Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 29 चौथा, पाँचवाँ और छठा दिन

These NCERT Solutions for Class 7 Hindi Vasant & Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 29 चौथा, पाँचवाँ और छठा दिन are prepared by our highly skilled subject experts.

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 29 चौथा, पाँचवाँ और छठा दिन

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 29

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चौथे दिन की लड़ाई में कौन मारा गया?
उत्तर:
चौथे दिन के युद्ध में शल्य का पुत्र एवं दुर्योधन के आठ भाई मारे गए।

प्रश्न 2.
भीम का पुत्र कौन था?
उत्तर:
भीम का पुत्र घटोत्कच था।

प्रश्न 3.
पाँचवें दिन के युद्ध की क्या विशेषता रही?
उत्तर:
पाँचवें दिन के युद्ध में अर्जुन ने कौरवों के हजारों सैनिक मारे।

प्रश्न 4.
कुरुक्षेत्र मैदान में का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को कौन सुनाता था?
उत्तर:
कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को संजय सुनाता था।

प्रश्न 5.
छठे दिन के युद्ध में क्या हुआ?
उत्तर:
छठे दिन के युद्ध में भारी जन हानि हुई। उस दिन के अंत में द्रोण ने जो भयंकर तबाही मचाई कि उससे पांडव की सेना भाग खड़ी हुई।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कुरुक्षेत्र के युद्ध के चौथे दिन घटोत्कच के क्रोध का ठिकाना क्यों न रहा?
उत्तर:
जब घटोत्कच ने देखा कि उसके पिता भीम को दुर्योधन ने भीषण अस्त्र चलाकर मूर्छित कर दिया है तब घटोत्कच के क्रोध का ठिकाना न रहा। उसने भीषण रूप धारण कर भयंकर युद्ध शुरू कर दिया, जिसके सामने कौरव सेना टिक नहीं सकी।

प्रश्न 2.
छठे दिन की मुख्य घटनाएँ क्या हुईं?
उत्तर:
छठे दिन के अंत में दुर्योधन बुरी तरह घायल हुआ और बेहोश होकर रथ से गिर पड़ा। तब कृपाचार्य ने बड़ी चतुराई से उसे रथ में ले लिया, जिससे दुर्योधन की जान बच गई।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 29

चौथे दिन सुबह होते ही युद्ध शुरू हो गया। शल्य का पुत्र मारा गया। भीम ने दुर्योधन के आठ भाइयों को मार डाला। क्रोध में दुर्योधन ने निशाना साधकर भीम को बाण मारा जिससे भीम मूर्छित सा होकर रथ पर बैठ गया। अपने पिता की यह दुर्दशा देखकर घटोत्कच ने भयानक युद्ध किया। कौरव-सेना भाग खड़ी हुई। अतः भीष्म ने युद्ध बंद कर दिया।

चौथे दिन के लड़ाई में दुर्योधन के कितने ही भाई मारे गए। इससे दुर्योधन शोकाग्रस्त हो गया। उधर संजय कुरुक्षेत्र के मैदान का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुनाते जाते थे। धृतराष्ट्र सुनकर काफ़ी व्यथित हो जाते थे।

पाँचवें दिन के युद्ध में अर्जुन ने कौरव सेना के हजारों सैनिक मार गिराए। कौरव-सेना ने भी अर्जुन को घेरा। अंत में छठे दिन द्रोण ने भी तबाही मचाई जिससे पांडव सेना भाग खड़ी हुई।

इसके बाद तो घमासान युद्ध होने लगा। अंत में दुर्योधन घायल होकर रथ से गिर पड़ा। तब कृपाचार्य ने बड़ी होशियारी से उसे रथ पर ले लिया जिससे उसकी जान बच गई। सूर्यास्त तक युद्ध चलता रहा। तब धृष्टद्युम्न और भीम सकुशल लौट आए तो युधिष्ठिर ने बड़ा आनंद मनाया। उनकी खुशी की सीमा न थी।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-73- पौफटना – सुबह होना, विहवल – बेचैन, जीवन समाप्त होना – मर जाना, तादाद – संख्या, तबाही – परेशानी, अंधाधुंध – लगातार, भयंकर, बेहोश – मूर्च्छित, चतुराई – बुद्धिमानी, मुहूर्त – समय।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 28 पहला, दूसरा और तीसरा दिन

These NCERT Solutions for Class 7 Hindi Vasant & Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 28 पहला, दूसरा और तीसरा दिन are prepared by our highly skilled subject experts.

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 28 पहला, दूसरा और तीसरा दिन

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 28

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पहले दिन की लड़ाई के बाद घबराहट में पांडव किसके पास गए?
उत्तर:
पहले दिन लड़ाई के बाद पांडव घबराहट में श्रीकृष्ण के पास गए।

प्रश्न 2.
कौरवों की सेना में सबसे आगे कौन था?
उत्तर:
कौरवों की सेना में सबसे आगे दुःशासन था।

प्रश्न 3.
दूसरे दिन युद्ध की व्यूह-रचना किसने की?
उत्तर:
दूसरे दिन के युद्ध की व्यूह रचना धृष्टद्युम्न ने किया था।

प्रश्न 4.
कौरवों के सेना में तीन वीर कौन थे जो अर्जुन की मुकाबला कर सकते थे।
उत्तर:
भीष्म, द्रोण और कर्ण ही अर्जुन का मुकाबला कर सकते थे।

