने पर द्रोण ने अर्जुन से गुरु-दक्षिणा में क्या माँगा?
उत्तर:
शिक्षा पूरी होने पर द्रोण ने अर्जुन से गुरु दक्षिणा के रूप में पांचाल-राज को कैद कर लाने के लिए कहा।

प्रश्न 6.
द्रुपद ने द्रोण के साथ कैसा व्यवहार किया?
उत्तर:
द्रुपद ने सत्ता के मद में द्रोण का अपमान किया।

प्रश्न 7.
द्रुपद के पुत्र व पुत्री के नाम बताएँ-
उत्तर:
पुत्र का नाम धृष्टद्युम्न तथा पुत्री का नाम द्रौपदी था।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
द्रोण ने कुएँ से गेंद किस प्रकार निकाली।
उत्तर:
द्रोणाचार्य ने पास में पड़ी हुई सींक उठा ली और उसे पानी में फेंक दिया। सींक गेंद में ऐसे जाकर लगी जैसे तीर और फिर इस तरह लगातार कई सीकें एक दूसरे में डालते गए। सीकें एक दूसरे से चिपकती गईं। जब आखिरी सींक का सिरा कुएँ के बाहर तक पहुँच गया तो द्रोणाचार्य ने उसे पकड़ कर खींच लिया और गेंद निकल गई।

प्रश्न 2.
द्रोण के व्यवहार से दुखी होकर द्रुपद ने क्या प्रतिज्ञा की?
उत्तर:
द्रोण के व्यवहार से दुखी होकर द्रुपद ने बदले की भावना को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने कई कठोर व्रत और तप इस कामना से किए कि उसे एक ऐसा पुत्र हो जो द्रोण को मार सके और एक ऐसी कन्या हो जो अर्जुन से ब्याही जा सके।

प्रश्न 3.
बंदी बने हुए द्रुपद से द्रोणाचार्य ने क्या कहा?”
उत्तर:
द्रोणाचार्य ने द्रुपद से कहा कि आपको किसी डर या विपत्ति की आशंका नहीं करनी चाहिए। तुमने मेरा अपमान करते समय कहा था कि राजा ही राजा के साथ मित्रता कर सकता है। मैं तुम्हारा आधा राज्य तुमको लौटा रहा हूँ। जिससे बराबर राज्य के स्वामी बनकर हम दोनों मित्र बने रहे।

प्रश्न 4.
द्रोण से बदला लेने के लिए द्रुपद ने क्या किया?
उत्तर:
द्रोण से बदला लेने के लिए द्रुपद ने कठिन तप व व्रत के द्वारा एक पुत्र व पुत्री प्राप्त की। द्रुपद की इच्छा थी कि मुझे अर्जुन जामाता रूप में मिले और मेरा पुत्र द्रोण को मार सके। पुत्री द्रौपदी मिली और पुत्र धृष्टद्युम्न मिला। धृष्टद्युम्न के ही हाथों द्रोण मारे गए थे।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 8

आचार्य द्रोण महर्षि भारद्वाज के पुत्र थे। पांचाल नरेश द्रुपद भारद्वाज के आश्रम में उनके साथी व मित्र थे। दोनों में गहरी मित्रता थी। उन दोनों में इतनी गहरी मित्रता थी कि एक बार राजकुमार द्रुपद ने हँसी मजाक में कह दिया था कि अगर मैं पंचाल देश का राजा बन जाऊँगा तो आधा राज्य तुम्हें दे दूंगा।

शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् द्रोण का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हो गया और उनके अश्वस्थामा नाम का पुत्र हुआ। द्रोण अपनी पत्नी और पुत्र से बहुत प्यार करते थे।

द्रोण बड़े गरीब थे। एक बार उन्हें पता चला कि परशुराम अपनी सारी संपत्ति गरीब ब्राहमणों में बाँट रहे हैं। द्रोण भी वहाँ पहँचे किंतु, वहाँ पहुँचने तक परशुराम अपनी सारी संपत्ति बाँटकर वन गमन की तैयारी कर रहे थे।

