Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 15 चौसर का खेल व द्रौपदी की व्यथा

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 15 चौसर का खेल व द्रौपदी की व्यथा

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 15

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदुर पांडवों के पास किस चीज़ का निमंत्रण देने गए थे?
उत्तर:
हस्तिनापुर में चौसर के खेल में भाग लेने के लिए विदुर पांडवों के पास निमंत्रण देने गए थे।

प्रश्न 2.
चौसर के निमंत्रण पर युधिष्ठिर ने विदुर से क्या कहा?
उत्तर:
चौसर के निमंत्रण पर युधिष्ठिर ने विदुर से कहा- चौसर का खेल अच्छा नहीं होता है। इस खेल से आपस में वैमनष्यता एवं झगड़ा बढ़ता है। समझदार लोग इस खेल को पसंद नहीं करते हैं लेकिन इस मामले में हम लोग आपके निमंत्रण पर चलने वाले हैं। आपका विचार क्या है?

प्रश्न 3.
दुर्योधन ने चौसर में अपनी जगह किसे खिलाया।
उत्तर:
दुर्योधन ने चौसर में अपनी जगह मामा शकुनि को खेलाया।

प्रश्न 4.
राजवंशों की नीति के अनुसार खेल का नियम क्या है?
उत्तर:
राजवंशों की नीति के अनुसार किसी खेल के लिए निमंत्रण को अस्वीकार नहीं किया जाता था।

प्रश्न 5.
अंत में शकुनि ने युधिष्ठिर को किसे दाँव पर लगाने के लिए कहा?
उत्तर:
अंत में शकुनि ने द्रौपदी को दाँव पर लगाने के लिए कहा।

प्रश्न 6.
युधिष्ठिर चौसर के खेल में क्या-क्या हार गए?
उत्तर:
युधिष्ठिर खेल में देश, देश की प्रजा, दास, दासियाँ, आभूषण, चारो भाई, स्वयं अपने आपको एवं पत्नी द्रौपदी को भी हार गए।

प्रश्न 7.
दुर्योधन ने दुःशासन को क्या आदेश दिया?
उत्तर:
दुर्योधन ने दुःशासन से कहा यह सारथी भीम से भयभीत लगता है तुम्ही जाकर उस अभिमानी द्रौपदी को उठाकर ले आओ।

प्रश्न 8.
द्रौपदी के हार जाने पर सभा मंडप पर क्या प्रतिक्रिया हुई ?
उत्तर:
द्रौपदी को हार जाने पर सभागार में उपस्थित लोगों में हाहाकार मच गया। चारों ओर धिक्कार की आवाजें आने लगीं। कुछ लोग कहने लगे कि यह घोर पाप है। कुछ लोगों ने आँसू बहाए और कई काफ़ी दुखी हो गए।

प्रश्न 9.
धृतराष्ट्र का कौन-सा पुत्र द्रौपदी को दाँव पर लगाने की बात पर संतप्त हो उठा?
उत्तर:
धृतराष्ट्र का छोटा पुत्र युयुत्सु संतप्त हो उठा।

प्रश्न 10.
दुर्योधन ने विदुर को क्या आदेश दिया?
उत्तर:
दुर्योधन ने विदुर को कहा आप तुरंत रनिवास में जाएँ और द्रौपदी को यहाँ लाएँ।

प्रश्न 11.
धृतराष्ट्र ने पांडवों को कैसे शांत किया?
उत्तर:
धृतराष्ट्र ने पांडवों को जुए में हारा राज्य व संपत्ति लौटाकर पांडवों को शांत किया।

प्रश्न 12.
धृतराष्ट्र की विनती पर पांडवों ने क्या किया?
उत्तर:
धृतराष्ट्र की विनती पर पांडव द्रौपदी तथा कुंती के साथ इंद्रप्रस्थ चले गए।

प्रश्न 13.
दूसरी बार खेल में क्या शर्त लगी थी?
उत्तर:
दूसरी बार खेल में शर्त लगी कि हारा हुआ दल अपने भाइयों के साथ बारह वर्ष तक वन में जीवन व्यतीत करेगा। उसके बाद एक वर्ष तक अज्ञातवास में रहेगा।

प्रश्न 14.
दूसरी बार खेल में हारने के बाद युधिष्ठिर ने क्या किया?
उत्तर:
दूसरी बार खेल में हारने के बाद पांडव अपनी शर्त के अनुसार वन में चले गए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदुर ने युधिष्ठिर के पास जाकर क्या कहा?
उत्तर:
विदुर ने.युधिष्ठिर के पास जाकर कहा कि हस्तिनापुर में चौसर खेल के लिए एक सभा मंडप बनाया गया है। मैं राजा धृतराष्ट्र की ओर से तुम्हें सभा मंडप देखने और चौसर खेलने का निमंत्रण देने आया हूँ।

प्रश्न 2.
प्रतिकामी ने जाकर द्रौपदी को क्या कहा?
उत्तर:
प्रतिकामी ने रनिवास में जाकर द्रौपदी से कहा कि-चौसर खेल में युधिष्ठिर आपको हार गया है। अब आप दुर्योधन की दासी बन गई है। अब आपको धृतराष्ट्र के महल में दासी का काम करना है। अब आप चलिए मैं आपको लेने आया हूँ।

प्रश्न 3.
द्रौपदी के वस्त्र-हरण के समय भीम ने क्या प्रतिज्ञा की?
उत्तर:
द्रौपदी के वस्त्र हरण के समय भीम ने प्रतिज्ञा की कि-“उपस्थित सज्जनो! मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि जब तक भरतवंश पर बट्टा लगाने वाले इस दुरात्मा दुःशासन की छाती को चीर न लूँगा तब तक इस संसार को छोड़कर नहीं जाऊँगा।”

प्रश्न 4.
भीम की प्रतिज्ञा सुनकर धृतराष्ट्र ने क्या अनुभव किया? और क्या उपाय किया?
उत्तर:
भीम की प्रतिज्ञा सुनकर धृतराष्ट्र ने अनुभव किया कि इस घटना का परिणाम अच्छा नहीं होगा। यह उनके पुत्रों के कुल की बर्बादी का कारण बन जाएगी। इस विपरीत परिस्थिति को सँभालने के लिए उन्होंने द्रौपदी को अपने पास बुलाकर शांत किया तथा युधिष्ठिर से कहा- दुर्योधन के इस षड्यंत्र को माफ़ कर दो। अपना राज्य और संपत्ति ले जाओ और इंद्रप्रस्थ जाकर सुखपूर्वक रहो।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 15