प्रश्न 5.
पहले दिन के युद्ध का परिणाम क्या निकला?
उत्तर:
पहले दिन के युद्ध में पांडव काफ़ी डर गए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दूसरे दिन युद्ध का क्या परिणाम हुआ?
उत्तर:
पहले दिन के युद्ध के बाद पांडवों में जो भय व्याप्त था, वह दूसरे दिन युद्ध के अंत के बाद कौरवों के मन पर छा गया। अर्जुन का रण-कौशल देखकर कौरवों के योद्धा दंग रह गए। सात्यकि के बाण ने भीष्म के सारथी को मार गिराया।

प्रश्न 2.
तीसरे दिन के युद्ध का क्या परिणाम रहा?
उत्तर:
दिन के शुरुआत में ही दुर्योधन के बेहोश होने व युद्ध भूमि छोड़ देने से कौरवों की सेना में भगदड़ मच गई। इसके बाद भीष्म के भयंकर आक्रमण से पांडव सेना के पाँव उखड़ गए। स्वयं श्रीकृष्ण को रथ से उतरकर भीष्म की ओर बढ़ना पड़ा। अर्जुन ने उन्हें रोककर रथ पर बिठाया। इसके बाद अर्जुन के भयंकर युद्ध से कौरव सेना बुरी तरह हार गई।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 28

कौरवों की सेना के आगे दःशासन और पांडवों की सेना के आगे प्रायः भीम रहा करता था। भयंकर मार-काट मची हुई थी। युद्ध में पिता ने पुत्र को मारा। पुत्र ने पिता को मारा। भानजे ने मामा की हत्या की मामा ने भानजे को मारा। पहले दिन ही भीष्म ने पांडवों की सेना को भयभीत कर दिया था। इससे दुर्योधन काफ़ी प्रसन्न था। श्रीकृष्ण पांडव-सेना को धैर्य बँधा रहे थे।

पहले दिन की लड़ाई में पांडवों की सेना की दुर्गति देखकर पांडव सेना के सेनापति धृष्टद्युम्न ने दूसरे दिन के युद्ध की तैयारी बड़ी सतर्कता से की। अर्जुन का रण-कौशल देखकर कौरव सेना के महारथी भी दंग रह गए। कौरवों में भीष्म, द्रोण और कर्ण ही ऐसे वीर थे, जो अर्जुन का मुकाबला कर सकते थे। भीष्म ने अर्जुन पर जोरों से हमला किया। भीष्म और अर्जुन के बीच युद्ध काफ़ी देर तक चलता रहा। इधर धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्य के बीच भी युद्ध होता रहा। सात्यकि के एक बाण से भीष्म का सारथी मारा गया। दूसरे दिन के युद्ध के बाद कौरवों की सेना काफ़ी घबरा गई। सारथी के गिरने से घोड़ा तेजी से इधर-उधर दौड़ने लगा।

इससे कौरवों की सेना में तबाही मच गई। कौरव की सेना जल्दी सूर्यास्त होने की राह देखने लगी ताकि युद्ध बंद हो जाए। दूसरे दिन सूर्यास्त हुआ और युद्ध बंद हो गया। तीसरे दिन के युद्ध में भीम का एक बाण दुर्योधन को ऐसा लगा कि वह बेहोश होकर रथ पर गिर पड़ा। सारथी ने दुर्योधन को युद्ध भूमि से हटा लिया जिसके परिणामस्वरूप सेना में भगदड़ मच गई।

इससे पांडवों की सेना में खुशी छा गई। उन्हें यह आशा नहीं थी कि भीष्म अपनी बिखरी हुई सेना को इकट्ठा कर पाएँगे तभी भीष्म ने जोरदार हमला किया जिससे पांडव-सेना का पाँव उखड़ गया। श्रीकृष्ण, अर्जुन, शिखंडी का सेना छितर-बितर हो गई। उधर भीष्म के बाण अर्जुन और श्रीकृष्ण के शरीर में लगे। इस पर क्रोधित होकर श्रीकृष्ण स्वयं भीष्म को मारने के लिए आगे बढ़े। तब अर्जुन ने दौड़कर श्रीकृष्ण को रोका और सारथी के रूप में बैठाया। श्रीकृष्ण की मनोदशा देखकर अर्जुन ने भीषण प्रहार किया जिससे शाम होते-होते कौरव सेना बड़ी बुरी तरह से हार गई। थकी-हारी सेना शिविर को लौट गई।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-71- अभ्रभाग – आगे का भाग, दुर्गति – बुरी हालत, थर्रा उठना – घबराना, भयभीत होना, सबक लेना – सीखना, ध्यान रखना, सतर्कता – सावधानी।
पृष्ठ संख्या-72- मुकाबला – बराबरी, प्रतिरोध – विरोध, दंग – आश्चर्य, अद्भुत – अनोखा, बैरी – दुश्मन, तबाही – परेशानी, मुक्ति – छुट्टी, मूर्च्छित – बेहोश, भगदड़ – इधर-उधर भागना, तितर-बितर – इधर-उधर।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 27 पांडवों और कौरवों के सेनापति

These NCERT Solutions for Class 7 Hindi Vasant & Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 27 पांडवों और कौरवों के सेनापति are prepared by our highly skilled subject experts.