द्रोण को देखकर परशुराम जी बोले- “ब्राह्मण श्रेष्ठ आपका स्वागत है। पर मेरे पास जो भी कुछ था वह मैं बाँट चुका हूँ। अब मेरे पास शरीर और धनुर्विद्या ही है। बताइए मैं आपके लिए क्या करूँ?” द्रोण ने उनसे समस्त शस्त्रों का प्रयोग तथा रहस्य सिखाने का अनुरोध किया। परशुराम ने द्रोण को धनुर्विद्या की पूरी शिक्षा दे दी।

कुछ समय के बाद राजकुमार द्रुपद अपने पिता के पश्चात पांचल देश का राजा बना। इसकी सूचना पाते ही द्रोण को बचपन के मित्र की बातें याद आने लगीं। वे सोचने लगे कि राजा द्रुपद आधा राज्य न भी दें, तो कोई बात नहीं कुछ धन तो देगा। मन में यह आशाएँ लेकर द्रोण द्रुपद के पास पहुँचे और बोले- मैं तुम्हारा बचपन का मित्र द्रोण हूँ।

अहंकार एवं ऐश्वर्य के मद में चूर राजा द्रुपद को द्रोण का आना अच्छा नहीं लगा। वे बोले- “मुझे मित्र कहकर पुकारने का तुम्हें साहस कैसे हुआ। क्या तुम्हें पता है कि सिंहासन पर बैठे हुए एक राजा के साथ दरिद्र प्रजा की मित्रता कैसे हो सकती है। मूर्ख की विद्वान के साथ और कायर की वीर के साथ मित्रता नहीं हो सकती। मित्रता बराबरी वालों से हो सकती है। द्रुपद की कठोर वाणी सुनकर द्रोण काफ़ी लज्जित हुए साथ में उन्हें क्रोध भी बहुत आया। उसी समय उन्होंने प्रण लिया इस अहंकारी राजा को सबक ज़रूर सिखलाऊँगा। बचपन में जो आपस में मित्र के बीच बात हुई थी उसे पूरा करके चैन लूँगा। वे हस्तिनापुर गए और पत्नी के भाई कृपाचार्य के घर गुप्त रूप से रहने लगे।

कुछ समय बाद एक दिन हस्तिनापुर के राजकुमार नगर में बाहर गेंद खेल रहे थे। उनकी गेंद कुएँ में गिर पड़ी। गेंद निकालने की कोशिश में उनकी अंगूठी कुएँ में गिर पड़ी। गेंद और अंगूठी निकालने में राजकुमारों को असफल होते देखकर द्रोण ने राजकुमारों से कहा- राजकुमारों बोलो, मैं गेंद निकाल दूँ, तो तुम मुझे क्या दोगे।” हे ब्राहमणश्रेष्ठ! अगर आप गेंद निकाल देंगे, तो कृपाचार्य के घर आपको बढ़िया भोजन कराएँगे, युधिष्ठिर ने हँसते हुए कहा। द्रोणाचार्य ने सींक कुएँ में डालकर गेंद में गड़ा दी और फिर सींक में सींक डालकर गेंद निकाल दी। उसी प्रकार उन्होंने अँगूठी निकाल दिया। इस चमत्कार से राजकुमार बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने द्रोण के आगे सम्मानपूर्वक शीश झुकाया और हाथ जोड़कर पूछा- “महाराज हमारा प्रणाम स्वीकार कीजिए और हमें आप अपना परिचय दीजिए कि आप कौन हैं ? हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं? हमें आज्ञा दीजिए।”

द्रोण ने कहा- “इन सारी घटनाओं को बताकर पितामह भीष्म से मेरा परिचय पूछ लेना। राजकुमारों से घटना की सारी बातें सुनकर पितामह भीष्म समझ गए कि ऐसा काम तो सुप्रसिद्ध आचार्य द्रोण ही कर सकते हैं। भीष्म ने द्रोण को बहुत सम्मान दिया और राजकुमारों को आदेश दिया कि वे गुरु द्रोण से ही अस्त्र विद्या सीखें। कुछ समय बाद राजकुमारों की शिक्षा-दीक्षा पूरी हो गई। इसके बाद आचार्य द्रोण ने गुरु दक्षिणा में अपने शिष्यों से पांचालराज द्रुपद को कैदकर लाने को कहा। उनके कहने पर कर्ण और दुर्योधन द्रुपद के पास गए लेकिन शक्तिशाली द्रुपद के आगे टिक नहीं सके। तब द्रोण ने अर्जुन को भेजा अर्जुन ने पांचाल नरेश की शक्ति को छिन्न भिन्न कर दिया और द्रुपद को बंदी बनाकर आचार्य द्रोण के सामने लाकर खड़ा कर दिया।