विदुर धृतराष्ट्र के निर्देशानुसार पांडवों के पास इंद्रप्रस्थ गए। उनको देखकर युधिष्ठिर ने विदुर का यथोचित सत्कार किया। फिर विदुर ने आसन पर बैठे-बैठे बोले- हस्तिनापुर में चौसर खेल का आयोजन किया गया है जिसमें सभा मंडप बनाया गया है। राजा धृतराष्ट्र के आदेश पर मैं तुम लोगों को सभा को देखने चलने के लिए न्यौता देने आया हूँ। धृतराष्ट्र की इच्छा है कि तुम सब भाई आओ। चौसर खेल का आनंद लो। इस पर युधिष्ठिर ने विदुर से कहा कि चौसर का खेल अच्छा नहीं होता है। यह खेल आपस में मनमुटाव करवा देता है, लेकिन राजवंशों की परंपराओं के अनुसार किसी भी खेल के लिए बुलाए जाने पर मना नहीं करना चाहिए। इसके अलावा युधिष्ठिर को मन में शंका हुई कि धृतराष्ट्र के बुलाने पर नहीं जाने पर कहीं वह अपना अपमान न समझ लें। इसके बाद युधिष्ठिर सपरिवार हस्तिनापुर पहुंच गए।

शकुनि ने चौसर पारी की शुरुआत की और खेलने के लिए युधिष्ठिर से कहा। इस पर युधिष्ठिर बोले- “यह खेल ठीक नहीं है। यह खेल धोखा के समान है। इस पर शकुनि ने प्रतिक्रिया दिया कि आपको खेल में हार जाने का डर है। इस बात पर युधिष्ठिर बोले कि ऐसी बात नहीं हैं। आप कहते हैं तो खेल लेते हैं।

तब दुर्योधन बोल उठा- मेरी जगह खेलेंगे तो मामा शकुनि किंतु दाँव लगाने के लिए जो धन इत्यादि चाहिए, वह मैं दूंगा।
युधिष्ठिर बोले- मेरा मानना है कि किसी एक की जगह दूसरे को नहीं खेलना चाहिए। यह खेल के नियमों के विरुद्ध है।

खेल प्रारंभ हो गया। सारा मंडप दर्शकों से भरा हुआ था। द्रोण, भीष्म, कृपाचार्य, विदुर धृतराष्ट्र जैसे वयोवृद्ध उपस्थित थे। दर्शकों के चेहरे पर उदासी छाई हुई थी। दाँव पर दाँव चले गए और युधिष्ठिर हर बाज़ी हारते चले गए। भाइयों के शरीर के वस्त्र आभूषण भी हार गए। एक-एक करके भाईयों को और अंत में खुद अपने को भी हार गए। शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा-“एक और चीज़ है जो तुमने अभी हारी नहीं है उसकी बाज़ी लगाओ, तो तुम अपने आपको भी छुड़ा सकते हो। अपनी पत्नी द्रौपदी को तुम दाँव पर क्यों नहीं लगाते।”

युधिष्ठिर ने द्रौपदी की भी बाज़ी लगा दी और शकुनि ने बाजी जीत ली। सभा में हाहाकार मच गया। धिक्कार की आवाजें आने लगीं। दुर्योधन ने विदुर से द्रौपदी को रनिवास से लाने को कहा। विदुर ने सभासदों की ओर देखकर कहा अपने को हार जाने के बाद युधिष्ठिर को कोई हक नहीं कि वह द्रौपदी की बाज़ी लगाए।

विदुर की इन बातों से दुर्योधन क्रोधित हो गया और अपने सारथी प्रतिकामी को बुलाया और बोला कि तुम रनिवास में जाओ और द्रौपदी को बोलो कि चौसर के खेल में युधिष्ठिर आपको दाँव में हार बैठे हैं। मैं आपको लेने आया हूँ।

द्रौपदी प्रतिकामी से बोली- सारथी तुम जाकर पहले उन हारने वाले जुए के खिलाड़ियों से पूछो कि पहले वह अपने को हारे थे या मुझे। भरी सभा में यह प्रश्न करना, जो उत्तर मिले आकर बताना! उसके बाद मुझे ले जाना।

प्रतिकामी ने भरी सभा में युधिष्ठिर से यही प्रश्न किया। दुर्योधन ने प्रतिकामी से कहा कि द्रौपदी से कहो कि यह प्रश्न वह खुद ही आकर करें। प्रतिकामी दुबारा रनिवास में गया और बोला कि दुर्योधन की आज्ञा है कि आप स्वयं आकर युधिष्ठिर से प्रश्न कर लें। अब द्रौपदी ने जाने से मना कर दिया। बोली अगर युधिष्ठिर उत्तर नहीं देते तो, जो सभा में बैठे लोग हैं, उनका उत्तर आकर बताओ। इस बार द्रौपदी ने आने से इंकार कर दिया। प्रतिकामी के लौटने पर झल्लाए हुए दुर्योधन ने दःशासन को भेजा। उसने दुःशासन को आदेश दिया कि तुम जाकर उस घमंडी औरत को उठा लाओ। दुःशासन द्रौपदी के बाल खींचते हुए बलपूर्वक घसीटते हुए सभा में ले आया। इससे द्रौपदी बेचैन हो उठी। उसकी इस दशा को देखकर धृतराष्ट्र के बेटे विकर्ण को बड़ा दुख हुआ। उससे रहा नहीं गया। वह बोल उठा कि युधिष्ठिर खुद दाँव पर अपने आपको हार चुके थे, फिर द्रौपदी की बाज़ी लगाने का उनको अधिकार नहीं रह जाता है। मेरे हिसाब से द्रौपदी नहीं जीती गई।

विकर्ण की बातों से वहाँ उपस्थित लोगों में कोलाहल मच गया। यह सब देखकर कर्ण क्रोधित होकर विकर्ण से बोला, अभी तुम बच्चे हो। तुम्हें बोलने को कोई अधिकार नहीं है।

यह देखकर दुःशासन द्रौपदी के वस्त्र पकड़कर खींचने लगा। वह ज्यों-ज्यों वस्त्र खींचता गया त्यों-त्यों वस्त्र बढ़ता गया। वस्त्र खींचतेखींचते थक कर वह ज़मीन पर गिर पड़ा। दुःशासन की इस हरकत को देखकर भीम ने भरी सभा में प्रतिज्ञा लिया कि मैं इस दुरात्मा दुःशासन की छाती को चीरकर ही दम लूँगा।