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 27 पांडवों और कौरवों के सेनापति

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 27

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भीष्म के सेनापति बनने पर कर्ण ने क्या निर्णय लिया?
उत्तर:
कर्ण ने निर्णय लिया कि भीष्म के मारे जाने के बाद वह युद्धभूमि में प्रवेश करेगा और केवल अर्जुन को ही मारेगा।

प्रश्न 2.
कौरवों के सेनापति कौन थे?
उत्तर:
कौरवों के सेनापति पितामह भीष्म थे।

प्रश्न 3.
पांडव की सेना को कितने हिस्सों में बाँटा गया?
उत्तर:
पांडवों की सेना को सात हिस्सों में बाँटा गया।

प्रश्न 4.
कौरव सेना के पहले सेनापति कौन बने?
उत्तर:
कौरव सेना के पहले सेनापति भीष्म पितामह बने।

प्रश्न 5.
महाभारत युद्ध के दौरान कौन-कौन से राजा तटस्थ रहे?
उत्तर:
महाभारत युद्ध के दौरान एक बलराम तथा दूसरे भोजकर के राजा रुक्मी तटस्थ रहे। इन्होंने युद्ध में किसी के तरफ़ से भाग नहीं लिया।

प्रश्न 6.
अर्जुन के भ्रम को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में क्या किया?
उत्तर:
अर्जुन के भ्रम को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण ने युद्ध क्षेत्र में कर्म योग का उपदेश दिया।

प्रश्न 7.
भीष्म के नेतृत्व में कौरवों ने कितने दिनों तक युद्ध किया?
उत्तर:
भीष्म के नेतृत्व में कौरवों ने 10 दिनों तक युद्ध किया।

प्रश्न 8.
पांडवों ने अपनी सेना का सेनापति किसे बनाया?
उत्तर:
पांडवों ने अपनी सेना का सेनापति कुमार धृष्टद्युम्न को बनाया।

प्रश्न 9.
कर्ण की मृत्यु के बाद कौरवों का सेनापति किसे बनाया गया?
उत्तर:
कर्ण की मृत्यु के बाद कौरवों ने अपना सेनापति शल्य को बनाया।

प्रश्न 10.
महाभारत का युद्ध कितने दिनों तक चला?
उत्तर:
महाभारत का युद्ध अठारह दिनों तक चला।

प्रश्न 11.
युधिष्ठिर को कौरव सेना की ओर जाते देखकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से क्या कहा?
उत्तर:
युधिष्ठिर को कौरव सेना की ओर जाते देखकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा-‘अर्जुन मैं समझ गया हूँ कि महाराज युधिष्ठिर की क्या इच्छा है। वे बिना बड़ों का आदेश लिए युद्ध करना अनुचित मानते हैं। उनका उद्देश्य यही है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
युद्ध के लिए अनुमति माँगने गए युधिष्ठिर से भीष्म ने क्या कहा?
उत्तर:
युद्ध के लिए अनुमति माँगने गए युधिष्ठिर से भीष्म ने कहा- “बेटा युधिष्ठिर, मुझे तुमसे यही आशा थी। मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। विवश होकर मुझे तुम्हारे विरोध में युद्ध करना पड़ रहा है, लेकिन मेरी यही कामना है कि रण में विजय तुम्हारी हो।”

प्रश्न 2.
युद्ध शुरू होने से पहले लोगों ने ऐसी कौन-सी घटना देखी जिससे वहाँ के लोग आश्चर्यचकित रह गए?
उत्तर:
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दोनों पक्षों के लोग इंतज़ार कर रहे थे कि कब युद्ध शुरू हो। एकाएक पांडव सेना के बीच हलचल मच गई। युधिष्ठिर ने अचानक अपना कवच धनुष और बाण उतारकर हाथ जोड़े कौरव सेना की हथियारबंद भीड़ को चीरते हुए भीष्म की ओर पैदल चले गए। बिना सूचना दिए उनको इस प्रकार जाते देखकर दोनों पक्ष वाले लोग अचंभित हो गए। शत्रु सेना को हटाते हुए युधिष्ठिर सीधे पितामह भीष्म के पास पहुँचे और पहुँचकर तथा झुककर उनके चरण स्पर्श किए। फिर बोले- पितामह! हमने आपके साथ युद्ध करने का दुःसाहस कर ही लिया। कृपया हमें युद्ध की अनुमति दें और आशीर्वाद भी कि इस युद्ध में विजश्री प्राप्त करूँ।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 27

श्रीकृष्ण उपप्लव्य पहुँचकर पांडवों को हस्तिनापुर का सारा हाल सुनाया। युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से युद्ध की तैयारी के लिए कहा। पांडवों ने विशाल सेना को सात भागों में बाँट दिया। द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न, शिखंडी, सात्यकि, चेकितान, भीमसेन आदि सात महारथी, इन सात दलों के नायक बने। अब प्रश्न उठा कि पांडवों का सेनापति किसे बनाया जाए? सबकी राय ली गई? धृष्टद्युम्न को पांडव सेनापति बनाया गया।