द्रोणाचार्य ने मुसकराते हुए द्रुपद से कहा- हे वीर! डरो मत किसी प्रकार की विपत्ति की आशंका न करो। बचपन में हमारी तुम्हारी मित्रता थी। साथ-साथ हम दोनों खेले-कूदे, बड़े हुए। बाद में जब तुम राजा बन गए तो ऐश्वर्य एवं अहंकार के मद में आकर तुम मुझे भूल गए और मेरा अपमान किया। तुमने कहा था कि राजा ही राजा के साथ मित्रता कर सकता है। इसी कारण मुझे युद्ध करके तुम्हारा राज्य छीनना पड़ा परंतु मैं तुम्हारे साथ मित्रता करना चाहता। इसलिए आधा राज्य तुम्हें वापस लौटा देता हूँ, क्योंकि मेरा मित्र बनने के लिए तुम्हें राज्य चाहिए न। मित्रता तो बराबर हैसियत वालों में हो सकती है।

द्रोण ने अपना अपमान का बदला ले लिया। अतः उन्होंने द्रुपद को आधा राज्य वापिस कर दिया। द्रुपद अपने अपमान की ज्वाला में जलने लगा। उन्होंने दो व्रत और तप के द्वारा दो कामनाएँ पूरी की-

एक ऐसा पुत्र हो जो द्रोण को मार सके। एक ऐसी कन्या हो जिसकी अर्जुन के साथ शादी हो सके। कालांतर में उनकी कामनाएँ पूरी हुईं और धृष्टद्युम्न नामक एक पुत्र हुआ जो आगे चलकर कुरुक्षेत्र में युद्ध के मैदान में द्रोण के मौत का कारण बना और द्रौपदी नामक एक पुत्री हुई जो अर्जुन से ब्याही गई।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-16
गहरी – घनिष्ठ, वितरित – बाँटना, वन-गमन – वन की ओर जाना। खबर – सूचना, मद – गर्व, सज्जनोचित – सज्जनों जैसा, देहावसान – देहांत।

पृष्ठ संख्या-17
साहस – हिम्मत, दरिद्र – गरीब, दावा – अधिकार, विनती – प्रार्थना, आज्ञा – आदेश।

पृष्ठ संख्या-18
धावा बोलना – हमला करना, विपत्ति – संकट, घृणा – नफ़रत, ठेस – पीड़ा।

पृष्ठ संख्या-19
लक्ष्य – उद्देश्य, तप – तपस्या, कामना – चाह।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 7 कर्ण

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 7 कर्ण

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 7

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पांडवों ने किन-किन गुरुओं से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा पाई ?
उत्तर:
पांडवों ने पहले कृपाचार्य से और बाद में द्रोणाचार्य से शिक्षा पाई थी।

प्रश्न 2.
क्या देखकर दुर्योधन का मन ईर्ष्या-द्वेष से जलने लगा?
उत्तर:
अर्जुन की धनुष विद्या का कमाल और चतुरता देखकर दुर्योधन का मन ईर्ष्या और द्वेष से जलने लगा।

प्रश्न 3.
अर्जुन को चुनौती देते समय कर्ण ने क्या कहा था?
उत्तर:
अर्जुन को चुनौती देते हुए कर्ण ने कहा था- “अर्जुन जो भी करतब तुमने यहाँ दिखाए हैं, इससे बढ़कर कौशल मैं भी दिखा सकता हूँ।

प्रश्न 4.
कर्ण की चुनौती सुनकर तैश में आकर अर्जुन ने क्या कहा?
उत्तर:
कर्ण की चुनौती सुनकर अर्जुन ने तैश में आकर कहा- कर्ण! सभा में जो बिना बुलाए जाते हैं और बिना किसी के पूछे बोलने लगते हैं, वे निंदा के योग्य होते हैं।