इन सब क्रियाकलापों को देखकर धृतराष्ट्र समझ गए कि यह सब ठीक नहीं हुआ है। अतः उन्होंने द्रौपदी को सांत्वना दी और युधिष्ठिर को राज्य लौटा दिया। इसके बाद पांडव द्रौपदी को लेकर वापस इंद्रप्रस्थ चले गए। दुःशासन और शकुनि के उकसाने पर दुर्योधन ने धृतराष्ट्र को इस बात के लिए राजी कर लिया कि पांडवों को एक बार फिर से चौसर खेलने के लिए बुलाया जाय। युधिष्ठिर ने पिछली घटनाओं से दुखी होकर उनका न्यौता स्वीकार कर लिया। इस बार चौसर का शर्त था कि हारा हुआ दल अपने भाइयों के साथ बारह वर्ष का आज्ञात वनवास काटेगा। यदि इस बीच एक वर्ष में उनका पता चल जाएगा, तो सबको बारह वर्ष के लिए फिर से वनवास काटना पड़ेगा। इस बार फिर युधिष्ठिर चौसर में हार गए और शर्त के अनुसार पांडव वनवास चले गए।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-37- अनर्थ – बुरा, भरसक – पूरी तरह से शक्तिभर, अस्वीकार – मना करना, अपमान – निरादर, प्रेरित – उत्साहित, चेताना – सचेत करना।
पृष्ठ संख्या-38- साहस – हिम्मत, गरम होकर – क्रोधित होकर, विरुद्ध – विपरीत, चाव – उत्साह, इशारों – संकेतों।
पृष्ठ संख्या 39- पार पाना – ज्ञान प्राप्त करना, दुरात्मा – दुष्ट, सानी – मुकाबला, दुर्दैव – दुर्भाग्य, बेबस – लाचार, दाद देनावाह – वाही, विकल – व्याकुल।
पृष्ठ संख्या-40- युयुत्सु – धृतराष्ट्र का एक सौ एकवाँ पुत्र जो एक वैश्य जाति की स्त्री से पैदा हुआ था।
पृष्ठ संख्या-41- न्यायोचित – न्याययुक्त, उकसाना – प्रेरित करना, थर्रा उठना – भयभीत होना, अजातशत्रु – जिसका कोई शत्रु न हो, कुचाल – बुरा काम।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 14 शकुनि का प्रवेश

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 14 शकुनि का प्रवेश

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 14

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ क्या शपथ ली?
उत्तर:
एक दिन युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ युद्ध की संभावना मिटाने के उद्देश्य से यह कसम खाई की वे आज से तेरह साल तक भाइयों से युद्ध नहीं करेगा। उनकी भावनाओं की कद्र करेगा तथा कभी नीचा दिखाने का प्रयास नहीं करेगा। उनकी बात को कभी नहीं टालेंगे।

प्रश्न 2.
युधिष्ठिर की बात पांडव भाइयों को कैसी लगी?
उत्तर:
युधिष्ठिर की बात उसके भाइयों को औचित्यपूर्ण लगी।

प्रश्न 3.
पांडव राजसूय कर रहे हैं? यह जानकर दुर्योधन को कैसा लगा?
उत्तर:
पांडवों द्वारा राजसूय यज्ञ करना दुर्योधन को अच्छा नहीं लगा।

प्रश्न 4.
दुर्योधन के इंद्रप्रस्थ पर चढ़ाई के प्रस्ताव पर शकुनि ने क्या उत्तर दिया?
उत्तर:
इंद्रप्रस्थ पर चढ़ाई के प्रस्ताव पर शकुनि ने कहा कि युद्ध की बात मत करना। तुम पांडवों पर विजय प्राप्त करना चाहते हो तो युद्ध के बदले चतुराई से काम लो। मैं तुम्हें ऐसा उपाय बता सकता हूँ जिससे बिना लड़ाई के ही युधिष्ठिर पर आसानी से विजय प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 5.
शकुनि ने धृतराष्ट्र को किस चीज़ के लिए बाध्य किया?
उत्तर:
पांडवों को चौसर खेल में बुलाने के लिए शकुनि ने धृतराष्ट्र को बाध्य किया।

प्रश्न 6.
जुए के खेल के विरोध में धृतराष्ट्र के क्या मत थे?
उत्तर:
जुए के खेल के विरोध में धृतराष्ट्र के मत थे कि- “जुए का खेल वैर-भाव का जड़ होता है। इसलिए बेटा मेरी तो राय यह है कि तुम्हारा विचार गलत है। इस विचार को त्याग दो।

प्रश्न 7.
जुए के खेल के विषय में विदुर ने क्या मत व्यक्त किए।
उत्तर:
जुए के खेल के विषय में विदुर बोले, “राजन सारे वंश का इससे नाश हो जाएगा। इसके कारण हमारे कुल के लोगों में आपसी मनमुटाव और झगड़े-फसाद होंगे। इससे भारी संकट हम पर आएगी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शकुनि ने दुर्योधन को क्या कहकर सांत्वना दिया?
उत्तर:
दुर्योधन को सांत्वना देते हुए मामा शकुनि ने कहा- तुम इस तरह मन छोटा क्यों करते हो? तुम्हें पांडवों के भाग्य पर जलन नहीं होनी चाहिए। उन्हें न्यायपूर्वक जो राज्य मिला है, वे उसी का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने किसी का कुछ बिगाड़ा नहीं है। फिर उनकी शक्ति और सौभाग्य से तुम्हारा कुछ बिगड़ा भी नहीं है। तुम्हारे साथ हम सभी है। फिर चिंता की क या बात है?

प्रश्न 2.
पांडवों को बिना युद्ध के जीत पाने का शकुनि ने क्या उपाय बताया?
उत्तर:
शकुनि ने कहा- “युधिष्ठिर को चौसर के खेल का बड़ा शौक है, पर उसे खेलना नहीं आता है। शकुनि ने दुर्योधन को कहा कि वह इस खेल में उसकी ओर से खेलेगा और युधिष्ठिर को पराजित कर राज्य छीनकर वह दुर्योधन के हवाले कर देगा।

प्रश्न 3.
धृतराष्ट्र के मना करने पर भी दुर्योधन अपने हठ पर अड़ा रहा क्यों?
उत्तर:
दुर्योधन पांडवों के ठाट-बाट तथा यश समृद्धि के कारण बेचैन हो रहा था। पांडवों के सौभाग्य की बात याद करके उसकी जलन बढ़ने लगी। वह कुछ ऐसा करना चाहता था कि पांडवों का हस्तिनापुर में कभी प्रवेश न हो। वह पांडवों को अपने हिस्से का राज्य नहीं देना चाहता था। इसी उद्देश्य से वह चौसर का खेल खेलने के लिए उन्हें निमंत्रण देना चाहता था। धृतराष्ट्र जुए खेल को वैर-विरोध का जड़ मानते थे।

अतः वे दुर्योधन को इस काम के लिए मना करते रहे, किंतु अपनी बात मनवाने के लिए दुर्योधन अपने पिता धृतराष्ट्र के सामने ज़िद करने लगा।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 14