दूसरे तरफ़ कौरव पक्ष में भीष्म ने कहा कि लड़ाई की घोषणा करते समय मेरे से सुझाव नहीं लिया गया। अतः मैं पांडु-पुत्रों का वध नहीं करूँगा। कर्ण सदैव हमारा विरोध करता रहा है, अतः उसे सेनापति बना दिया जाय। दुर्योधन ने भीष्म पितामह को ही कौरवों का सेनापति बनाया। कर्ण ने कहा जब तक भीष्म पितामह जीवित हैं मैं युद्ध भूमि में प्रवेश नहीं करूँगा। सिर्फ अर्जुन को मारने के लिए युद्ध में प्रवेश करूँगा। फलतः कर्ण तब तक युद्ध से अलग रहे।

इधर युद्ध की तैयारियों के मध्य ही बलराम एक दिन पांडवों की छावनी में पहुँचे और बोले मैंने कृष्ण को अनेक बार कहा था, कौरव-पांडव हमारे लिए बराबर हैं, लेकिन अर्जुन के प्रेम के कारण तुम्हारे पक्ष में आ गए। दुर्योधन व भीम दोनों मेरे शिष्य हैं। मैं तो उनको लड़ते-लड़ते मरते देख नहीं सकता। अतः मैं युद्ध स्थान में किसी के तरफ़ से नहीं रहूँगा। मैं जा रहा हूँ। मैं तटस्थ रहूँगा। महाभारत के युद्ध में पूरे भारत वर्ष में दो ही राजाओं ने युद्ध में भाग नहीं लिया। वे तटस्थ रहे- एक बलराम और दूसरे भोजकर के राजा रुक्मी। राजा रुक्मी की छोटी बहन रुक्मिणी श्रीकृष्ण की पत्नी थी।

युद्ध का समाचार सुनकर रुक्मी एक अक्षौहिणी सेना लेकर आया था। रुक्मी के अहंकार के कारण दोनों पक्षों ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया था। कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों पक्षों की सेनाएँ आमने-सामने खड़ी होकर युद्ध नीति पर चलने की प्रतिज्ञाएँ लीं। दोनों पक्षों की व्यूह रचनाएँ हो गईं। श्रीकृष्ण ने गीता के उपदेश से अर्जुन के भ्रम को दूर किया। तब अर्जुन का मोह भंग हुआ। युद्ध शुरू होने वाला था कि युधिष्ठिर ने अपना कवच उतारकर सीधे पितामह भीष्म के पास गए और झुककर चरण स्पर्श किए। पितामह से उन्होंने कहा- “पितामह हमने आपके साथ युद्ध का दुस्साहस कर ही लिया। कृपया हमें युद्ध की अनुमति दीजिए और आशीर्वाद भी कि हम युद्ध में विजय प्राप्त करें। पितामह बोले- “बेटा युधिष्ठिर! मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। तुम्हारे विपक्ष में लड़ना पड़ रहा है फिर भी मेरी कामना है कि रण में विजय तुम्हारी हो।

भीष्म से आज्ञा और आशीर्वाद लेकर युधिष्ठिर इसी प्रकार आचार्य द्रोण, कुलगुरु कृपाचार्य व मद्रराज शल्य के पास जाकर आशीर्वाद लिया और अनुमति माँगी। उन सबने उनको आशीर्वाद दिया और युद्ध की विवशता बताई।

युद्ध के प्रारंभ में सबसे पहले बराबर वाले एक जैसे हथियार लेकर दो-दो की जोड़ी में लड़ने लगे। प्रत्येक योद्धा युद्ध धर्म का पालन करते युद्ध करने लगे।

पितामह भीष्म के नेतृत्व में दस दिन तक युद्ध चला। भीष्म के आहत होने पर द्रोणाचार्य को सेनापति नियुक्त किया गया। द्रोणाचार्य के बाद दो दिन कर्ण सेनापति रहे और अठाहरवें दिन शल्य सेनापति बने। महाभारत का युद्ध कुल अठारह दिन चला।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-68- चर्चा – खबर, सुसज्जित – अच्छी तरह से सजा हुआ, सुचारु – ठीक, विशाल – बड़ा, राय – सलाह, दृष्टि – नज़र, कोलाहल – शोर, ऋण – कर्ज, सम्मति – राय।

पृष्ठ संख्या-69- विपक्ष – विरोधी, सम्मिलित – शामिल, सहायता – मदद, प्रतिष्ठा – इज्जत।

पृष्ठ संख्या-70- कतार – पंक्ति, हथियारबंद – हथियार के साथ।

पृष्ठ संख्या-71- अनुमति–आज्ञा, स्वतंत्र-आज़ाद, रण-युद्ध, कामना-चाह, परिक्रमा-चारों ओर घूमना, विवश-लाचार, स्वर्गवास-देहांत, संचालन-देख-रेख करना, नियुक्त-बहाल, तैनात।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 26 शांतिदूत श्रीकृष्ण

These NCERT Solutions for Class 7 Hindi Vasant & Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 26 शांतिदूत श्रीकृष्ण are prepared by our highly skilled subject experts.