प्रश्न 5.
अर्जुन की प्रतिक्रिया देने के बाद कर्ण ने उसका जवाब क्या दिया?
उत्तर:
अर्जुन की तैश में आकर प्रतिक्रिया देने के बाद उसके प्रत्युत्तर में कर्ण ने कहा- यह उत्सव केवल तुम्हारे लिए ही नहीं मनाया जा रहा है। राज्य के सभी प्रजाजन इसमें भाग लेने के हकदार हैं। व्यर्थ की डीगें मारने से क्या फायदा चलो, तीरों से मुकाबला कर लेते हैं।

प्रश्न 6.
कर्ण से कृपाचार्य ने क्या कहा था?
उत्तर:
कृपाचार्य ने कर्ण से कहा कि तुम अपना, अपने पिता, अपने राजकुल का परिचय दो। कुल का परिचय आए बिना राजकुमार कभी द्वंद्व युद्ध नहीं करते। अर्जुन परिचय पाकर वंद्व युद्ध के लिए तैयार है।

प्रश्न 7.
कर्ण को देखते ही कुंती के साथ क्या घटना घटी?
उत्तर:
कुंती ने कर्ण को देखते ही पहचान लिया और भय तथा लज्जा के कारण मुर्छित होकर गिर पड़ी।

प्रश्न 8.
कर्ण को लाचार देखकर दुर्योधन ने उसके लिए क्या किया?
उत्तर:
दुर्योधन ने कर्ण को अपने पितामह और धृतराष्ट्र की अनुमति से कर्ण को अंग देश का राजा बना दिया।

प्रश्न 9.
अंग देश का राजा बनने के बाद कर्ण ने जब सभा में अधिरथ को देखा तो क्या किया?
उत्तर:
अंग देश का राजा बनने के बाद जब कर्ण ने सभा में अधिरथ को देखा तो कर्ण ने धनुष-बाण नीचे रख दिया और पिता मानकर बड़े आदर से उनके आगे सिर झुकाया। अधिरथ ने भी बेटा कहकर कर्ण को गले लगा लिया।

प्रश्न 10.
भीम ने कर्ण का उपहास कैसे उड़ाया ?
उत्तर:
भीम ने कर्ण का उपहास कर्ण के पिता सारथी अधिरथ को देखकर हँसी मारकर बोला-“सारथी के बेटे तुम धनुष छोड़कर हाथ में चाबुक लो, चाबुक। यही तुम्हें शोभा देगा। तुम भला कब से अर्जुन के साथ युद्ध करने के योग्य हो गए।”

प्रश्न 11.
इंद्र ने क्या भिक्षा माँगी और क्यों?
उत्तर:
इंद्र ने अर्जुन को विपत्ति से बचाने के लिए कर्ण से उसके जन्मजात कवच और कुंडलों की भिक्षा माँगी थी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नगर में समारोह का आयोजन क्यों किया गया था?
उत्तर:
जब पांडवों और कौरवों ने अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा में निपुणता प्राप्त कर ली तब उनके कौशल प्रदर्शन के लिए नगर में समारोह का आयोजन किया गया था। सारे नगरवासी देखने आए थे। उस समारोह में तरह-तरह के करतब हुए। सभी राजकुमारों ने प्रतिस्पर्धा में बढ़-चढ़कर भाग लिया और अपने-अपने शक्ति का प्रदर्शन किया। सभी में श्रेष्ठ प्रदर्शन करने की होड़ लगी रही।

प्रश्न 2.
कृपाचार्य ने कर्ण से क्या कहा?
उत्तर:
कृपाचार्य ने कर्ण से अपना परिचय देने के लिए कहा। उन्होंने पूछा कि तुम कौन हो? किसके पुत्र हो? किस राजकुल को विभूषित करते हो? उसके परिचय के बाद ही वंद्व युद्ध बराबर वालों के साथ ही होता है।

प्रश्न 3.
वरदान देने के बाद इंद्र ने कर्ण से क्या कहा?
उत्तर:
अपना ‘शक्ति’ नामक शस्त्र कर्ण को देते हुए देवराज ने कहा- युद्ध में तुम जिस किसी को लक्ष्य करके इसका प्रयोग करोगे, वह अवश्य ही मारा जाएगा, किंतु इसका प्रयोग तुम सिर्फ एक बार ही कर सकोगे। तुम्हारे शत्रु को मारने के बाद यह पुनः मेरे पास आ जाएगा।