एक दिन युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा कि युद्ध की संभावना को मिटा देने के उद्देश्य से आपस में यह शपथ लेते हैं कि आज से तेरह वर्ष तक कभी किसी से युद्ध नहीं करेंगे। यहाँ तक कि दुर्योधन और दूसरे कौरवों की बात की अवहेलना नहीं करेंगे। सदैव उनकी इच्छानुसार कार्य करने की कोशिश करेंगे। युधिष्ठिर का सुझाव सभी भाइयों को उचित लगा। उधर दुर्योधन पांडवों की ठाट-बाट तथा यश समृद्धि को देखकर जलने लगा। वह काफ़ी बेचैन हो गया। पांडवों के सौभाग्य की बात याद करके उसकी जलन और बढ़ने लगी। एक दिन महल के एक कोने में काफ़ी उदास और चिंतित मन से बैठा था। तभी उसका मामा शकुनि वहाँ आ गया। उसने दुर्योधन से पूछा कि तुम इतने उदास क्यों बैठे हो? तुम्हें दुख क्या है ? दुर्योधन ने तभी अपनी व्यथा शकुनि को सुनाई। पांडव किस तरह ठाट-बाट से राज कर रहे हैं। यह सब इन आँखों से देखने पर भी मैं कैसे शोक न करूँ। मेरा अब तो जीना ही व्यर्थ मालूम होता है।

शकुनि ने दुर्योधन को समझाते हुए कहा कि तुम्हें पांडवों के सौभाग्य पर जलन नहीं होनी चाहिए। पांडव अपने न्यायपूर्ण अधिकार का उपयोग कर रहे हैं। अपनी शक्ति से उन्होंने अपना राज्य बढ़ाया है। तुम्हारे साथ भीष्म, कृपाचार्य, द्रोण, अश्वत्थामा, जयद्रथ, सोमदत्त और मुझ जैसे वीर हैं। तुम भी सारे संसार पर विजय प्राप्त कर सकते हो।

शकुनि ने दुर्योधन को समझाते हुए कहा कि युद्ध की बात मत करो। मेरे पास एक ऐसा उपाय है कि बिना लड़ाई के ही युधिष्ठिर पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। दुर्योधन की जिज्ञासा बढ़ी और उसने शकुनि से पूछा तो शकुनि ने कहा- दुर्योधन युधिष्ठिर को चौसर का खेल का बड़ा शौक है। पर उसे खेलना नहीं आता। हम उसे खेलने के लिए बुलाएँ, तो युधिष्ठिर अवश्य मान जाएगा। तुम जानते हो कि मैं मँजा हुआ खिलाड़ी हूँ। तुम्हारी ओर से मैं खेलूँगा और युधिष्ठिर को हराकर उसका सारा राज्य और एश्वर्य हम बिना युद्ध के जीत लेंगे और सारा राज्य मैं तुम्हें दे दूंगा।

अब दुर्योधन और शकुनि धृतराष्ट्र के पास गए। वहाँ शकुनि ने सलाह दिया कि पांडवों को चौसर खेल के लिए बुलाया जाए। धृतराष्ट्र ने जुए के खेल को बुरा बताते हुए इस प्रस्ताव का विरोध किया। लेकिन पुत्र मोह और दुर्योधन के ज़िद के सामने धृतराष्ट्र ने घुटने टेक दिए।

विदुर ने धृतराष्ट्र को सचेत करते हुए कहा- राजन! सारे वंश का नाश हो जाएगा। इसके कारण हमारे कुल के लोगों में आपसी रंजिश, मनमुटाव और झगड़े-फसाद बढ़ेंगे। इससे भारी संकट हम पर आएगी किंतु पुत्र मोह के सामने धृतराष्ट्र ने विदुर को ही चौसर का निमंत्रण देने इंद्रप्रस्थ भेज दिया।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-35- बेचैन – व्याकुल, परम मित्र – निकटतम दोस्त, व्यर्थ – बेकार, सांत्वना देना – समझाना, सौभाग्य – अच्छा भाग्य।
पृष्ठ संख्या-36, 37- सहज – स्वाभाविक, सरल, ऐश्वर्य – धन दौलत, ईजाद – आविष्कार, खोज, विपदा – संकट, राय – परामर्श ।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 13 जरासंध

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 13 जरासंध

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 13

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जरासंध कौन था?
उत्तर:
जरासंध मगध देश का राजा था, और कंस उसका दामाद था।

प्रश्न 2.
नियम के अनुसार, राजसूय यज्ञ कौन करने का अधिकारी होता था?
उत्तर:
जो संपूर्ण संसार में राजाओं में पूज्य हो, वह राजा ही राजसूय यज्ञ कर सकता था।

प्रश्न 3.
राजसूय यज्ञ करने की इच्छा से युधिष्ठिर ने किससे सलाह ली।
उत्तर:
राजसूय करने की इच्छा से युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से सलाह ली।

प्रश्न 4.
युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करने का इरादा क्यों छोड़ा?
उत्तर:
युधिष्ठिर ने सम्राट का विचार छोड़ देने में ही अपनी भलाई समझा, क्योंकि उन्हें भीम व अर्जुन की बातों से यह संदेक होने लगा कि राजसूय यज्ञ करने के लिए कई लोगों के प्राणों की बलि चढ़ जाएगी। अतः उन्होंने इस इरादे को बदल देना ही श्रेष्यकर समझा।

प्रश्न 5.
युधिष्ठिर की अनिच्छा को देखते हुए अर्जुन ने क्या कहा?
उत्तर:
युधिष्ठिर ने जब राजसूय यज्ञ का विचार छोड़ देने की बात कही, तब अर्जुन ने कहा- “यदि हम यशस्वी भरतवंश की संतान होकर भी कोई साहस का काम न करें, तो धिक्कार है हमें और हमारे जीवन को। जिस काम को करने की शक्ति है, भाई युधिष्ठिर क्यों ऐसा समझते हैं कि हम नहीं कर पाएंगे।

प्रश्न 6.
अर्जुन के उद्गार सुनने के बाद श्रीकृष्ण ने क्या कहा?
उत्तर:
श्रीकृष्ण अर्जुन की इन बातों को सुनकर मंत्र-मुग्ध हो गए। बोले-“धन्य हो अर्जुन! कुंती के लाल, अर्जुन से मुझे यही आशा थी।”

प्रश्न 7.
जरासंध का वध किसने किया?
उत्तर:
जरासंध का वध भीम ने किया।

प्रश्न 8.
राजसूय यज्ञ में किसकी अग्रपूजा की गई?
उत्तर:
राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण की अग्रपूजा की गई।

प्रश्न 9.
श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीम किस रूप में जरासंध के पास पहुँचे?
उत्तर:
वे ब्राह्मण के व्रती लोगों का वेश बनाकर जरासंध के पास पहुंचे।

प्रश्न 10.
श्रीकृष्ण की अग्रपूजा का विरोध किसने किया?
उत्तर:
श्रीकृष्ण की अग्रपूजा का विरोध शिशुपाल ने किया।

प्रश्न 11.
राजसूय संपन्न होने के बाद किसे राजाधिराज की पदवी मिली।
उत्तर:
राजसूय यज्ञ समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर को राजाधिराज की पदवी प्राप्त हुई।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण ने राजसूय यज्ञ में क्या बाधा बताई ?
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने राजसूय यज्ञ में जरासंध की बाधा बताई। उसके जीवित रहते इस प्रकार का यज्ञ करना संभव नहीं था। सभी राजा उसका लोहा मानते थे। उसके नाम से सभी डरते थे। श्रीकृष्ण भी उससे तीन वर्ष तक लड़ते रहे, पर उसे जीत नहीं पाए। उसने अनेक राजाओं को बंदीगृह में डाल रखा था। उनको छुड़ाना होगा। जरासंध के वध के बाद ही राजसूय यज्ञ हो पाएगा।