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 26 शांतिदूत श्रीकृष्ण

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 26

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण किस उद्देश्य से हस्तिनापुर गए थे?
उत्तर:
श्रीकृष्ण शांति वार्तालाप करने के उद्देश्य से हस्तिनापुर गए थे।

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण को दुःशासन के महल में क्यों ठहराया गया था?
उत्तर:
श्रीकृष्ण को दुःशासन के महल में इसलिए ठहराया गया था क्योंकि यह महल दुर्योधन के महल से ऊँचा और सुंदर था। धृतराष्ट्र के आदेशानुसार उन्हें उसी भवन में ठहराया गया था।

प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र की सभा में क्या कहा?
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र की सभा में पांडवों की माँग रखने के बाद उन्होंने धृतराष्ट्र की ओर देखकर कहा- राजन! पांडव शांतिप्रिय हैं। लेकिन वे युद्ध के लिए भी तैयार हैं। पांडव आपको पिता स्वरूप मानते हैं। ऐसा उपाय करें जिससे आप भाग्यशाली बनें।

प्रश्न 4.
भोजन का निमंत्रण मिलने पर श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से क्या कहा?
उत्तर:
भोजन का निमंत्रण मिलने पर श्रीकृष्ण ने कहा- राजन जिस उद्देश्य को लेकर यहाँ आया हूँ, वह पूरा हो जाए, तब मुझे भोजन का निमंत्रण देना उचित होगा।

प्रश्न 5.
दुःशासन का भवन कैसा था?
उत्तर:
दुःशासन का भवन दुर्योधन के भवन से अधिक ऊँचा और सुंदर था।

प्रश्न 6.
विदुर को किस बात का भय था?
उत्तर:
विदुर दुर्योधन के स्वभाव से भली-भाँति परिचित थे। उन्हें डर था कि श्रीकृष्ण के वहाँ जाने पर वह कोई न कोई कुचक्र रचकर उनकी प्राणों को नुकसान पहुँचाने का प्रयास करेगा। इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि उनकी सभा में आपका जाना उचित नहीं है।

प्रश्न 7.
रास्ते में श्रीकृष्ण ने कहाँ रात का विश्राम किया?
उत्तर:
रास्ते में श्रीकृष्ण ने कुशस्थल नामक स्थान पर एक रात को विश्राम किया।

प्रश्न 8.
श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को क्या समझाया?
उत्तर:
श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को समझाया कि मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि पांडवों को आधा राज्य लौटा दो और उनके साथ संधि कर लो। यदि यह बात हो गई तो स्वयं पांडव तुम्हें युवराज और धृतराष्ट्र को महाराज के रूप में सहर्ष स्वीकार कर लेंगे।

प्रश्न 9.
गांधारी को सभा में क्यों बुलाया गया?
उत्तर:
गांधारी को सभा में दुर्योधन को समझाने के लिए बुलाया गया क्योंकि धृतराष्ट्र यह जानते थे कि गांधारी की समझ बहुत स्पष्ट है। वह दूर की सोचती है। हो सकता है, उनकी बातें दुर्योधन मान ले।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कुंती ने कर्ण से क्या कहा?
उत्तर:
कुंती ने गदगद स्वर में कर्ण को रहस्य बताते हुए कहा- ‘कर्ण! यह न समझो कि तुम केवल सूत-पुत्र ही हो। न तो राधा तुम्हारी माँ है। न ही अधिरथ तुम्हारे पिता। तुम राजकुमारी पृथा के कोख से उत्पन्न सूर्य के अंश हो। तुम दुर्योधन के पक्ष में होकर अपने भाइयों से शत्रुता कर रहे हो। तुम अर्जुन के साथ मिल जाओ, बहादुरी के साथ लड़ो और राज्य करो। धृतराष्ट्र के लड़कों के अधीन रहना तुम्हारे लिए अपमान की बात है।

प्रश्न 2.
कर्ण ने कुंती से क्या कहा?
उत्तर:
कर्ण माता कुंती की बात सुनकर बोला- माँ यदि इस समय मैं दुर्योधन का साथ छोड़कर पांडवों की तरफ़ चला गया तो लोग मुझे कायर कहेंगे। आज जब युद्ध होना निश्चित हो गया है तो मेरा कर्तव्य हैं कि मैं पांडवों के विरुद्ध लड़ें। मैं असत्य नहीं बोलूँगा। अतः तुम मुझे क्षमा कर दो। लेकिन हाँ मैं तुम्हारी बात को भी एकदम व्यर्थ नहीं जाने दूंगा। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि अर्जुन को छोड़कर किसी पांडव के प्राण नहीं लूंगा। युद्ध में या तो अर्जुन मारा जाएगा या तो मैं मारा जाऊँगा। तुम्हारे लिए पाँच पुत्र हर हालत में रहेंगे। अतः तुम चिंता न करो।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 26

श्रीकृष्ण सात्यकि के साथ शांति की बातचीत करने के उद्देश्य से हस्तिनापुर आए। यह समाचार सुनकर कि श्रीकृष्ण आए हैं धृतराष्ट्र ने उनके स्वागत की भव्य तैयारियाँ करवाईं। दुःशासन का भवन दुर्योधन के भवन से भी ऊँचा था। अतः श्रीकृष्ण को वहीं ठहरने की व्यवस्था की गई। श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र से मिलकर विदुर के घर गए। वहाँ कुंती भी श्रीकृष्ण के इंतजार में बैठी थी। श्रीकृष्ण ने कुंती को सांत्वना दी और वे दुर्योधन के पास गए। दुर्योधन ने उनका शानदार स्वागत किया और उनको भोजन का निमंत्रण दिया।