प्रश्न 4.
परशुराम ने क्रोध में आकर कर्ण को क्या शाफ दिया? और क्यों?
उत्तर:
परशुराम यह जानकर क्रोधित हो गए कि कर्ण ब्राह्मण नहीं है, सुत पुत्र है- शाप देते हैं कि- तुमने अपने गुरु को धोखा दिया है इसलिए जो विद्या तुमने मुझसे सीखी है, वह अंत समय में तुम्हारे किसी काम न आएगी एवं वक्त पर तुम इसे भूल जाओगे और रण क्षेत्र में तुम्हारे रथ का पहिया ज़मीन में फँस जाएगा।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 7

कौरव-पांडवों ने पहले कृपाचार्य और बाद में द्रोणाचार्य से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी। विद्याध्ययन में सफलता प्राप्त करने के बाद उनके कौशल को प्रदर्शित करने के लिए एक समारोह का आयोजन हुआ। तरह-तरह के खेलों में सभी राजकुमारों ने अपनी दक्षता का प्रदर्शन किया। तीर चलाने की विद्या में अर्जुन सर्वश्रेष्ठ रहा। उसकी दक्षता देखकर सभी दर्शक अत्यधिक प्रभावित हुए लेकिन इसके विपरीत दुर्योधन अंदर ही अंदर जलने लगा। तभी अधिरथ द्वारा पालन-पोषण किया गया कुंती पुत्र कर्ण वहाँ उपस्थित हुआ। कर्ण कुंती पुत्र है यह बात किसी को पता नहीं था। रणभूमि में उसने अपना कौशल दिखाने के लिए अर्जुन को ललकारा। कर्ण ने ललकारते हुए कहा- अर्जुन जो भी करतब तुमने यहाँ दिखाएँ, मैं उससे बढ़कर यहाँ कौशल दिखा सकता हूँ। इस चुनौती को सुनकर दर्शकों में खलबली मच गई लेकिन दुर्योधन मन ही मन काफ़ी प्रसन्न हुआ और वह कर्ण से बोला-बताओ हम तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं। “कर्ण ने कहा- राजन् मैं अर्जुन से वंद्व युद्ध और आपसे मित्रता करना चाहता हूँ। कर्ण की चुनौती सुनकर अर्जुन ने कर्ण से कहा- कर्ण सभा में बिना बुलाए आते हैं और बिना किसी के पूछे बोलने लगते हैं, वे निंदा के पात्र होते हैं। यह सुनकर कर्ण ने कहा- “अर्जुन यह उत्सव केवल तुम्हारे लिए ही नहीं मनाया जा रहा है। राज्य की सभी प्रजा इसमें भाग लेने का अधिकार रखती है। जब कर्ण ने अर्जुन को चुनौती दी तो दर्शकों ने तालियाँ बजाई। कुंती कर्ण को देखकर पहचान गई थी लेकिन भय और लज्जा के कारण मूर्छित हो गई।

इसी बीच कृपाचार्य ने उठकर कर्ण से कहा- “अज्ञातवीर! पांडु पुत्र अर्जुन तुम्हारे साथ युद्ध करने के लिए तैयार हैं किंतु इसके पहले तुम्हें अपना परिचय देना होगा। कुल का परिचय पाए बिना राजकुमार कभी युद्ध नहीं करते। कृपाचार्य की इस बात को सुनकर कर्ण का सिर झुक गया। पास में खड़ा दुर्योधन बोला- अगर बराबरी की बात है तो आज मैं कर्ण को अंग देश का राजा बनाता हूँ। दुर्योधन ने तुरंत पितामह भीष्म एवं पिता धृतराष्ट्र से अनुमति लेकर वहीं रणभूमि में कर्ण को अंगदेश का राजा घोषित कर दिया। उस समय शाम हो चुकी थी। अतः सभी लोग अपने-अपने घर जा रहे थे और अर्जुन, कर्ण और दुर्योधन का उद्घोष कर रहे थे। इस घटना के काफ़ी समय बाद एक दिन इंद्र बूढ़े ब्राह्मण के वेश में कर्ण के पास गए और उनके जन्मजात कवच और कुंडलों की भिक्षा स्वरूप माँगकर अपने साथ ले गए। इंद्र को डर था कि भावी युद्ध में कर्ण की शक्ति से अर्जुन पर विपत्ति आ सकती है। अतः कर्ण की शक्ति को कम करने की इच्छा से उसने यह भिक्षा माँगी।