प्रश्न 2.
जरासंध किस प्रकार मारा गया?
उत्तर:
जरासंध अतिथियों का परिचय जानकर उनसे दवंदव युदध करने लगा। वे तेरह दिन तक यदध करते रहे। चौदहवें दिन जरासंध थका और थोड़ी देर के लिए रुका। श्रीकृष्ण ने इशारों में भीम को कुछ समझाया। भीम उसे उठाकर चारों तरफ़ घुमाया और जोर से ज़मीन पर पटक दिया। पटकने के बाद ज़मीन पर गिरने के बाद उसकी मौत हो गई। इस प्रकार जरासंध का अंत हो गया।

प्रश्न 3.
शिशुपाल का वध किसने? और क्यों किया?
उत्तर:
शिशुपाल का वध श्रीकृष्ण ने किया। वह राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण की अग्रपूजा का विरोध कर रहा था। अतः उसके जिदद और अहंकार को तोड़ने के लिए श्रीकृष्ण ने उसके साथ युद्ध किया। इसमें शिशुपाल मारा गया।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 13

इंद्रप्रस्थ में पांडव न्यायपूर्वक राज कर रहे थे। पांडवों और युधिष्ठिर की इच्छा हुई की राजसूय यज्ञ किया किया जाए। इसके लिए उन्होंने श्रीकृष्ण को संदेश भेजा और श्रीकृष्ण इंद्रप्रस्थ आ गए। युधिष्ठिर ने अपना प्रस्ताव श्रीकृष्ण के सामने रखा। श्रीकृष्ण ने बताया कि राजसूय यज्ञ वही कर सकता है जो सारे संसार के राजाओं का पूज्य हो तथा उनके द्वारा सम्मानित हो, मगध के राजा जरासंध ने देश के सभी राजाओं को अपने अधीन कर रखा है। यहाँ तक की शिशुपाल जैसे राजा भी जरासंध की अधीनता स्वीकार कर चुके हैं। अतः जरासंध के जीवित रहते हुए कौन सम्राट का पद हासिल कर सकता है। मैंने उसके साथ तीन वर्ष युद्ध किया अंत में हार गया। मुझे मथुरा छोड़ द्वारिका में रहना पड़ा। जब कंस जरासंध की बेटी से ब्याह कर उसका साथी बन गया था तब मैंने उसके साथ युद्ध किया था। उधर जरासंध की कारागार में अनेक राजे-महाराजे कैद हैं। अतः पहले जरासंध को मारकर बंदी राजाओं को छुड़ाना होगा। जब तक जरासंध जीवित है तब तक आप राजसूय यज्ञ नहीं कर पाएँगे।

श्रीकृष्ण के विचार सुनकर युधिष्ठिर सम्राट बनने का विचार छोड़ने की बात करने लगे। भीम ने युधिष्ठिर से कहा- श्रीकृष्ण की नीति-कुशलता, मेरा शारीरिक बल और अर्जुन का शौर्य एक साथ मिल जाने पर कौन-सा ऐसा काम है, जो हम नहीं कर सकते? यदि तीनों एक साथ चलें तो जरासंध की शक्ति को समाप्त कर देंगे। आप इस बात की शंका न करें।

यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा- “यदि भीम और अर्जुन तैयार हों, तो हम तीनों मिलकर एक साथ जाकर उस अन्यायी की जेल में पड़े हुए निर्दोष राजाओं को छुड़ा सकेंगे।” लेकिन युधिष्ठिर इस बात से सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा- मैं तो कहूँगा कि जिस कार्य में प्राणों पर बन जाए उस विचार को छोड़ देना चाहिए।

अर्जुन इस बात को सुनकर बोले- यदि हम यशस्वी भरत वंश की संतान होकर भी कोई भी साहस का काम न करें तो धिक्कार है अपने जीवन पर। जिस काम को करने की हममें सामर्थ्य है, भाई युधिष्ठिर ऐसा क्यों सोचते हैं कि हम नहीं कर सकेंगे।”

जरासंध से युद्ध का निर्णय होने पर श्रीकृष्ण, भीम तथा अर्जुन ब्राह्मण का वेश धारण कर तत्काल वस्त्र पहनकर कुशा हाथ में लेकर जरासंध की राजधानी पहुंच गए।

जरासंध ने ब्राह्मण समझकर उनका आदर सम्मान दिया। श्रीकृष्ण ने जरासंध से कहा- मेरे दोनों साथियों ने मौनव्रत लिया हुआ है। इस कारण ये अभी नहीं बोलेंगे। आधी रात के बाद व्रत खुलने पर बात चीत करेंगे। जरासंध ने इस बात पर विश्वास कर लिया और तीनों मेहमानों को यज्ञशाला में ठहराकर महल में चला गया। अगर कोई ब्राह्मण जरासंध के पास आता था तो उनकी इच्छा तथा सुविधा के अनुसार बातें करना व उनका सत्कार करना जरासंध का व्यवहार था। इसके अनुसार आधी रात के बाद जरासंध अतिथियों से मिलने गया, परंतु अतिथियों के रंग-ढंग देखकर मगध नरेश के मन में कुछ शंका हुई।

राजा जरासंध ने कड़ककर पूछा- “सच बताओ, तुम लोग कौन हो? ब्राह्मण नहीं लगते हो। इस पर तीनों ने सही बात बता दिया और कहा- “हम तुम्हारे शत्रु हैं। अभी वंद्व युद्ध करना चाहते हैं। हम तीनों में से किसी एक से, जिससे तुम्हारी इच्छा हो, लड़ सकते हो। हम सभी इसके लिए तैयार हैं।

भीम और जरासंध में युद्ध होने लगा। तेरह दिन लगातार लड़ने के बाद जरासंध थोड़ी देर के लिए युद्ध में रुक गया। श्रीकृष्ण ने भीम को इशारा किया और भीम ने जरासंध के दो टुकड़े कर दिए। इस प्रकार अजेय जरासंध का अंत हो गया।