श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से कहा- राजन् जिस उद्देश्य से मैं यहाँ आया हूँ वह बिना पूरा हुए भोजन का न्यौता देना उचित नहीं है। ऐसा कहकर श्रीकृष्ण विदुर के पास चले गए। वहीं पर उन्होंने भोजन और विश्राम किया।

इसके बाद विदुर ने श्रीकृष्ण को अगाह करते हुए कहा कि कौरवों की सभा में आपका जाना उचित नहीं। श्रीकृष्ण ने कहा- आप मेरे प्राणों की चिंता मत कीजिए। श्रीकृष्ण विदुर के साथ धृतराष्ट्र के भवन में गए और बड़ों को प्रणाम करके आसन पर बैठ गए। इसके बाद श्रीकृष्ण ने पांडवों की माँग रखी। उन्होंने बताया कि राजन पांडव शांति प्रिय हैं लेकिन युद्ध के लिए भी तैयार हैं। पांडव आपको पिता स्वरूप मानते हैं। ऐसा उपाय करें जिससे आप भाग्यशाली बने।

यह सुनकर धृतराष्ट्र सभासदों से बोले-मैं तो यही चाहता हूँ जो श्रीकृष्ण को प्रिय है। इस पर श्रीकृष्ण दुर्योधन से बोले-“मैं चाहता हूँ कि पांडवों का आधा राज्य लौटा दो और उनके साथ समझौता कर लो। अगर ऐसा होगा तो पांडव स्वयं तुम्हें युवराज और धृतराष्ट्र को महाराज के रूप में स्वीकार कर लेंगे।

सारी सभा ने दुर्योधन को समझाना चाहा। युद्ध के भयावह परिणामों का वर्णन किया। दुर्योधन द्वारा पांडवों पर किए गए अत्याचारों का स्मरण दिलाया। यह देखकर दुःशासन ने कहा- भाई, ये लोग आपको बंदी बनाना चाहते हैं। अतः आप यहाँ से निकल चलें। दुर्योधन भाइयों के साथ सभा भवन से निकल गया।

इसी बीच धृतराष्ट्र ने सभा में गांधारी को बुलाया। दुर्योधन को भी सभा में दुबारा बुलाया। गांधारी ने दुर्योधन को कई तरीके से समझाने की कोशिश किया, किंतु उसने माँ की एक भी बात नहीं सुनी और पुनः सभा से बाहर निकल गया। बाहर निकलकर दुर्योधन अपने मित्रों के साथ मिलकर राजदूत कृष्ण को पकड़ने का कुचक्र करने लगा, किंतु सफलता न मिली। सभा से निकलकर श्रीकृष्ण कुंती के पास पहुंचे और उनको सभा का सारा हाल सुनाया।

युद्ध की आशंका से कुंती काफ़ी चिंतित हो गई और वह सीधे कर्ण के पास गई। कर्ण जब मध्याह्न के बाद पूजा से उठा ही था तो कुंती को देखकर आश्चर्य चकित हो गया। पूछा- आज्ञा दीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ। कुंती ने कर्ण को असलियत बताते हुए कहा- तुम अधिरथ के पुत्र नहीं बल्कि राजकुमारी पृथा की कोख से पैदा हुआ है। तुम्हारे पिता सूर्य हैं। तुम दुर्योधन के पक्ष में होकर अपने भाइयों से ही शत्रुता कर रहे हो। तुम अर्जुन के साथ मिलकर वीरता से लड़ो और राज्य करो। कर्ण माता कुंती की बात सुनकर बोला, माँ यदि इस समय मैं दुर्योधन का साथ छोड़कर पांडवों के साथ मिल गया तो लोग मुझे कायर कहेंगे।

कर्ण ने दुर्योधन का साथ देने की अपनी लाचारी कुंती को समझा दिया, किंतु कुंती को एक भरोसा भी दिया। उसने कहा, मैं, तुम्हारी बात को एकदम व्यर्थ नहीं जाने दूंगा। मैं आपको वचन देता हूँ कि अर्जुन को छोड़कर और किसी पांडव के प्राण नहीं लूँगा। इस युद्ध में या तो मैं मारा जाऊँगा या अर्जुन मारा जाएगा। तुम्हारे पाँच पुत्र हर हालत में रहेंगे। अतः तुम चिंता न करो। शेष चारों पांडव मुझे चाहे जितना तंग करें मैं उनको नहीं मारूँगा। माँ तुम्हारे तो पाँच पुत्र हर हाल में रहेंगे। चाहे मैं मर जाऊँ, चाहे अर्जुन ! हम दोनों में से एक बचेगा और बाकी चार तो रहेंगे ही। तुम चिंता न करो।

कुंती कर्ण की बातें सुनकर विचलित हो गई। इसके बाद उन्होंने गले से लगाते हुए बोली, तुम्हारा कल्याण हो। कर्ण को आशीर्वाद देकर कुंती महल में चली गई।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-65- उद्देश्य – लक्ष्य, विश्राम – आराम, ठहरना – रुकना, प्रतीक्षा – इंतज़ार।
पृष्ठ संख्या-66- स्मरण – याद, सांत्वना – ढांढस, कुचक्र – षड्यंत्र, स्वीकृत – मान्य, आग्रह – निवेदन, सर्वनाश – पूरा नाश, वक्तव्य – बात।
पृष्ठ संख्या-67- कल्पना – अनुमान, आरूढ़ – चढ़कर बैठकर, कुलनाशी – कुल का नाश करने वाला, मध्याह्न – दोपहर, उत्तरीय – पुरुषों द्वारा कंधों से कमर तक ओढ़ा जाने वाला वस्त्र, शिष्टतापूर्वक – शालीनता से, पृथा कुंती, आश्रित – अधीन, मझधार – बीच में।

Class 7 Hindi Mahabharat Questions and Answers Summary Chapter 25 राजदूत संजय

These NCERT Solutions for Class 7 Hindi Vasant & Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 25 राजदूत संजय are prepared by our highly skilled subject experts.