उधर सर्यदेव ने कर्ण को पहले से ही सचेत कर दिया कि इंद्र तम्हें धोखा देने के लिए ऐसी चाल चलने वाले है लेकिन कर्ण तो महादानी था। इस बात को जानते हुए भी कर्ण ने इंद्र को अपना जन्मजात कवच और कुंडल निकाल कर भिक्षा में दान दे दिया। इंद्र इससे प्रसन्न होकर वरदान माँगने को कहा।

कर्ण ने देवराज इंद्र से कहा- “आप प्रसन्न हैं तो शत्रुओं का संहार करने वाला अपना ‘शक्ति’ नामक शस्त्र मुझे प्रदान करें।” बड़ी प्रसन्नता के साथ इंद्र ने अपना वह शस्त्र कर्ण को देते हुए कहा- युद्ध में तुम जिस किसी को लक्ष्य करके इसका प्रयोग करोगे, वह अवश्य ही मारा जायेगा परंतु एक ही बार तुम इसका प्रयोग कर सकोगे। तुम्हारे शत्रु को मारने के बाद यह मेरे पास वापस आ जाएगा” इतना कहकर इंद्र चले गए।

एक बार कर्ण ब्रह्मास्त्र सीखने की इच्छा से ब्राह्मण के वेश में परशुराम जी के पास गया और उनसे प्रार्थना की कि उसे शिष्य के रूप में स्वीकार करने की कृपा करें। परशुराम ने कर्ण को ब्राह्मण समझकर ब्रह्मास्त्र चलाना सिखा दिया।

एक दिन परशुराम जी कर्ण की जाँघ पर सिर रखकर सो रहे थे। एक काले भौंरे ने कर्ण की जाँघ के नीचे घुसकर कर्ण को लहूलुहान कर दिया। कर्ण ने गुरुदेव की नींद भंग होने की भय से जाँघ को हिलाया नहीं। रक्त से शरीर भीगने पर परशुराम जगे तो उन्होंने जाँघ से बहते हुए खून को देखकर कर्ण से पूछा- बेटा सच बताओ तुम कौन हो?” तब कर्ण असली बात न छिपा सका। उसने स्वीकार किया कि वह ब्राह्मण नहीं है। यह जानकर परशुराम को बड़ा क्रोध आया। अतः उन्होंने उसी समय कर्ण को शाप देते हुए कहा- चूँकि तुमने अपने गुरु को ही धोखा दिया है, इसलिए जो विद्या तुमने मुझसे सीखी है, वह अंत के समय में तुम्हारे किसी काम न आएगी। ऐन वक्त पर तुम उसे भूल जाओगे और रण क्षेत्र में तुम्हारे रथ का पहिया पृथ्वी में फँस जायेगा।

कर्ण को यह विद्या जीवन भर याद रही लेकिन कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय याद न रही। शाप वश उसके रथ का पहिया ज़मीन में धंस गया। जब कर्ण धनुष-बाण रखकर धंसा हुआ पहिया निकाल रहा था, तब अर्जुन ने प्रहार करके कर्ण को मार दिया।

कर्ण सदैव कौरवों के साथ रहे। भीष्म और आचार्य द्रोण के बाद कर्ण कौरव सेनापति रहा और दो दिन तक कुशलता के साथ युद्ध का संचालन किया। कर्ण की मृत्यु सुनकर माता कुंती काफ़ी विचलित हो गई।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-14- निपुणता – कुशलता, प्रदर्शन – दिखावा, सानी – मुकाबला, रंगभूमि – समारोह का आयोजन स्थल।
पृष्ठ संख्या-15- विपत्ति – संकट, देवराज – देवताओं के राजा इंद्र, लहू – खून, सूत्र-पूत्र – सारथी का पुत्र, घनिष्ठता – नजदीकी।
पृष्ठ संख्या-16- आहत – घायल, प्रयत्न – कोशिश, प्रहार – वार, चोट।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 6 भीम

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 6 भीम

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 6

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुर्योधन भीम से ईर्ष्या क्यों करता था?
उत्तर:
दुर्योधन भीम से ईर्ष्या इसलिए करता था, क्योंकि भीम दुर्योधन से अधिक ताकतवर था।