श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा भीम ने बंदी राजाओं को छुड़ाया तथा जरासंध के पुत्र सहदेव को मगध की गद्दी पर बैठाकर इंद्रप्रस्थ लौट आए। इसके बाद राजसूय यज्ञ हुआ। आए हुए राजाओं में सबसे पहले किस नरेश की पूजा हो, भीष्म ने श्रीकृष्ण का नाम सुझाया। युधिष्ठिर के निर्देश पर सहदेव ने श्रीकृष्ण की पूजा की। यह देखकर चेदि का राजा शिशुपाल गुस्से से लाल हो गया और बोला- यह अन्याय है। एक साधारण व्यक्ति की इस प्रकार पूजा की जाती है। उसने भरी सभा में कहा कि- जिस दुरात्मा ने कुचक्र रचकर वीर जरासंध को मरवा डाला, उसी की पूजा युधिष्ठिर ने की है। इस प्रकार शब्द वाणों की बौछार करते हुए शिशुपाल सभा से निकल गया। अंत में शिशुपाल मारा गया और श्रीकृष्ण की जीत हुई। इसके बाद राजसूय यज्ञ संपन्न हुआ और युधिष्ठिर को राजाधिराज की पदवी मिल गई।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-32
राजसूय यज्ञ – राजाओं के राजा यानी चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए किया गया यज्ञ, संदेश – सूचना, तत्काल – तुरंत, पूज्य – सम्मानित।

पृष्ठ संख्या-33
दुर्ग – किला, बगैर – बिना, अजेय – जिसे कोई न जीत सके, आकांक्षा – इच्छा, अतिथि – मेहमान, कुलीन – अच्छे कुल में जन्मा हुआ।

पष्ठ संख्या-34
दवंदव यदध – दो व्यक्तियों में होने वाला संघर्ष, अभ्यागत – मेहमान, निमंत्रण पाकर आया व्यक्ति, अग्र पूज्य – सर्वप्रथम सम्मानित होने वाला, गौरवान्वित – गौरव से युक्त, दुरात्मा – दुष्ट, कुचक्र – षड्यंत्र, शब्दबाण – कटुक्ति, कठोर वचन।

पृष्ठ संख्या-35
अनुनय विनय – विनम्र प्रार्थना, राजाधिराज – राजाओं का राजा।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 12 इंद्रप्रस्थ

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 12 इंद्रप्रस्थ

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 12

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पांडवों के जीवित होने की सूचना मिलने पर विदुर ने धृतराष्ट्र से क्या कहा?
उत्तर:
पांडवों के जीवित होने की सूचना पाकर विदुर दौड़े हुए धृतराष्ट्र के पास गए और बोले, “महाराज! पांडव अभी जीवित हैं। राजा द्रुपद की कन्या द्रौपदी को अर्जुन ने स्वयंवर में प्राप्त किया है। पाँचों भाइयों ने विधिपूर्वक द्रौपदी के साथ ब्याह कर लिया है और कुंती के साथ द्रुपद के यहाँ रह रहे हैं।

प्रश्न 2.
दुर्योधन को क्या डर सताने लगा?
उत्तर:
दुर्योधन को डर सताने लगा कि पांडव अब पहले से भी अधिक शक्तिशाली हो गए हैं। अतः अब वे हम पर आक्रमण कर सकते हैं।

प्रश्न 3.
कर्ण ने दुर्योधन को क्या सुझाव दिया?
उत्तर:
कर्ण ने दुर्योधन को सुझाव दिया कि- पांडवों की शक्ति बढ़ने से पहले ही उन पर आक्रमण कर दिया जाए।

प्रश्न 4.
भीष्म ने धृतराष्ट्र को क्या सुझाव दिया?
उत्तर:
भीष्म ने धृतराष्ट्र को सुझाव दिया कि पांडवों के साथ संधि करके आधा राज्य उन्हें वापस दे दिया जाए।

प्रश्न 5.
विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र को क्या सलाह दी?
उत्तर:
विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र को सलाह दी कि पितामह भीष्म तथा आचार्य द्रोण ने जो बताया है वही सबसे अच्छा है। पांडवों को आधा हिस्सा राज्य का वापस दे देना चाहिए। कर्ण की सलाह बिलकुल अनुचित है।

प्रश्न 6.
आचार्य द्रोण ने गुस्से से कर्ण के बारे में क्या कहा?
उत्तर:
आचार्य द्रोण क्रोधित होकर बोले “दुष्ट कर्ण! तुम राज्य को गलत रास्ता बता रहे हो। अगर धृतराष्ट्र तुम्हारी सलाह पर चले, तो कौरवों का विनाश निश्चित है।

प्रश्न 7.
महाराज द्रुपद की शर्त किसने पूरी की?
उत्तर:
महाराज द्रुपद की शर्त अर्जुन ने पूरी की।

प्रश्न 8.
विदुर को पांचाल देश क्यों भेजा गया?
उत्तर:
पांडवों को द्रौपदी और कुंती के साथ आदर सहित हस्तिनापुर लाने के लिए विदुर को भेजा गया।

प्रश्न 9.
पांचाल देश में विदुर ने धीरज देते हुए कुंती से क्या कहा?
उत्तर:
राज्याभिषेक के बाद युधिष्ठिर को आशीर्वाद देते हुए धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों की निंदा करते हुए यह सलाह दी कि वह खांडवप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाकर वहीं से राज करे। खांडवप्रस्थ हमारे पूर्वजों की राजधानी रही है। इसे फिर से बसाने का यश तुमको मिलेगा।

प्रश्न 10.
पांडवों की राजधानी का क्या नाम था?
उत्तर:
पांडवों की राजधानी का नाम इंद्रप्रस्थ था।

प्रश्न 11.
धृष्टद्युम्न ने कुम्हार की कुटिया में क्या देखा?
उत्तर:
धृष्टद्युम्न ने कुम्हार की कुटिया में पाँचों पांडवों को तथा अग्निशिखा की भाँति एक तेजस्वी देवी अर्थात् कुंती को देखा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुर्योधन के मन में ईर्ष्या की आग क्यों प्रबल हो उठी?
उत्तर:
दुर्योधन के मन में ईर्ष्या की भावना इसलिए बढ़ने लगी कि पांडव पांचाल राज की कन्या से ब्याह करके और अधिक शकि तशाली बन गए हैं। अतः उसके मन में पांडवों के प्रति ईर्ष्या की आग प्रबल हो उठी।

प्रश्न 2.
अंत में धृतराष्ट्र ने क्या निश्चय किया?
उत्तर:
अंत में धृतराष्ट्र ने यह निश्चय किया कि पांडु पुत्रों को आधा राज्य देकर संधि कर ली जाए और पांडवों को द्रौपदी तथा कुंती सहित लाने के लिए पांचाल भेजा जाए।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 12

द्रौपदी स्वयंवर की सूचना जब हस्तिनापुर में पहुँची तो वहाँ पर सबसे अधिक विदुर खुश हुए और उन्होंने धृतराष्ट्र के पास जाकर कहा-पांडव अभी जीवित हैं। राजा द्रुपद की कन्या को स्वयंवर में अर्जुन ने प्राप्त किया है। पाँचों भाइयों ने विधिपूर्वक द्रौपदी के साथ विवाह कर लिया है और कुंती के साथ द्रुपद के यहाँ कुशलतापूर्वक हैं।