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers Summary in Hindi Chapter 25 राजदूत संजय

Bal Mahabharat Katha Class 7 Questions Answers in Hindi Chapter 25

पाठाधारित प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उपप्लव्य में रहकर पांडवों ने कितनी सेना इकट्ठी की?
उत्तर:
उपप्लव्य में रहकर पांडवों ने अपने मित्र शासकों को संदेश भेजकर उनकी मदद से कोई सात अक्षौहिणी सेना इकट्ठी कर ली।

प्रश्न 2.
युधिष्ठिर की तरफ़ से कौन दूत बनकर धृतराष्ट्र की सभा में गए?
उत्तर:
पंचाल नरेश के पुरोहित युधिष्ठिर के दूत बनकर हस्तिनापुर गए।

प्रश्न 3.
युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र के पास क्या संदेश भेजा?
उत्तर:
युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र के पास संदेश भेजा कि पांडव संधि के अनुसार अपना हिस्सा चाहते हैं।

प्रश्न 4.
धृतराष्ट्र ने किसे अपना दूत बनाकर पांडवों के पास भेजा?
उत्तर:
धृतराष्ट्र ने संजय को दूत बनाकर पांडवों के पास भेजा।

प्रश्न 5.
कर्ण ने पांडवों के संधि सुझाव के पर अपनी क्या प्रतिक्रिया दिया?
उत्तर:
कर्ण ने संधि के सुझाव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा-“तेरहवाँ वर्ष पूरा होने से पहले ही उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा भंग करके अपने आपको सबके सामने प्रकट कर लिया है। अतः शर्त के अनुसार उनको फिर से बारह वर्ष के लिए वनवास जाना होगा।

प्रश्न 6.
धृतराष्ट्र ने अंत में क्या निर्णय दिया?
उत्तर:
धृतराष्ट्र ने अंत में निर्णय दिया कि संसार की भलाई को ध्यान में रखते हुए अंततः संजय को दूत बनाकर पांडवों के पास भेजने का निर्णय लिया।

प्रश्न 7.
धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को क्या सलाह दिया?
उत्तर:
धृतराष्ट्र के दुर्योधन को सलाह दिया कि- भीष्म पितामह जो कह रहे हैं, वह सही है। अतः युद्ध का विचार छोड़कर संधि कर लो।

प्रश्न 8.
दुर्योधन अपनी जीत के प्रति क्यों आश्वस्त था?
उत्तर:
दुर्योधन को यह भ्रम था कि युधिष्ठिर हमारे सैन्य बल को देखकर डर गया है इसलिए वह आधे राज्य की बात छोड़कर अब केवल पाँच गाँवों की माँग कर रहा है। ग्यारह अक्षौहिणी सेना को देखकर दुर्योधन अपनी जीत के प्रति आश्वस्त था।

प्रश्न 9.
श्रीकृष्ण हस्तिनापुर क्यों जाना चाहते थे?
उत्तर:
श्रीकृष्ण चाहते थे कि वे स्वयं एक बार हस्तिनापुर जाकर बात करें। यदि सफल हो गया तो, इससे पूरे विश्व का कल्याण होगा तथा किसी व्यक्ति को यह करने का मौका नहीं रहेगा कि उन्होंने शांति-स्थापित करने का प्रयास नहीं किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
युधिष्ठिर ने किसे दूत बनाकर भेजा। उनके दूत ने धृतराष्ट्र को क्या संदेश सुनाया?
उत्तर:
युधिष्ठिर ने पांचाल नरेश के पुरोहित को दूत बनाकर हस्तिनापुर भेजा। पंचाल नरेश के पुरोहित ने धृतराष्ट्र से कहा- युधिष्ठिर का विचार है कि युद्ध से संसार का विनाश ही होगा और इसी कारण वे युद्ध से घृणा करते हैं। वे लड़ना नहीं चाहते। इसलिए न्याय तथा पहले संधि के अनुसार यह उचित होगा कि आप उनका हिस्सा दे दें और इसमें बिलंब न करें।

प्रश्न 2.
युधिष्ठिर की शंका को देखते हुए श्रीकृष्ण ने क्या कहा?
उत्तर:
युधिष्ठिर की आशंका पर श्रीकृष्ण बोले- मैं दुर्योधन को अच्छी तरह से जानता हूँ। फिर भी हमें एक प्रयास ज़रूर करना चाहिए। किसी को यह कहने का मौका नहीं देना चाहिए कि मैंने शांति स्थापित करने का प्रयास नहीं किया। इसलिए मेरा वहाँ जाना सही होगा।