प्रश्न 2.
पांडव कितने भाई थे? उनके नाम बताइए।
उत्तर:
पांडव पाँच भाई थे- युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव।

प्रश्न 3.
धृतराष्ट्र के कितने पुत्र थे? वे क्या कहलाते थे?
उत्तर:
धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे। वे कौरव कहलाते थे।

प्रश्न 4.
कौरव-पांडव किससे अस्त्र विद्या सीखने लगे।
उत्तर:
कौरव-पांडव कृपाचार्य से अस्त्र-विद्या सीखने लगे।

प्रश्न 5.
भीम को मारने के लिए कौरवों ने क्या फ़ैसला किया?
उत्तर:
भीम को मारने के लिए कौरवों ने गंगा में डूबो कर मारने का फैसला किया।

प्रश्न 6.
भीम पर विष का क्या असर हुआ?
उत्तर:
भीम को बेहोशी आ गई और वह गंगा के किनारे गिर पड़ा।

प्रश्न 7.
पांडवों और कुंती की खुशी का कारण क्या था?
उत्तर:
भीम झूमता-झामता जिंदा चला आ रहा था। अतः उसे देखकर पांडवों और कुंती को काफ़ी प्रसन्नता हुई।

प्रश्न 8.
कंती ने अपनी चिंता किसके सामने प्रकट की?
उत्तर:
कुंती ने अपनी चिंता विदुर के सामने प्रकट की।

प्रश्न 9.
कुंती ने अपने पुत्रों के प्रति कौरवों के वैर-भाव देखकर विदुर से क्या चिंता व्यक्त की?
उत्तर:
कुंती ने अपने पुत्रों के प्रति कौरवों का ईर्ष्यापूर्ण रवैया देखकर विदुर से बोली कि दुष्ट दुर्योधन कोई न कोई चाल ज़रूर चल रहा है। राज्य के लोभ में वह भीम को मार डालना चाहता है। अतः उन्हें अपने बच्चों के प्रति चिंता हो रही है।

प्रश्न 10.
युधिष्ठिर ने भीम को क्या समझाया?
उत्तर:
युधिष्ठिर ने भीम को समझाया कि भीम अभी सही समय नहीं आया है, उन्हें अपने आप को नियंत्रित करके रखना होगा। इस समय हम पाँचों भाइयों को किसी तरह एक-दूसरे की रक्षा करते हुए अपने आपको बचाना है।

प्रश्न 11.
भीम के जीवित वापस आने पर दुर्योधन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
भीम के वापस आ जाने पर दुर्योधन आश्चर्यचकित हो गया। अपनी योजना विफल होने पर उसका हृदय ईर्ष्या से जलने लगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भीम को मारने की दुर्योधन ने क्या योजना बनाई ?
उत्तर:
भीम को मारने के लिए दुर्योधन ने पांडवों को जल-क्रीड़ा का न्योता दिया। खेलने व तैरने से थकने के बाद सभी को भोजन कराया गया। दुर्योधन ने छल से भीम के भोजन में विष मिला दिया। भोजन करके सब अपने-अपने डेरों में सोने चले गए, लेकिन भीम विष के प्रभाव से गंगा तट पर रेत में गिर गया। ऐसी हालत में दुर्योधन ने भीम के हाथ पैर बाँधकर उसे गंगा नदी में बहा दिया।

प्रश्न 2.
कौरव विशेषकर भीम से ईर्ष्या क्यों रखते थे?
उत्तर:
कौरव विशेषकर भीम से ईर्ष्या इसलिए रखते थे, क्योंकि भीम में शारीरिक बल सबसे बढ़कर था। वह दुर्योधन और उसके भाइयों को खेल-कूद में खूब परेशान किया करता था। यद्यपि कौरवों के प्रति भीम के मन में कोई वेष भाव नहीं था। वह बचपन के जोश में ऐसा करता था। फिर भी कौरव पांडवों से विशेषकर भीम से जलते थे।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 6