यह सुनकर धृतराष्ट्र खुश हुए और बोले- “भाई विदुर तुम्हारी बातों से मुझे काफ़ी आनंद हो रहा है लेकिन दुर्योधन को जब पता चला कि पांडव पांचाल राज की कन्या से ब्याहकर और शक्तिशाली बन गए हैं तो उनके प्रति ईर्ष्या की आग और अधिक प्रबल हो उठी। उसने यह दुखड़ा मामा शकुनी को सुनाया।

इसके बाद कर्ण और दुर्योधन धृतराष्ट्र के पास गए और एकांत में उनसे दुर्योधन ने कहा- जल्दी से ही हम ऐसा उपाय करें ताकि उनसे सदा के लिए छुटकारा पा लें। इस बात पर कर्ण को हँसी आ गई उसने कहा- दुर्योधन छल-प्रपंच से अब काम नहीं चलेगा। फूट डालकर उन्हें हराना असंभव है। अब बस एक ही उपाय है कि पांडवों पर हमला कर दिया जाए। राजा धृतराष्ट्र दुर्योधन और कर्ण की बात सुनकर असमंजस्य में पड़ गए। वे कोई सही निर्णय नहीं ले पा रहे थे। वे भीष्म पितामह और द्रोण को बुलाकर परामर्श करने लगे। पितामह पाँडवों के जीवित रहने की खबर सुनकर काफ़ी खुश हुए।

भीष्म पितामह ने सलाह दिया कि पांडवों के साथ समझौता करके आधा राज्य उन्हें दे देना चाहिए। उस समय अंग नरेश कर्ण वहीं मौजूद था, यह सलाह उसे अच्छी नहीं लगी। कर्ण के हृदय में दुर्योधन के प्रति अपार स्नेह था। कर्ण द्रोणाचार्य की परामर्श को सुनकर क्रोधित हो उठा और धृतराष्ट्र से बोला- “राजन! शासकों का कर्तव्य है कि मंत्रणा देने वालों की नीयत को पहले जाँच कर लें। कर्ण की इन बातों को सुनकर द्रोणाचार्य क्रोधित हो गए और वे बोले- दुष्ट कर्ण। तुम राजा को गलत सलाह दे रहे हो। अगर धृतराष्ट्र तुम्हारी सलाह पर चले, तो कौरवों का विनाश निश्चित है।

इसके बाद धृतराष्ट्र ने विदुर से राय लिया। विदुर ने कहा कि पितामह भीष्म तथा द्रोणाचार्य ने जो सलाह दी है वही ठीक है और कर्ण की सलाह बिलकुल गलत है। अंत में निष्कर्ष यह हुआ कि विदुर को पांडवों व कुंती को बुलाने पांचाल देश भेजा जाए। विदुर धृतराष्ट्र की ओर से राजा द्रुपद के लिए उपहार लेकर गए और अनुरोध किया कि पांडवों को द्रौपदी सहित हस्तिनापुर जाने की अनुमति दें। राजा द्रुपद कुंती और पांडवों को पुनः छल की आशंका थी। जब विदुर ने समझाते हुए कहा- “देवी आप निश्चित रहें। आपके बेटों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। वे संसार में खूब यश कमाएँगे और विशाल साम्राज्य के मालिक बनेंगे। आप सब बिना डर और भय के हस्तिनापुर चलिए।”

अंत में राजा द्रुपद से आज्ञा लेकर कुंती व द्रौपदी सहित पांडव हस्तिनापुर के लिए निकले। इधर हस्तिनापुर में पांडवों के स्वागत की तैयारियाँ होने लगीं। वहाँ युधिष्ठिर का यथा विधि राज्याभिषेक हुआ और आधा राज्य पांडवों के अधीन किया गया। राज्याभिषेक होने के बाद युधिष्ठिर को आशीर्वाद देते हुए-धृतराष्ट्र ने कहा- “बेटा युधिष्ठिर मेरे पुत्र दुरात्मा हैं। एक साथ रहने से तुम लोगों में आपस में बैर एवं ईर्ष्या भाव बढ़ेगे। अतः मेरी सलाह है कि तुम खांडवप्रस्थ में अपनी राजधानी बनाओ और वहीं से राज करना। खांडवप्रस्थ नगरी पुरू, नहुष एवं ययाति जैसे प्रतापी पूर्वजों की राजधानी रही है।”

खांडवप्रस्थ उस समय निर्जन हो चुका था लेकिन पांडवों ने खांडवप्रस्थ में निपुण कारीगरों से एक नए नगर का निर्माण करवाया और उस नगर का नाम इंद्रप्रस्थ रखा। धृतराष्ट्र के कहने पर पाँचों पांडवों एवं माता कुंती और द्रौपदी जीवन बिताते हुए न्यायपूर्वक राज्य करते रहे।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-30
जीवित – जिंदा, विधिपूर्वक – नियम के अनुसार,

पृष्ठ संख्या-31
प्रलोभन – लालच, संधि – समझौता, अपार – अत्यधिक, कुमंत्रणा – बुरी सलाह, परखना – जाँचना, श्रेयस्कर – कल्याणकारी, अमूल्य – कीमती, उपहार – भेंट, अनुमति – आज्ञा, छल-प्रपंच – कपट।

पृष्ठ संख्या-32
आफ़त – विपत्ति संकट, दुरात्मा – दुष्ट, भग्नावशेष – खंडहर, निर्जन – एकांत, शिल्पकार – कारीगर।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 11 द्रौपदी – स्वयंवर

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Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 11 द्रौपदी – स्वयंवर

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 11

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पांडव एकचक्रा नगरी में किस रूप में जीवन व्यतीत कर रहे थे?
उत्तर:
पांडव एकचक्रा नगरी में ब्राह्मणों के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे थे।

प्रश्न 2.
किसके स्वयंवर की तैयारियाँ होने लगी?
उत्तर:
पांचाल नरेश की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर की तैयारियाँ होने लगी।

प्रश्न 3.
द्रौपदी कहाँ की राजकुमारी थी? उनके स्वयंवर के लिए राजा द्रुपद की क्या शर्त थी?
उत्तर:
द्रौपदी पांचाल देश की राजकुमारी थी। उनके स्वयंवर के लिए राजा द्रुपद की यह शर्त थी कि जो राजकुमार पानी में प्रतिबिंब देखकर उस वृहदाकार धनुष से तीर चलाकर ऊपर टंगी हुई मछली को गिरा देगा उसी राजकुमार को द्रौपदी वरमाला पहनाएगी।

प्रश्न 4.
पंचाल देश में पांडव किस तरह रहते थे?
उत्तर:
पंचाल देश में पांडव ब्राह्मणों के वेश में रहते थे।

प्रश्न 5.
पांडव कहाँ रहकर कैसे गुज़र करने लगे?
उत्तर:
पांडव अपनी माता कुंती के साथ एक चक्रानगरी में भिक्षा माँगकर गुज़र करने लगे।