Bal Mahabharat Katha Class 7 Summary in Hindi Chapter 25

युद्ध की तैयारी में पांडव पक्ष ने सात और कौरव पक्ष ने ग्यारह अक्षौहिणी सेना तैयार कर ली है। युद्ध रोकने के प्रयास से युधिष्ठिर ने पांचाल नरेश के पुरोहित को राजदूत बनाकर हस्तिनापुर भेजा। दूत धृतराष्ट्र की राजसभा में पहुँचे। दूत ने महाराज धृतराष्ट्र से कहा कि- युधिष्ठिर का विचार है कि युद्ध से संसार का विनाश ही होगा, अतः वे युद्ध नहीं करना चाहते। इसलिए संधि के अनुसार आप उनका हक देने की कृपा करें।

भीष्म ने दूत के कथन का समर्थन किया किंतु कर्ण ने विरोध करते हुए कहा- पांडव आज्ञातवास की अवधि समाप्त होने से पहले ही पहचाने गए हैं। अतः उनको पुनः बारह वर्ष के लिए वनवास में जाना होगा। कर्ण के इस प्रकार बीच में बोलने के कारण भीष्म ने कर्ण को फटकारते हुए युद्ध के दुष्परिणाम- सभी की मृत्यु की बात कही।

इन सब बातों को सुनकर धृतराष्ट्र ने संजय को दूत बनाकर युधिष्ठिर के पास भेजा। संजय ने धृतराष्ट्र का संदेश युधिष्ठिर को कहामहाराज ने कुशलक्षेम पूछा है। वे आपसे मित्रता चाहते हैं लेकिन उनके पुत्र अपने पिता या पितामह की बात पर ध्यान नहीं दे रहे थे लेकिन आप युद्ध को टालने का प्रयास करें।

युधिष्ठिर को यह बात अच्छी लगी। हमें तो अपना हिस्सा मिलना चाहिए। हम श्रीकृष्ण की सलाह का पालन करेंगे। वे जो सलाह देंगे मैं वैसा ही करूँगा। तभी कृष्ण युधिष्ठिर से बोले- मैं स्वयं हस्तिनापुर जाकर कौरवों से संधि की बात करूँगा।” फिर युधिष्ठिर संजय से बोले- तुम महाराज से विनयपूर्वक मेरा संदेश कहना कि वे हमें कम से कम पाँच गाँव ही दे दें। हम पाँचों भाई संतोष करके संधि करने को तैयार हैं।

संजय ने हस्तिनापुर जाकर युधिष्ठिर का संदेश दिया। तब संजय की बातों को सुनकर भीष्म ने धृतराष्ट्र को समझाया- राजन आपके राजकुमार को कर्ण गलत मशविरा दे रहा है। यह पांडवों के सोलहवाँ हिस्सा के बराबर भी नहीं है। तब धृतराष्ट्र ने भीष्म पितामह की बातों का समर्थन करते हुए कहा संधि करना ही उचित होगा।

दुर्योधन ने संधि की बात को नकारते हुए कहा कि पांडव हमारी ग्यारह अक्षौहिणी सेना से डरकर ही पाँच गाँव पर आ गए हैं। मैं तो उन्हें सुई की नोंक के बराबर भी ज़मीन देने को तैयार नहीं हूँ। अब फ़ैसला युद्धभूमि में ही होगा। यह कहते हुए दुर्योधन बाहर चला गया।

इधर युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से बोले- वासुदेव! मैंने तो संदेश भेज दिया कि केवल पाँच गाँव से ही संतोष कर लूँगा किंतु मुझे लगता है कि दुष्ट इतना भी देने को तैयार नहीं होगा।

युधिष्ठिर की बात सुनकर श्रीकृष्ण बोले- मैंने निर्णय कर लिया है कि एक बार हस्तिनापुर जाकर संधि की वार्तालाप करूँगा। यदि सफल हुआ तो, इससे सारे विश्व का कल्याण होगा। इस पर युधिष्ठिर बोले कि आपका वहाँ जाना उचित नहीं होगा। मुझे भय है कि कहीं वह आप पर आक्रमण न कर दें।

इस पर श्रीकृष्ण अपनी प्रतिक्रिया देते हुए बोले- धर्म पुत्र दुर्योधन से मैं भली-भाँति परिचित हूँ। फिर भी हमें कोशिश करनी चाहिए। मैं किसी तरह से यह कहने का मौका नहीं देना चाहता हूँ कि मुझे शांति स्थापित करने में जो प्रयास करना चाहिए था, वह नहीं किया। इसलिए मेरा जाना ही ठीक रहेगा। इतना कहकर श्रीकृष्ण हस्तिनापुर के लिए विदा हुए।

शब्दार्थ:

पृष्ठ संख्या-62
संदेश – खबर, एकत्र – इकट्ठा, नरेश – राजा, संधि – समझौता, नाश – समाप्ति, घृणा – नफ़रत, हिस्सा – भाग, विलंब – देरी, नियत – निश्चित।

पृष्ठ संख्या 63, 64, 65
अप्रिय – बुरी, स्थिर – दृढ़, हितचिंतक – भला चाहने वाला, पराजित – हारे हुए, सलाह – राय, उचित – सही, आक्रमण – हमला, दर्प – घमंड, कैदी – बंदी बनाना, उपदेश – प्रवचन, भली-भाँति – अच्छी तरह।