पाँचों पांडव और धृतराष्ट्र के सौ पुत्र साथ-साथ रहते थे। वे आपस में खेलते व हँसी मज़ाक करते रहते थे। इन सभी भाइयों में भीम सबसे शक्तिशाली थे। खेलों में वह दुर्योधन व उसके भाइयों को बचपन के जोश में आकर खूब तंग करता था। इस कारण दुर्योधन तथा उसके भाई भीम से द्वेष करने लगे, यद्यपि भीम अपने मन में किसी से वेष एवं वैर भाव नहीं रखते थे। फिर भी दुर्योधन तथा उसके भाइयों के मन में भीम के प्रति वैर बढ़ने लगा। इधर कौरव और पांडव कृपाचार्य से और बाद में द्रोणाचार्य से शिक्षा प्राप्त करने लगे। विद्या में निपुणता प्राप्त करने के बाद उस कौशल को प्रदर्शित करने के लिए एक समारोह का आयोजन हुआ। तरहतरह के अभ्यासों में सभी राजकुमारों ने अपनी दक्षता का प्रदर्शन किया। तीर चलाने की विद्या में अर्जुन सर्वश्रेष्ठ रहा। उसकी दक्षता देखकर सभी दर्शक अत्यधिक प्रभावित हुए किंतु दुर्योधन उनकी सफलता को देखकर ईर्ष्या से जलने लगे। दुर्योधन हमेशा पांडवों को नीचा दिखाने का प्रयास करने लगे। विद्याध्ययन में भी पांडव कौरवों से आगे थे, जिससे कौरव-पांडवों के बीच ईर्ष्या की भावना और बढ़ने लगी। दुर्योधन सदैव पांडवों को नीचा दिखाने में लगा रहता था। भीम और दुर्योधन के बीच आपस में कभी नहीं बनती थी। एक बार कौरवों ने भीम को गंगा में डूबोकर मार डालने की योजना बनाई।

एक दिन दुर्योधन ने जल क्रीड़ा करने के लिए पाँचों पांडवों को न्योता दिया। बहुत देर खेलने व तैरने के बाद डटकर भोजन के बाद सब अपने अपने डेरों में सो गए। दुर्योधन ने चुपके से भीम के भोजन में पहले से ही विष मिला दिया था। सब लोग सो रहे थे। भीम विष के नशे में गंगा के किनारे रेत में ही गिर गया। दुर्योधन ने लताओं से भीम के हाथ पैर बाँधकर गंगा में बहा दिया। दुर्योधन अंदर-अंदर. काफ़ी खुश था कि भीम तो मर गया।

जब युधिष्ठिर और उनके भाइयों की नींद खुली तब उन्होंने अपने बीच भीम को नहीं पाया। तब चारों भाइयों ने जंगल तथा गंगा तट पर भीम की तलाश की, पर भीम का कहीं पता न चला। वे सब निराश होकर अपनी-अपनी जगह पर वापस आ गए। इतने में भीम झूमता-झूमता वापस आ गया। भीम को देखकर कुंती तथा पांडवों को बहुत खुशी हुई। उन्होंने भीम को गले लगा लिए। माता कुंती को यह सब जानकर काफ़ी दुख हुआ। उसने विदुर को बुलवाया और अकेले में कहा कि- “दुष्ट दुर्योधन राज्य के लालच में भीम को जान से मार डालने की कोशिश कर रहा है।” मुझे इसकी चिंता हो रही है।

विदुर कुशल राजनीतिज्ञ थे और उन्होंने कुंती को समझाते हुए कहा कि तुम्हारा कहना सही है, लेकिन भलाई इसी में है कि इस बात को गुप्त रखा जाय। प्रत्यक्ष रूप से उसके सामने उसका निंदा नहीं करना वरना इससे उसका विद्वेष और बढ़ेगा। इस घटना से भीम काफ़ी उत्तेजित हो गया। फिर भीम को समझाते हुए युधिष्ठिर ने कहा- “भाई भीम, अभी समय नहीं आया है। इसमें अपने आप को सँभालना होगा तथा पाँचों भाइयों को किसी प्रकार एक दूसरे की रक्षा करनी होगी ताकि हम सबका जीवन सुरक्षित रहें।” भीम के वापस आ जाने से दुर्योधन को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह ईर्ष्या से और जलने लगा।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-12
द्वेषभाव – ईर्ष्या की भावना, ज़रा – तनिक, छल – कपट, विष – जहर, खीझना – चिढ़ना, प्रयत्न – कोशिश।

पृष्ठ संख्या-13
काम तमाम करना – जान से मारना, निंदा – बुराई, कदापि-कभी नहीं, उत्तेजित – क्रोधित।