प्रश्न 6.
ब्राह्मण परिवार क्यों दुखी था?
उत्तर:
ब्राह्मण परिवार इसलिए दुखी था क्योंकि बकासुर राक्षस के पास भोजन लेकर जाने की बारी ब्राह्मण परिवार की थी इसलिए ब्राह्मण परिवार दुखी था।

प्रश्न 7.
बकासुर का वध किसने किया?
उत्तर:
बकासुर राक्षस का वध भीम ने किया। उसने बकासुर की पीठ पर घुटने मारकर उसकी रीढ़ को तोड़ डाला। उसके प्राण पखेरू उड़ गए। भीम उसकी लाश को नगर के फाटक तक घसीट लाया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कुम्हार के घर से वापस लौटकर धृष्टद्युम्न ने अपने पिता से क्या कहा?
उत्तर:
कुम्हार के घर से वापस लौटकर धृष्टद्युम्न ने अपने पिता से कहा-“पिता जी, मुझे तो ऐसा लगता है कि ये लोग कहीं पांडव न हों। बहन द्रौपदी उस युवक की मृगछाला पकड़े जब जाने लगी, तो मैं भी उनके पीछे चला गया। मुझे ऐसा लगा कि वे लोग कहीं पांडव न हो। वे एक कुम्हार की झोपड़ी में जा पहुँचे। वहाँ अग्नि-शिखा सी एक तेजस्वी देवी बैठी हुई थी, वहाँ जो उनसे बातें हुईं उनसे लगा कि वह देवी कुंती ही होनी चाहिए।

प्रश्न 2.
भीम अपने भाइयों के साथ घर क्यों नहीं गए?
उत्तर:
भीम और अर्जुन के साथ सभा मंडप में ही ठहरा रहा। उसे डर था कि कहीं निराश राजकुमार कहीं अर्जुन को कुछ कर न बैठें। उसका अनुमान ठीक ही निकला, वहाँ उपस्थित राजकुमारों में हल-चल मच गई थी। ऐसा मालूम हो रहा था कि बड़ा तांडव मच जाएगा।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 11

जब पांडव ब्राहमण के वेश में एकचक्रा नगरी में रहते थे उन्हीं दिनों पांचाल के राजा की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर की तैयारी चल रही थी। एकचक्रा नगरी के सभी ब्राह्मण पांचाल देश के लिए आ रहे थे। पांडव भी उन्हीं ब्राह्मणों के साथ आ रहे थे। वे लोग आकर एक कुम्हार के घर रुके। पांडवों को ब्राह्मण वेश में रहने के कारण वहाँ के लोग उन्हें पहचान नहीं सके।

स्वयंवर-मंडप में दूर-दूर से अनेक वीर आए थे। धृतराष्ट्र के सभी पुत्र-कर्ण, श्रीकृष्ण, शिशुपाल, जरासंध, शल्य जैसे प्रमुख वीर उपस्थित थे। पाँचों पांडव भी ब्राह्मणों के बीच जाकर बैठ गए। राजा द्रुपद ने घोषणा की जो लक्ष्य का बेधन करेगा, द्रौपदी उसी के गले में वर माला डालेगी। ज़मीन से काफ़ी ऊँचाई पर सोने की एक मछली टँगी थी। उसके नीचे तेज़ी से एक यंत्र घूम रहा था। जिसे उस पर रखे एक बड़े धनुष से बेधना था। इसके बाद राजकुमार धृष्टद्युम्न घोड़े पर सवार होकर आए। राज्य कन्या द्रौपदी भी फूलों का हार लिए हाथी से उतरी और सभा में बैठ गई।

इसके बाद एक-एक करके राजकुमार उठते और धनुष पर डोरी चढ़ाते और हारते और अपमानित होकर लौट जाते। कितने बड़े-बड़े महारथी को इस तरह मुँह की खानी पड़ी।

शिशुपाल, जरासंध, शल्य व दुर्योधन जैसे पराक्रमी असफल हो गए। जब कर्ण की बारी आई तो सभा में एक लहर-सी दौड़-गई सबने अनुमान लगाया कर्ण ज़रूर सफल होंगे। कर्ण ने धनुष खड़ा कर दिया और तानकर प्रत्यंचा भी चढ़ानी शुरू कर दी। डोरी के चढ़ाने में अभी बालभर की ही कसर रह गई थी कि इतने में धनुष का डंडा उसके हाथ से छूट गया तथा उछलकर उसके मुँह पर लगा। अपनी चोट सहलाता हुआ कर्ण अपनी जगह पर जा बैठा।

इसके बाद ब्राह्मणों में से अर्जुन उठ खड़ा हुआ। उसने लक्ष्य की ओर धनुष पर तीर चढ़ाया और पाँच बाण, उस घूमते हुए चक्र से मारे। लक्ष्य टूटकर नीचे गिर पड़ा। सभा में कोलाहल मच गया। बाजे बज उठे। राजकुमारी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाल दी। युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव समाचार देने माँ के पास चले गए। भीम जान बूझकर रुका रहा। कुछ राजकुमारों ने शोर शराबा किया। कुछ अन्य राजाओं में हलचल मच गई। उन्होंने शोर मचाया। यह देखकर श्रीकृष्ण और बलराम राजकुमारों को समझाने लगे। इस बीच अर्जुन द्रौपदी को साथ लेकर कुम्हार की कुटिया की ओर चल दिए।

द्रुपद-पुत्र-धृष्टद्युम्न भी चुपके से अर्जुन व द्रौपदी के पीछे-पीछे गया। कुम्हार की कुटिया में पाँचों भाइयों एवं कुंती को देखकर उसने लौटकर राजा द्रुपद से कहा- पिता जी मुझे तो ऐसा लगता है कि ये लोग पांडव हैं। बहन द्रौपदी उस युवक की मृग छाला पकड़े जब जाने लगी, तो मैं उनके पीछे हो लिया। वे एक कुम्हार की झोपड़ी में जा पहुँचे। वहाँ उसी कुटिया में एक तेजस्वी देवी बैठी थी। मुझे विश्वास हो गया कि वह माता कुंती ही है।

राजा द्रुपद ने कुंती, द्रौपदी व पाँचों भाइयों को राजभवन में बुलाया। युधिष्ठिर ने राजा को अपना सही परिचय दिया। द्रुपद को अत्यंत प्रसन्नता हुई कि उनको अर्जुन दामाद के रूप में मिला। माँ की आज्ञा और सबकी अनुमति से द्रौपदी के साथ पाँचों पांडवों का विवाह हो गया।

शब्दार्थ:
पृष्ठ संख्या-28- झुंड – समूह, वृहदाकार – बहुत बड़ा।
पृष्ठ संख्या-29- जोश – उत्साह, प्रतीत – विदित, मालूम, विप्लव – शोर।
पृष्ठ संख्या-30- मृगछाला – हिरण की खाल, अग्नि शिखा – आग की लपट, शत्रुता – दुश्मनी, सम्मति – सलाह।